RBI MPC Meeting: हिंदुस्तानीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक समिति की बैठक अगले महीने होने जा रही है, जिसमें देश की आर्थिक स्थिति और महंगाई को देखते हुए रेपो रेट (Repo Rate) पर बड़ा फैसला लिया जाएगा. रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंक आरबीआई से कर्ज लेते हैं. यदि इसमें बदलाव होता है, तो बैंकों द्वारा ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन की ब्याज दरें भी प्रभावित होती हैं.
पिछले साल कब-कब हुई कटौती?
पिछले साल आरबीआई ने वित्तीय स्थिति को रफ्तार देने के लिए रेपो रेट में कुल 1.25% की बड़ी कटौती की थी. जून के महीने में सबसे ज्यादा 0.50% की कमी की गई थी. नीचे दी गई टेबल से आप पिछले साल के बदलावों को समझ सकते हैं.
| तारीख | रेपो रेट | बदलाव |
| 7 फरवरी | 6.25% | -0.25% |
| 9 अप्रैल | 6.00% | -0.25% |
| 6 जून | 5.50% | -0.50% |
| अगस्त | 5.50% | कोई बदलाव नहीं |
| 1 अक्टूबर | 5.50% | कोई बदलाव नहीं |
| 5 दिसंबर | 5.25% | -0.25% |
फरवरी में क्या रहा हाल ?
इस साल की शुरुआत में फरवरी में हुई पहली बैठक के दौरान आरबीआई ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया था. दिसंबर 2025 से अब तक इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालातों और महंगाई के दबाव को देखते हुए आगामी बैठक में भी कटौती की गुंजाइश काफी कम नजर आ रही है.
Repo Rate का EMI पर सीधा असर
रेपो रेट में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे आपकी होम लोन EMI को प्रभावित करता है, खासकर यदि आपने ‘फ्लोटिंग रेट’ (Floating Rate) पर लोन लिया है.
- कटौती होने पर: बैंकों को सस्ता कर्ज मिलता है, जिससे वे ग्राहकों के लिए ब्याज दरें कम कर देते हैं और आपकी EMI का बोझ घट जाता है.
- बढ़ोतरी होने पर: बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाता है, जिसका असर आपकी जेब पर पड़ता है और EMI बढ़ जाती है.
- फिक्स्ड रेट लोन: जिन लोगों ने फिक्स्ड ब्याज दर पर लोन लिया है, उन पर इसका तुरंत असर नहीं पड़ता, क्योंकि यह बैंकों के विवेक पर निर्भर करता है कि वे पुरानी दरों में बदलाव करना चाहते हैं या नहीं.
अगले महीने के बदलाव और चुनौतियां
अगले महीने से वित्तीय क्षेत्र में कई नए नियम और बदलाव लागू होने वाले हैं. मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच आरबीआई के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को काबू में रखना है. यदि रेपो रेट स्थिर रहता है, तो आपकी EMI में भी कोई बदलाव नहीं होगा, लेकिन बाजार में नई नकदी (Liquidity) के प्रवाह को लेकर आरबीआई क्या रुख अपनाता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा.
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