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अभी जारी रहने वाली है सोने-चांदी की चमक

Gold- Silver Rate : वर्ष 2025 बहुमूल्य धातुओं के लिए बहुत ही उम्दा साल रहा और इनकी कीमतें लगातार बढ़ती रहीं. सोना तो इस साल 54 फीसदी बढ़ गया, जबकि चांदी की कीमत दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर जाकर 2,14,000 रुपये तक जा पहुंची हैं और अब भी इसके बारे में कयास लगाये जा रहे हैं. सोने की कीमत में इस साल की आखिरी तिमाही में भारी उछाल आया और यह स्थिति बरकरार है. यही हाल चांदी का है. दरअसल इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते उत्पादन और स्मार्टफोन में इसके इस्तेमाल के कारण चांदी की कीमत छलांग लगा रही है और यह तेजी जारी रहने वाली है.

जेपी मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि आम खुदरा खरीदारों के अलावा विभिन्न देशों के सेंट्रल बैंक बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे हैं, जिस कारण सोना मजबूत बना रहेगा. दरअसल हर देश अपने रिजर्व में डॉलर के अलावा सोना रखता है, ताकि विपरीत परिस्थितियों में वित्तीय स्थिति को स्थिरता दे सके. सोने की अतिरिक्त खरीद उन्हें आर्थिक अनिश्चितता से मुक्त रखने में मदद करता है.

इस कारण अनेक सेंट्रल बैंक डॉलर की बजाय सोने को रिजर्व के तौर पर तरजीह दे रहे हैं, जिससे इसकी कीमतों में इजाफा हुआ है. केंद्रीय बैंक जब भी खरीदारी करते हैं, तो उससे सोने के दाम और बढ़ जाते हैं. यह सेंटीमेंट अभी बरकरार है, इसलिए आने वाले समय में भी सोने की खरीदारी जारी रहेगी. दुनियाभर में चल रहे युद्ध और आर्थिक संकटों के कारण सेंट्रल बैंक सोने की तरफ झुक रहे हैं. इसका उन्हें फायदा भी मिल रहा है, क्योंकि सोने के दाम बढ़ रहे हैं और डॉलर के गिर रहे हैं. सेंट्रल बैंकों ने इस साल की खासकर तीसरी तिमाही में काफी सोना खरीदा. अनुमान यह है कि दुनिया के कुल स्वर्ण भंडार का 20 प्रतिशत से भी ज्यादा यानी लगभग 36,000 टन सोना सेंट्रल बैंकों के पास है.

सेंट्रल बैंकों के अलावा बड़े निवेशक दीर्घ काल के लिए सोने की खरीदारी कर रहे हैं. वे तमाम एसेट के अलावा सोने में भी एक हिस्सा निवेश करते हैं. वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए वे लंबी पोजीशन ले रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि सोने के दाम अभी बढ़ेंगे. जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2026 में 250 टन सोना इटीएफ के जरिये खरीदा जा सकता है, जबकि सोने की छड़ों और सिक्कों की मांग 1,200 टन से भी ज्यादा हो सकती है.

हिंदुस्तानीय रिजर्व बैंक के पास इस समय 880.8 टन सोना है और इसकी मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है. दूसरी ओर चीन के पास 2,300 टन सोना है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के पास 5,000 टन से भी ज्यादा सोना है, लेकिन वह इस बारे में कोई जानकारी नहीं देता है. चीन की मंशा दरअसल डॉलर पर निर्भरता धीरे-धीरे घटाने की है और वह इसमें कुछ हद तक सफल भी हो रहा है. कुछ साल पहले चीन ने अपने नागरिकों को भी सोना खरीदने के लिए प्रेरित किया था, जबकि वहां सोने के गहनों का कोई चलन नहीं है.

इसके बावजूद लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सोने की खरीद के लिए प्रेरित किया जाता है. इसके विपरीत, हिंदुस्तान में सोने की खुदरा मांग बहुत ज्यादा है, क्योंकि हर परिवार सोने के गहने खरीदता रहता है और बेटियों की शादी में सोना देना एक सामाजिक कर्तव्य माना जाता है, क्योंकि सोना संकट में साथ देता है. हिंदुस्तानीयों के पास कितना सोना है, इसके सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन अनुमान है कि यह आंकड़ा 25,000 टन से भी ज्यादा है, जो पाकिस्तान की कुल जीडीपी से भी ज्यादा है.

सोने के दाम बेहद बढ़ जाने के कारण इन दिनों अपने यहां व्यक्तिगत खरीदारी बेशक कम हो गयी है, लेकिन इस पर ब्रेक नहीं लगा है. शादी-ब्याह में लोगों का बजट तो वही है, लेकिन सोने की महंगाई से कुल खरीदारी पर असर साफ पड़ रहा है. यही हाल चांदी का है, जिसके सिक्के शादियों में तो दिये ही जाते हैं, दिवाली में भी दिये जाते हैं. लेकिन इस साल ऐसा कम ही हुआ, क्योंकि चांदी की कीमत बहुत ज्यादा हो गयी थी. वैसे में, लोगों का बजट छोटा पड़ गया. इसका बुरा असर चांदी के सामान बेचने वालों पर पड़ा है और बिक्री काफी घट गयी है. राजधानी दिल्ली के सर्राफा बाजार कूचा महाजनी में चांदी की बिक्री में काफी कमी आई है.

खुदरा ग्राहक गायब हैं और वे सही समय का इंतजार कर रहे हैं कि चांदी के दाम घटें.
सोने की कीमत कुछ हद तक अमेरिका की आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करती है. अभी वहां ब्याज दरों में गिरावट हुई है, जिस कारण निवेशकों का रुझान सोने की ओर है. डॉलर में गिरावट के कारण भी सोने में मजबूती है. हिंदुस्तान में डॉलर महंगा है, क्योंकि अमेरिका को निर्यात घटने से डॉलर कम आ रहे हैं. इस कारण भी सोना महंगा है, क्योंकि हम सोने का आयात करते हैं, जिसके लिए डॉलर चाहिए. फिलहाल रूस-यूक्रेन युद्ध न थमने तक तो सोने-चांदी के दाम घटने के आसार नहीं हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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