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अस‍फल अमेरिका-ईरान वार्ता ने बढ़ायी चिंता, पढ़ें पूर्व विदेश सचिव शशांक का आलेख

US Iran Peace Talks: इस्लामाबाद में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता का बेनतीजा रहना बहुत आश्चर्यजनक नहीं है. वार्ता के बिल्कुल शुरुआती चरण में इससे ज्यादा उम्मीद की भी नहीं जा सकती थी. हालांकि इससे क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर चिंता जरूर बढ़ गयी है. स्पष्ट है कि अमेरिका की सख्त शर्तों और ईरान के इनकार ने समझौते की राह मुश्किल बना दी. ऐसे में आने वाले समय में तनाव बढ़ने और कूटनीतिक कोशिशों के और जटिल होने की आशंका भी जतायी जा रही है. अलबत्ता ईरान और अमेरिका के बीच हुई बातचीत अगर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पायी, तो यह नाउम्मीदी का भी कारण नहीं होना चाहिए. यह मानने का कारण है कि दोनों ही पक्ष फिलहाल वार्ता को अंजाम तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे. साथ ही, यह भी सच है कि आपसी मुलाकातों का सिलसिला अगर जारी रहता है, तो पश्चिम एशिया के संकट का हल निकल सकता है. पाकिस्तान में संपन्न हुई इस वार्ता के प्रति बेशक हमें भरोसा नहीं था, लेकिन ईरान और अमेरिका को निश्चित तौर पर था.

ईरान ने हालांकि कई मौके पर पाकिस्तान के मध्यस्थ होने के खिलाफ टिप्पणी की, लेकिन ईरानी वार्ताकार पाकिस्तान पहुंचे थे, तो कहीं न कहीं कुछ उम्मीद तो थी ही. दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल असलम मुनीर की गाढ़ी दोस्ती को देखते हुए अमेरिकी वार्ताकार इस्लामाबाद में ठोस उम्मीदों के साथ पहुंचे थे. और ईरान भले ही पाकिस्तान पर भरोसा न करने की बात कह चुका हो, लेकिन खुद पाकिस्तान इस युद्ध को खत्म करना चाहता है, क्योंकि वह जानता है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी आक्रामकता अगर जारी रही, तो ईरान के खिलाफ उसकी कार्रवाई कहीं न कहीं पाकिस्तान पर भी असर डाल सकती है.

इस्लामाबाद में दोनों ही पक्ष जिन भी उम्मीदों के साथ आये हों, लेकिन लगभग इक्कीस घंटे की बातचीत के बाद दोनों पक्षों का रवैया बिल्कुल स्पष्ट है. ईरान दरअसल किसी जल्दबाजी में नहीं है और उसके हक में कदम न उठाये जाने पर वह युद्ध खत्म नहीं करेगा. इस लिहाज से देखें, तो युद्ध शुरू होने से अब तक उसके रवैये में कोई खास बदलाव नहीं आया है, भले ही इस दौरान उसे भारी नुकसान पहुंचा है. वार्ता बेनतीजा रहने के बाद ईरान के रुख से यह भी लगता है कि वह बहुत निराश नहीं हैं. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना है कि कूटनीति कभी खत्म नहीं होती, प्रयास जारी रहते हैं. ऐसी बातचीत में आसानी से हल तक नहीं पहुंचा जाता. याद रखना चाहिए कि वियतनाम के साथ वार्ता में समाधान तक पहुंचने में अमेरिका को कई साल लग गये थे.

ईरान के विपरीत अमेरिका के रवैये में फर्क दिखा. अमेरिका वार्ताकारों का नेतृत्व कर रहे उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरान के परमाणु हथियारों और उसके परमाणु कार्यक्रम पर कोई सहमति नहीं बन पायी. यानी परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद दूर नहीं हो सके. क्या वेंस का यह रुख अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख के अनुकूल है, जो कुछ दिन पहले तक भी ईरान की सभ्यता को निर्मूल कर देने की बात कर रहे थे? क्या अमेरिका सिर्फ ईरान के परमाणु हथियारों के बारे में बातचीत करने के लिए पाकिस्तान गया था? क्या अमेरिका के एजेंडे में और दूसरे मुद्दे नहीं थे? अगर सिर्फ ईरान के परमाणु हथियारों पर ही बात अटकी हुई है, जैसा कि वेंस का कहना है, तो इसके लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता की तो कोई जरूरत ही नहीं है. अगर अमेरिका को ईरान के परमाणु हथियारों की चिंता है, तो उसे रूस और चीन के साथ बातचीत करनी चाहिए. यही दोनों देश इस मामले में अमेरिका की चिंता दूर कर सकते हैं.

अमेरिका ने बातचीत टूटने को निराशाजनक बताया. क्या वह वार्ता के बिल्कुल शुरुआती चरण में ही समस्या का हल निकल जाने के प्रति आश्वस्त था? अमेरिका ने जिस तरह बातचीत खत्म की, वह भी बेहद चौंकाने वाली रही. पहले ऐसा लग रहा था कि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता रविवार को भी जारी रहेगी. लेकिन अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रविवार की सुबह समझौता न होने से संबंधित एक बयान अचानक प्रेस को जारी किया और फिर पाकिस्तान से निकल गये. वेंस की यह प्रतिक्रिया चौंकाने वाली रही. हो सकता है कि पूरी स्थिति पर बेहद नजदीकी नजर रख रहे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने उन्हें ऐसा निर्देश दिया हो. वार्ता के नतीजे तक न पहुंचने के कई कारण रहे.

वार्ता के दौरान ईरान ने होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाये रखने की बात कही, जबकि अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में पूरी तरह खोलने पर जोर दे रहा था. लेकिन होर्मुज के मुद्दे पर अमेरिकी मांग ईरान के लिए स्वीकार्य नहीं थी. अमेरिका के साथ वार्ता विफल होने के बाद ईरान की सैन्य संस्था इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स ने स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज जलडमरुमध्य की स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जायेगा. यानी जो स्थिति पहले बनी हुई थी, वह आगे भी जारी रहेगी. दरअसल ईरान ने अमेरिका और इस्राइल के हमले के बाद होर्मुज जलडमरुमध्य को बंद कर दिया और हिंदुस्तान समेत गिने-चुने देशों के तेल टैंकर ही वहां से गुजर रहे हैं.

वार्ता के किसी अंजाम तक न पहुंचने का एक कारण यह भी रहा कि अमेरिका ने लेबनान पर जारी इस्राइली हमले रोकने का कोई वादा नहीं किया. वार्ता के दौरान भी बेरूत पर इस्राइल की लगातार बमबारी में सैकड़ों लोग मारे गये, जिस पर वैश्विक प्रतिक्रिया हुई, और अनेक विश्लेषकों ने इसे युद्धविराम के उल्लंघन के रूप में देखा. पर वार्ता के टूट जाने का मतलब यह नहीं है कि समाधान की उम्मीदें खत्म हो गयी हैं. ईरान ने कहा है कि वह पाकिस्तान और दूसरे मित्र देशों के साथ इस मुद्दे पर सलाह-मशविरा जारी रखेगा.

मध्यस्थ बने पाकिस्तान का भी कहना है कि आपसी बातचीत जारी रहनी चाहिए, और युद्धविराम की अवधि बढ़ाने के बारे में भी सोचा जाना चाहिए. लेकिन अब गेंद अमेरिका के पाले में है. शांति वार्ता विफल होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी की धमकी दी है. अगर ऐसा होता है, तो ईरान के तेल राजस्व और आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है. देखना यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप आगे क्या फैसला करते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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