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कम बारिश से खरीफ की खेती पर संकट

प्रतिनिधि,सीवान. जून में मॉनसून के दगा देने से किसानों की परेशानी बढ़ गयी है.कृषि विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक जून में 143 एमएम सामान्य रूप से बारिश होती है.वही इस बार 101 एमएम ही बारिश हुई है.इधर जुलाई के शुरुआत के दो दिनों में 20 एमएम के स्थान पर 16 एमएम ही बारिश हुई है.कृषि विशेषज्ञों की माने तो जुलाई में भी कम बारिश होने की स्थिति है. आलम यह है कि रोहिणी नक्षत्र में डाले गए बिचड़े अब रोपनी के लिए तैयार हो गए है.बारिश नही होने से बिचड़े झुलस रहे है.खेतों में धान के सूखे बिचड़े को देख किसानों का कलेजा फट रहा है. यह स्थिति पूरे जिले की है. किसानों की दिन व रात वर्षा की इंतजार में कट रही है. मॉनसून छलावा बना है.बादल आते और चले जाते हैं, लेकिन बरसते नहीं.तीखी धूप से खेतों से नमी कम हो रही है.आद्रा नक्षत्र में डाले गये अंकुरित बिचड़ा भी पानी के अभाव में मुरझाने लगा है.इसे देख किसानों के चेहरे से मुस्कान गायब है. हाल के दिनों में निकल रही तेज धूप ने किसानों की चिता बढ़ा दी है. वर्षा नहीं होने से धान की रोपनी में परेशानी बढ़ गई है. किसानों के बिचड़े तैयार हैं लेकिन पानी की कमी रोपाई में बाधक बन रही है. वैकल्पिक फसलों की खेती करें किसान कृषि विभाग का कहना है कि मॉनसून की अनिश्चितता को देखते हुए किसानों को खरीफ के वैकल्पिक फसलों की खेती करनी चाहिए. जिससे उन्हें कम लागत में अच्छी पैदावार प्राप्त हो.धान की नर्सरी लगाने के 35 दिनों के अंदर की बुआई कर देनी चाहिए.35 दिन से पुरानी नर्सरी के बिचड़े से रोपाई करने से कल्ले कम निकलते हैं. इससे प्रति इकाई क्षेत्र में पौधों की संख्या घट जाती है और इससे उपज में भारी कमी आती है. इस स्थिति को देखते हुए बेहतर होगा कि किसान बारिश के सक्रिय होने का इंतजार करें. किसानों को यह भी ध्यान रखना होगा कि वो किसी भी परिस्थिति में 35 दिन से ज्यादा पुराने बिचड़े से धान की रोपाई न करें. अगर बिचड़े 35 दिन से अधिक पुराने हैं तो बेहतर होगा कि वो धान की सीधी बीजाई कर दें. बारिश नहीं होने की परिस्थिति में किसान दलहनी फसलों को भी लगा सकते हैं. अरहर, उड़द और मूंग की खेती में भी काफी अच्छा मुनाफा है.लेकिन इन फसलों को उसी जगह लगाने की सलाह दी जाती है, जहां जल निकास बहुत ही अच्छा हो. इसके अलावा मक्का एवं तिल की भी खेती की जा सकती है. आजकल किसानों को मोटे अनाज से भी अच्छा फायदा हो रहा है तो मॉनसून की वर्तमान दशा को देखते हुए मोटे अनाज के विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है. तकनीकी सहायता की आवश्यकता कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इसी तरह मॉनसून की चाल धीमी रही, तो बिचड़ा डालने और रोपनी के कार्य में देरी होगी. जिससे धान की उत्पादकता पर भी असर पड़ेगा. विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे वैकल्पिक सिंचाई के साधनों जैसे डीजल पंप या ड्रिप इरिगेशन का उपयोग करें, ताकि समय पर बिचड़ा तैयार हो सके. कृषि विभाग द्वारा जिले के विभिन्न प्रखंडों में किसान प्रशिक्षण शिविर का भी आयोजन किया जा रहा है, जिसमें उन्हें समय प्रबंधन, उन्नत बीजों का चयन, खेत की तैयारी और बिचड़ा डालने की विधियों के साथ साथ रोपनी के बारे में बताया जा रहा है. लक्ष्य प्राप्ति की उम्मीद जिला में अभी तक लक्ष्य के विरुद्ध 80 फीसदी भूखंड पर नर्सरी लगाया गया है.वही धान के अतिरिक्त अन्य खरीफ फसलों की बुआई की स्थिति भी संतोषजनक नही है.जिला में 10077.40 हेक्टेयर में धान की खेती करने का लक्ष्य है. कृषि विभाग को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यदि मॉनसून सामान्य रहा, तो लक्ष्य को पूरा किया जा सकेगा.डीएओ डॉ. आलोक कुमार का कहना है कि जुलाई के पहले सप्ताह तक बिचड़ा डालने की प्रक्रिया पूर्ण हो जानी चाहिए.जिससे समय पर रोपनी हो सके. जिले में धान की खेती एक प्रमुख कृषि गतिविधि है. जिससे लाखों किसानों की आजीविका जुड़ी हुई है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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