Sarhul Jharkhand 2026, रांची : झारखंड में मनाया जाने वाला सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़कर जीने की परंपरा है. ‘सर’ का अर्थ सरई (साल का फूल) और ‘हूल’ का मतलब क्रांति होता है. यह पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी संस्कृति को जीवित रखने का प्रतीक है. हालांकि इस पर्व को धरती माता और सूर्य के विवाह से भी जोड़कर जाता है. क्योंकि इस दौरान नई फसल (धान) और आम के फल को धरती माता को समर्पित किया जाता है.
अलग-अलग समुदायों में अलग नाम
सरहुल को विभिन्न जनजातीय समुदायों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. उरांव समुदाय इसे ‘खद्दी’, मुंडा समुदाय ‘बा परब’ और संथाल समाज ‘बहा परब’ के नाम से मनाता है. यह पर्व झारखंड के अलावा बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा समेत कई राज्यों में मनाया जाता है, लेकिन झारखंड में इसकी भव्यता देखते ही बनती है.
प्रकृति के प्रति आभार का पर्व
आदिवासी समाज के लिए सरहुल नया साल भी माना जाता है. इस दिन लोग प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करते हैं और अच्छी फसल की कामना करते हैं. मान्यता है कि मनुष्य प्रकृति से जीवन प्राप्त करता है, इसलिए उसका सम्मान करना जरूरी है.
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सखुआ वृक्ष की विशेष पूजा
इस पर्व में सखुआ (साल) के वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है. जनजातीय मान्यता के अनुसार, इसी वृक्ष में उनके आराध्य देव निवास करते हैं. साथ ही इस मौसम में इस पर नये फूल आते हैं, जो नवजीवन का प्रतीक है.
तीन दिनों तक चलता है उत्सव
सरहुल का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है. पहले दिन घरों की साफ-सफाई होती है और गांव के पाहन उपवास रखते हैं. दूसरे दिन सरना स्थल पर जल स्तर देखकर वर्षा का अनुमान लगाया जाता है और पूजा के बाद ‘तहरी’ प्रसाद के रूप में बांटी जाती है. तीसरे दिन ‘फूल खोंसी’ की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें पाहन घर-घर जाकर सखुआ के फूल देकर आशीर्वाद देते हैं.
परंपरा से जुड़ाव का संदेश
समय के साथ सरहुल का स्वरूप बदला है. अब यह केवल सरना स्थल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक बन गया है. ढोल, नगाड़े और मांदर की थाप पर लोग पारंपरिक वेशभूषा में सड़कों पर भव्य शोभायात्रा निकालते हैं.
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