Dr Ram Manohar Lohia: जब समूचा देश आजादी के जश्न में डूबा था, तब पुर्तगाली तानाशाही के चंगुल से त्रस्त गोवावासी परिवर्तन की बयार की प्रतीक्षा में थे. इसके मूल में दो बातें मुख्य थीं. एक तो पुर्तगाल स्वयं डॉ सालाजार की फासिस्ट तानाशाही में जकड़ा हुआ था. इसके साथ ही सालाजार शाही का यह विश्वास था कि गोवा और अन्य उपनिवेशों में पुर्तगाल ‘ईश्वर और धर्म’ की खातिर टिका हुआ है. गोवा में लंबे समय तक पुर्तगाली शासन के बने रहने का बड़ा कारण स्वतंत्र हिंदुस्तान प्रशासन की यह धारणा भी थी कि गोवा की मुक्ति में प्रशासन किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं करेगी. गांधी जी के समर्थन के बाद भी दिग्गज कांग्रेसियों ने गोवा की आजादी का मुद्दा नहीं उठाया था. स्वयं पंडित नेहरू का वह बयान काफी निराशाजनक था, कि जब कांग्रेस हिंदुस्तान की आजादी के मोर्चे पर अपनी सारी शक्ति केंद्रित किए हुए है, तब हमें छोटी लड़ाइयों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है.
सितंबर, 1946 तक हिंदुस्तान में अंतरिम प्रशासन बन चुकी थी और पं. नेहरू प्रधानमंत्री बने. जनता को आशा थी कि अंतरिम प्रशासन गोवा के मामले में कुछ फैसलाकुन कदम उठाएगी, पर वैसा कुछ नहीं हुआ. तब यह भी कहा जाने लगा कि हिंदुस्तान अगर यूरोप के सबसे कमजोर देश पुर्तगाल तक के विरुद्ध आवाज नहीं उठा सकता, तो उससे वैश्विक सम्मेलनों में जनतंत्र की शक्ति के रूप में काम करने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए. वर्ष 1928 में गोवा कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ था. कई वर्षों तक गोवा कांग्रेस कमेटी राष्ट्रीय कांग्रेस से संबद्ध थी, पर 1935 के गवर्नर ऑफ इंडिया एक्ट के तहत किये गये संवैधानिक सुधारों के फलस्वरुप राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश हिंदुस्तान के अलावा अपनी अन्य शाखों से संबंध तोड़ लिया. लिहाजा गोवा कांग्रेस का भी राष्ट्रीय कांग्रेस से संबंध समाप्त हो गया. इससे गोवा के राष्ट्रवादियों का मनोबल टूट गया. नेताजी सुभाष चंद्र बोस तब कांग्रेस अध्यक्ष थे और उनसे मिलकर डॉ कुन्हा की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित हुई, जिसका मुख्य जोर गोवा में कार्यकर्ताओं से संपर्क कर वहां नागरिक स्वतंत्रता की बहाली और पुर्तगाल के हिंदुस्तानीय उपनिवेशों में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए आंदोलन चलाना था.
गांधी, नेहरू और पटेल हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार हो चुके थे, पर तरुण समाजवादियों ने भूमिगत होकर सत्याग्रह आंदोलन का सफल नेतृत्व किया. डॉ लोहिया काफी अस्वस्थ थे. वह अपने मित्र डॉ जूलियाओ मेनेजेस के पास चिकित्सा जांच हेतु मुंबई पहुंचे, तो डॉ ने उन्हें गोवा स्थित अपने आवास पर आने का निमंत्रण दिया. डॉ लोहिया के गोवा पहुंचने की समाचार जंगल की आग की तरह फैल गयी. उनसे मिलने वालों का तांता लग गया, जिनमें अधिकांश अध्यापक, कामकाजी लोग, छोटे व्यवसायी और मिस्त्री थे. गोवा के इतिहास में 18 जून, 1946 परिवर्तन का साक्षी बना, जब कामगारों द्वारा एक सभा आयोजित की गयी. जब लोहिया अपने साथी के साथ सभास्थल पर पहुंचे, तो प्रशासक कैप्टन मिरांडा ने उनके पास पहुंचकर उनसे विक्टोरिया से न उतरने का आग्रह किया. पर डॉ लोहिया ने उस पर ध्यान नहीं दिया.
क्रोधित मिरांडा ने रिवाल्वर निकालकर लोगों पर तान दिया. डॉ लोहिया ने मिरांडा के रिवॉल्वर वाले हाथ को कसकर पकड़ लिया और सभा को संबोधित करने लगे. गोवा आंदोलन में वह पहला प्रतिरोध था. हालांकि डॉ लोहिया और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया. अधिकारी निरंतर प्रयास करते रहे कि डॉ लोहिया गोवा छोड़कर बेलगांव चले जायें अथवा अधिकारियों द्वारा स्वीकृति प्राप्त करने के बाद ही सभा आयोजित करें. डॉ लोहिया ने जनसमूह को संबोधित कर लंबी लड़ाई के लिए आवाहन किया. लिहाजा प्रशासन द्वारा उन्हें सड़क मार्ग पणजी ले जाया गया, हालांकि उन्नादी भीड़ से रास्ता बनाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा.
डॉ लोहिया के गोवा से बाहर जाने के बाद भी आंदोलन रुका नहीं. गोवा के स्थानीय दलों के साथ राष्ट्रीय स्तर के दल और नेता संघर्ष में भागीदार बनने लगे. हजारों कार्यकर्ता वर्षों तक कारागार में रहे. नेताओं-कार्यकर्ताओं को दी जा रही यातनाओं ने विरोध के स्वर और तेज कर दिये. जन भावनाओं के उभार ने आखिरकार केंद्र प्रशासन को दखल देने के लिए मजबूर कर दिया. दिसंबर, 1961 में हिंदुस्तानीय शस्त्र सेवा के दखल के बाद गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया गया. गोवा मुक्ति आंदोलन से जुड़े घटनास्थल आज खंडहरों की शक्ल में हैं. मडगांव स्थित एक सुनसान पार्क में डॉ लोहिया की आदमकद मूर्ति लगी है. जिस अगुआड़ा जेल में डॉ लोहिया समेत सभी वरिष्ठ नेता रहे थे, उसके रखरखाव का कोई प्रबंध नहीं है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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