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जबरन अंग निकालने के खिलाफ दुनिया में हाहाकार, 5 लाख से ज्यादा लोगों ने चीन के खिलाफ फूंका बिगुल, G7 और भारत से सख्त कार्रवाई की मांग

Forced Organ Harvesting China: दुनिया के अलग-अलग देशों से उठ रही आवाजें अब एक साथ जुड़ती दिख रही हैं. मुद्दा बेहद गंभीर है और आरोप उससे भी ज्यादा डराने वाले. बात हो रही है चीन में जबरन अंग निकाले जाने की. इस मामले में अब आम लोग ही नहीं, बल्कि सांसद, डॉक्टर और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी खुलकर सामने आ गए हैं. द एपोक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि इस मुद्दे पर दुनिया भर में पांच लाख से ज्यादा लोग एक याचिका के जरिए प्रशासनों से कार्रवाई की मांग कर चुके हैं. TET की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 5,05,970 लोग उस याचिका पर हस्ताक्षर कर चुके हैं, जिसमें चीन की कम्युनिस्ट प्रशासन पर कैदियों के अंग जबरन निकालने का आरोप लगाया गया है. ये हस्ताक्षर 34 देशों से आए हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है.

Forced Organ Harvesting China in Hindi: G7 और हिंदुस्तान से भी कार्रवाई की अपील

इस याचिका का मकसद सिर्फ विरोध दर्ज कराना नहीं है, बल्कि दुनिया की बड़ी ताकतों से सीधे कदम उठाने की मांग करना है. याचिका में जिन देशों से अपील की गई है, उनमें शामिल हैं G7 देश में अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ब्रिटेन और इनके अलावा हिंदुस्तान, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, इजराइल, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताइवान भी शामिल है. कुल मिलाकर 14 देशों से एक साथ चीन के खिलाफ बोलने की मांग की गई है.

किसने और कब शुरू की यह याचिका

यह याचिका जुलाई 2024 में शुरू की गई थी. इसे शुरू करने वाले दो बड़े संगठन हैं Doctors Against Forced Organ Harvesting (DAFOH) और International Coalition to End Transplant Abuse in China. इन संगठनों का कहना है कि चीन में जो हो रहा है, वह मानवता के खिलाफ अपराध है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में जिन लोगों के अंग जबरन निकाले जा रहे हैं, वे आम अपराधी नहीं हैं. इन्हें प्रिजनर्स ऑफ कॉन्शियंस कहा जाता है. इसमें शामिल हैं फालुन गोंग के अनुयायी, उइगर मुस्लिम, अन्य धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यक. आरोप है कि इन लोगों को जेल में रखकर उनके अंग ट्रांसप्लांट के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं.

सांसद भी मैदान में उतरे

याचिका के सामने आने से पहले ही दुनिया भर में सैकड़ों सांसदों ने भरोसा दिलाया है कि वे अपने-अपने देशों में ऐसे कानून लाने की कोशिश करेंगे, जिससे जबरन अंग निकालने की प्रथा पर रोक लगाई जा सके. DAFOH के कार्यकारी निदेशक डॉ. टॉर्स्टन ट्रे ने द एपोक टाइम्स से कहा कि हम यह मुद्दा सीधे प्रशासनों के सामने रख रहे हैं, ताकि उन्हें पता चले कि आम लोग इस अमानवीय काम को खत्म होते देखना चाहते हैं. उनका कहना है कि यह अभियान जनता की मांग को सीधे फैसले लेने वालों तक पहुंचाने का तरीका है.

25 साल से चल रहे उत्पीड़न का आरोप

डॉ. ट्रे ने यह भी कहा कि यह मामला सिर्फ अंग निकालने तक सीमित नहीं है. उनके अनुसार यह है कि चीन में फालुन गोंग के खिलाफ पिछले 25 साल से उत्पीड़न चल रहा है और यह याचिका उस सच्चाई को भी सामने लाती है. याचिका में लंदन स्थित चाइना ट्रिब्यूनल की 2019 की रिपोर्ट का भी जिक्र है. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन में बड़े पैमाने पर जबरन अंग निकाले गए. सबसे ज्यादा शिकार बने फालुन गोंग अनुयायी. यह जानकारी भी द एपोक टाइम्स (TET) के हवाले से दी गई है. डॉ ट्रे ने बताया कि उनकी संस्था ने 2012 से 2018 के बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त को भी याचिका दी थी. इसमें 30 लाख से ज्यादा लोग जुड़े थे, लेकिन नियमों की जटिलता के कारण संयुक्त राष्ट्र की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. (500k Sign Petition G7 India Action in Hindi)

अब अगला लक्ष्य क्या है

DAFOH का कहना है कि यह अभियान यहीं नहीं रुकेगा. अब लक्ष्य है कि जून 2026 तक 10 लाख हस्ताक्षर जुटाना. डॉ ट्रे को भरोसा है कि जिस रफ्तार से लोग जुड़ रहे हैं, यह आंकड़ा आसानी से पार हो जाएगा. याचिका में 14 देशों से मांग की गई है कि वे यह है कि चीन के जबरन अंग निकालने की खुलकर निंदा करें. इसे तुरंत बंद करने की मांग करें. अपने नागरिकों को चीन में ट्रांसप्लांट कराने से रोकें. चीन के साथ ट्रांसप्लांट से जुड़ी साझेदारियां खत्म करें. हर साल संसद में इस मुद्दे पर चर्चा करें और जिम्मेदार लोगों पर जांच और कार्रवाई शुरू करें.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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