Hot News

जब बिहार में एक साथ बिछा दी गईं थीं 30–40–50 लाशें,  नरसंहारों की कहानी कंपा देगी रूह

Table of Contents

Naxalism and Massacre In Bihar: बिहार में नरसंहारों का दौर 1980 के दशक में शुरू हुआ था, जब जातीय लड़ाई की वजह से 1977 में बेलछी का नरसंहार हुआ था. उसके बाद तो 90 के दशक में नरसंहारों का चरम रहा, हालांकि 2000 के आते-आते नरसंहारों पर लगाम कस गई और नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद तो नरसंहारों का युग समाप्त ही हो गया. आज भी जब बिहार के नरसंहारों की चर्चा होती है, तो लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. जो लोग बिहार और वहां की नेतृत्व से परिचित नहीं हैं, उनके लिए यह जानना जरूरी है कि बिहार में नरसंहारों और नक्सलवाद के बीच अटूट संबंध क्यों और कैसे था.

नक्सलवाद और बिहार में होने वाले नरसंहारों के बीच संबंध

नक्सलवाद का जन्म बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में 1967 में हुआ था. यह गांव दार्जिलिंग जिले में पड़ता है. नक्सलवादी आंदोलन का उद्देश्य समाज में व्याप्त असमानता को मिटाना और गरीब किसानों को उनका हक दिलाना था. नक्सलवाद का प्रसार बंगाल से ही बिहार में हुआ. चूंकि बिहार में उस वक्त सामाजिक असमानता बहुत ज्यादा थी, इसलिए नक्सलवाद को सहजता से पैर पसारने में मदद भी मिल गई. Hello Bastar: The Untold Story of India’s Maoist Movement नामक किताब में पत्रकार और लेखक राहुल पंडित ने लिखा है कि नक्सलवाद ने बिहार में भूमिहीन दलित मजदूरों को संगठित किया. किताब में राहुल पंडित लिखते हैं कि बिहार में नक्सलवाद एक विचारधारा के रूप में नहीं बल्कि एक जरूरत के रूप में पनपी. जिस वक्त नक्सलवाद बंगाल में जन्मा उस वक्त बिहार में जमींदारों का अत्याचार चरम पर था और गरीबों का साथ पुलिस भी नहीं दे रही थी और राज्य भी इस मुद्दे को हल करने में कोई रुचि नहीं ले रही थी, यही वजह था कि जब बंगाल से होते हुए नक्लवाद ने बिहार में दस्तक दी, तो यहां के गरीबों ने सहजता से अपने द्वार खोल दिए.

नक्सलवाद ने जातीय संघर्ष को बढ़ाया

बिहार में जब नक्सलवाद का प्रवेश हुआ, तो इसका उद्देश्य कोई जातीय संघर्ष कराना नहीं था. दरअसल कम्युनिस्ट विचारधारा में सबके लिए समानता की बात की जाती है और गरीबों के उत्थान की बात की जाती है. उस वक्त बिहार की जो सामाजिक स्थिति थी उसमें दलित ही पिछड़े और शोषित थे और सवर्ण जाति के लोग जमींदार और शोषक. इसी वजह से दलितों और सवर्णों के बीच एक विभाजक रेखा यानी बांटने वाली रेखा खिंच गई, जो जातीय संघर्ष की वजह बना.वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवास बताते हैं कि कम्युनिस्ट विचारधारा में जातीय संघर्ष के लिए कोई जगह नहीं थी और ना ही यह विचारधारा जाति को महत्व देती है. हां, यह गरीबों की बात करती है. जब नक्सलवाद बिहार में आया और इसने गरीबों की आवाज बनने की कोशिश की, तो यह स्वाभाविक रूप से दलितों और सवर्णों के बीच विवाद का कारण बन गया, क्योंकि यहां की सामाजिक स्थिति में सवर्ण अमीर और दलित गरीब थे.नक्सली शोषण के खिलाफ बंदूक उठाने को तैयार थे, जिसकी वजह से वर्ग संघर्ष बढ़ा और नरसंहारों का दौर भी शुरू हुआ.

नक्सली बने शोषितों की आवाज और बंदूक उठाया

दलित समाज वर्षों से शोषित और पीड़ित था. नक्सलवाद के प्रभाव में उनकी दबी हुए आवाज को मुखरता मिली और दलितों ने अपना शोषण करने वालों के खिलाफ हथियार उठा लिया. जब दलित मुखर हुए तो सवर्णों खासकर भूमिहारों के लिए यह बात उनके आन के खिलाफ गई और उन्होंने दलितों को कुचलने के लिए उनका नरसंहार शुरू किया और फिर यह सिलसिला चल पड़ा.दलितों के साथ क्रूरता इसलिए की गई क्योंकि उन्होंने शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की थी, उनपर नक्सलियों का समर्थक होने का आरोप लगा और उनके गांव के गांव जला दिए गए. स्त्रीओं और बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया. एक साथ 30-40-50 लोगों को मार दिया जाता था, क्योंकि उनकी सामाजिक हैसियत कम थी और वे कमजोर थे.

नरसंहार और तत्कालीन प्रशासनों की भूमिका

बिहार में जिस वक्त पहला नरसंहार हुआ था, देश में जनता पार्टी की प्रशासन थी. लेकिन बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू था, यानी एक तरह से बिहार में भी जनता पार्टी की ही प्रशासन थी. 1977 के बेलछी नरसंहार को प्रशासनों ने बहुत महत्व नहीं दिया था, बाद में जब समाचार राष्ट्रीय मीडिया में आने लगी तो इस ओर प्रशासन का ध्यान गया. बेलछी के बाद कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने. नरसंहारों में दलितों को ज्यादा नुकसान हुआ, उस वक्त यह कहा गया कि प्रशासनें सवर्णों की हितैषी थी, लेकिन जब बिहार में पिछड़ों के सर्वाधिक सशक्त देता लालू यादव सत्ता में थे, तो लक्ष्मणपुर बाथे और शंकर बिगहा जैसा नरसंहार हुआ,जिसमें दलितों के गांव जला दिए गए और बच्चों और स्त्रीओं को भी नहीं छोड़ा गया. कहने का आशय यह है कि नरसंहारों को रोकने में नेतृत्वक पार्टियों की रुचि नहीं दिखती थी, जिसकी वजह से गरीबों को न्याय नहीं मिला, लेकिन 2005 में जब नीतीश कुमार की प्रशासन बिहार में आई तो प्रशासन ने नक्सलियों और रणवीर सेना दोनों पर लगाम कसी और इन्हें लगातार कमजोर किया, जिसकी वजह से बिहार से एक तरह से जातीय संघर्ष समाप्त हुआ और नरसंहारों का दौर थमा. रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर मुखिया को 2002 में गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद नरसंहारों पर लगाम कसने का दौर शुरू हुआ. अगले अंक में पढ़ें -कौन था रणवीर सेना का संस्थापक ब्रह्मेश्वर मुखिया और उसके आतंक की कहानी.

बिहार के प्रमुख नरसंहार

1. बेलछी नरसंहार (1977)

पीड़ित: दलित समुदाय के लोग, 11 लोगों को गोली मारकर आग में झोंक दिया गया था.

2. पारसबिगहा नरसंहार (1992)

पीड़ित:  जहानाबाद का दलित समुदाय, सवर्णों ने 35 दलितों की हत्या की.

3. बथानी टोला नरसंहार (1996)

पीड़ित: दलित समुदाय, 21 लोगों की हत्या की गई जिसमें स्त्रीएं और शिशु भी शामिल थे.

4. लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार (1997)

पीड़ित: दलित समुदाय, 58 दलितों की हत्या की गई थी.

5. शंकरबिगहा नरसंहार (1999)

पीड़ित: दलित समुदाय, 23 दलितों की हत्या की गई थी.

Also Read : बेलछी गांव में हुआ था बिहार का पहला नरसंहार, 11 दलित की हत्या कर आग में झोंक दिया गया था

पंबन ब्रिज और रामसेतु का है रामेश्वरम से खास नाता, क्यों प्रशासन ने बनाई थी रामसेतु को तोड़ने की योजना

क्या है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, कैसे करता है काम?

हिंदू और मुसलमान के बीच हिंदुस्तान में नफरत की मूल वजह क्या है?

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

The post जब बिहार में एक साथ बिछा दी गईं थीं 30–40–50 लाशें,  नरसंहारों की कहानी कंपा देगी रूह appeared first on Naya Vichar.

Spread the love

विनोद झा
संपादक नया विचार

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

About Us

नयाविचार एक आधुनिक न्यूज़ पोर्टल है, जो निष्पक्ष, सटीक और प्रासंगिक समाचारों को प्रस्तुत करने के लिए समर्पित है। यहां राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, तकनीक, शिक्षा और मनोरंजन से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर को विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाता है। नयाविचार का उद्देश्य पाठकों को विश्वसनीय और गहन जानकारी प्रदान करना है, जिससे वे सही निर्णय ले सकें और समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

Quick Links

Who Are We

Our Mission

Awards

Experience

Success Story

© 2025 Developed By Socify

Scroll to Top