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झारखंड का एक गांव, जिसने 40 साल के संघर्ष के बाद हटाया बेचिरागी का ठप्पा

कुचाई से लौटकर मनोज सिंह की रिपोर्ट

Success Story: झारखंड के सरायकेला-खरसांवा जिले का कुचाई प्रखंड का रायसिंहदिरी गांव आज बदलाव की एक नई इबारत लिख रहा है. जो गांव कभी प्रशासनी दस्तावेजों में ‘बेचिरागी’ (बिना आबादी वाला) था और जहां के निवासियों को वन विभाग ‘अतिक्रमणकारी’ मानकर मुकदमे दर्ज करता था, आज वह गांव बिजली, पानी, सड़क और चार पहिया वाहनों से लैस है. यह बदलाव रातों-रात नहीं आया, बल्कि इसके पीछे ग्रामीणों का 40 वर्षों का लंबा और कड़ा संघर्ष है.

बेचिरागी गांव में विकास का चिराग

बेचिरागी गांव रायसिंहदिरी अब पूरी तरह चिरागवान है. रोशन है. बिजली है. पानी है. खेती हो रही है. लोगों की कमाई भी हो रही है. गांव के शिशु स्कूल भी जाते हैं. गांव में एक ग्रामीण पोस्ट ऑफिस भी है. पूरा गांव खुशहाल है. घर में चार चक्का और दो चक्का की गाड़ी भी है. लोगों के पास रोजगार भी है. उनके तैयार उत्पाद आज देश के कोने-कोने में जा रहे हैं. रायसिंहदिरी ऐसे ही नहीं बदल रहा है. इसके पीछे यहां रहने वाले लोगों का संघर्ष है. इनके वर्षों के संघर्ष के कारण ही गांव को 3406.45 एकड़ पर सामुदायिक वन पट्टा (सीएफआर) मिला. निजी वन पट्टा (आइएफआर) मिला. सामुदायिक और निजी वन पट्टा ने गांव की साक्षा संपत्ति (कॉमंस) पर अधिकार दिलाया. अधिकार पाने के लिए यहां के ग्रामीणों का सीधा संघर्ष 40 साल से अधिक पुराना है.

गांव वालों को अतिक्रमणकारी मानता था वन विभाग

इस गांव में रहने वाले इलाके पर वन विभाग का अधिकार था. वन विभाग इनको अतिक्रमणकारी मानते थे. उनको गांव में रहने नहीं देते थे. कई बार गांव के लोगों को अतिक्रमणकारी बताकर मुकदमे फंसाया गया. 1964-65 में जमीन की सर्वे में यहां जंगल और पहाड़ को वन विभाग के खाते में डाल दिया गया. ग्रामीण इसको मानने के लिए तैयार नहीं थे. 1995 तक ग्रामीणों पर पांच बार केस किया. गांव के लोगों का नाम मतदाता सूची में नहीं जोड़ा जाता था. इसको राजस्व ग्राम का दर्जा भी नहीं था. इस कारण यहां प्रशासनी योजना का कोई लाभ नहीं था. सड़क, बिजली, पानी, राशन की व्यवस्था भी नहीं थी.

जंगल बचाओ आंदोलन के साथियों ने ग्रामीणों को दी ताकत

वर्ष 2000 के आसपास स्थानीय निवासी सोहनलाल वहां पहुंचे. उनके अभियान का साथी बने. झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के पूर्व सांसद डॉ रामदयाल मुंडा (अब स्व), एलेस्टर बोदरा, क्लेमेंट मुंडूु, संजय बसु मल्लिक ने सोहनलाल के अभियान को ताकत दी. ग्रामीणों की लड़ाई को आगे बढ़ाया. शुरू में ग्रामीणों ने इनको वहां से भगा दिया था. गांव वालों का कहना था कि यह प्रशासनी आदमी है. बाद में ग्रामीणों को समझ में आया कि वह सहयोग कर सकते हैं. उनको बताया कि वन विभाग से जमीन वापस लिया जा सकता है. बाद में तैयार होने पर ग्रामीण इनके साथ हो गये.

2005 में आये ने एफआरए ने जगायी उम्मीद

2005 में हिंदुस्तान प्रशासन वन अधिकार कानून (एफआरए) लेकर आयी. इसने राय सिंहदिरी के ग्रामीणों को उम्मीद जगा दिया. इसमें 13 दिसंबर से पहले से गांव में रहने वाले लोगों को जंगल और जमीन पर अधिकार देने का प्रावधान था. ग्रामसभा को जंगल के संरक्षण और संवर्द्धन का भी अधिकार था. 2011 में पहला वन पट्टा मिला. करीब छह साल की लड़ाई के बाद यहां रहने वाले 145 परिवार को एक-एक कर व्यक्तिगत वन पट्टा (आइएफआर) दिया गया. इसके बाद ग्रामीणों ने पहाड़ की जमीन को समतल करना शुरू किया. खेती शुरू किया. आज यही खेत गांव के लोगों की आजीविका का सबसे बड़ा साधन है. गांव में अब तालाब भी खुद गया है. मछली भी पाला जा रहा है. सिंचाई की सुविधा भी है.

2020 में मिला पहला सीएफआर

आइएफआर मिलने के बाद ग्रामीणों ने आसपास के जंगल को बचाने के लिए 2012 में सीएफआर और सीएफआर (आर) का दावा किया. इसके लिए कई बार ग्रामीणों ने प्रशासन से आग्रह किया. कई बार सुनवाई के बाद 2020 में रायसिंहदिरी को सामुदायिक वन पट्टा मिला. इसके बाद ग्रामीणों ने वहां के साझा संसाधन को बचाना शुरू किया. गांव आज जंगलों से भर गया है. कई नये जंगल बन गये हैं. गांव के प्रधान गोपाल सिंह मुंडा बताते हैं कि सामुदायिक वन पट्टा मिलने के बाद स्थिति काफी बदल गयी है. हम लोगों ने सामूहिक रूप से चिरौंजी इकट्ठा किया था. इसको लाखों रुपये में बेचा. हर्रा भी जमा किया है. वन संसाधन विकसित हो रहा है.

6.5 फीसदी करक्यूमिन है हल्दी में

हल्दी में पाया जाने वाला मुख्य जैवसक्रिय यौगिक करक्यूमिन है. जो इसके सूजनरोधी, एंटीऑक्सीडेंट और उपचार गुणों के लिए जिम्मेदार है. हल्दी में आमतौर पर केवल दो से पांच फीसदी तक करक्यूमिन होता है, इसलिए अधिक चिकित्सीय लाभ के लिए पूरक आहार की आवश्यकता हो सकती है. कुचाई से रायसिंहदिरी गांव के लोग वर्षों से हल्दी की खेती करते आये हैं. संजय बसु मल्लिक बताते हैं कि यहां की हल्दी में 6.5 फीसदी करक्यूमिन मिला है. यह हम लोगों ने वैज्ञानिक पद्धति से जांच करायी है. अब तो इसकी मार्केटिंग भी होने लगी है. प्रोसेस हल्दी 200 रुपये किलो है. अब तो गांव वालों ने प्रोसेसिंग के लिए मशीन भी लगा लिया है.

गांव का इतिहास भी है रोचक

कुचाई ब्लॉक के छोटा सेवाई पंचायत का यह गांव (रायसिंहदिरी) चारों ओर पहाड़ सेे घिरा है. जमीन से करीब छह से सात किलोमीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है. आज इस गांव तक जाने के लिए पीसीसी रास्ता है. चार चक्के का बड़ा वाहन ही गांव तक जाता है. दो चक्के के वाहन को जाने के लिए भी परेशानी होती है. गांव से जाने वाला रास्ता कहीं-कहीं 60 से 70 डिग्री में बना हुआ है. गांव का इतिहास भी रोचक है. 1400 ईस्वी के आसपास यह गांव बेचिरागी (बिना आबादी वाला) हो गया था. हाथी के प्रकोप और महामारी के कारण सभी लोग पहाड़ और जंगल छोड़ नीचे आ गये थे. प्रशासन ने 1965-66 में सर्वे करना शुरू किया था, तो ग्रामीणों को पता चला कि जहां, रहते थे, उसे वन विभाग अपना बता रहे हैं. इसका ग्रामीणों ने आपत्ति करना शुरू किया. 1980 तक यहां 700 आदमी आ गये थे. पहाड़ पर ही रहकर अपने अधिकार की लड़ाई शुरु की.

क्या-क्या अधिकार मिला

  • वन संसाधन पर पारंपरिक उपयोग का अधिकार
  • सूखी लकड़ी के उपयोग का अधिकार
  • वनोपज संग्रह का अधिकार
  • मवेशी चराने का अधिकार
  • जंगल की जैव विविधता पर अधिकार
  • सांस्कृति पर अधिकार
  • रीति-रिवाज के संरक्षण का अधिकार
  • वनों को पुनर्जीवित करने का अधिकार
  • वन प्रबंधन का अधिकार

आज क्या-क्या सुविधा है गांव में

  • 90 लोगों को मिल चुका है अबूआ आवास
  • सबका राशन कार्ड
  • सभी वृद्धों को वृद्धा पेंशन
  • आनंगबाड़ी सेंटर
  • प्राथमिक स्कूल
  • सड़क
  • बिजली
  • पेयजल सुविधा (सोलर सहित)
  • सभी का स्वास्थ्य बीमा
  • बैकों से लोन मिल रहा

रायसिंहदिरी प्रयोग की कहानी

झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संजय बसु मल्लिक ने कहा कि रायसिंहदिरी एक प्रयोग की कहानी है. यहां रहने वाले लोगों को जागरूक करना. उनकी लड़ाई लड़ना आसान नहीं था. आज तो यहां बिजली, पानी, सड़क दिख रहे हैं. एक समय यहां कुछ नहीं था. पैदल जाने का रास्ता भी नहीं था. लेकिन, जंगल की लड़ाई को इन्होंने अपने स्तर से लड़ी. वह चाहते हैं कि सामुदायिक संसाधन पर उनको अधिकार मिले. उनको हक मिले. आज हक मिला, तो चीजें बदल गयी है. स्थिति बदल गयी है. यह दूसरों के लिए उदाहरण हो रहा है. प्रशासनी और गैर प्रशासनी संस्थाएं भी सहयोग कर रही है. गांव में संपन्नता आ रही है.

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क्या कहते हैं सोहन लाल

सबसे पहले यहां ग्रामीणों को संगठित कर लड़ाई शुरू करने वाले जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक सदस्य सोहन लाल कुम्हार बताते हैं कि गांव को अधिकार आसानी से नहीं मिला है. इसके पीछे बड़ा संघर्ष है. कई बार जेल जाना पड़ा है. ग्रामीणों को प्रताड़ित होना पड़ा है. तब जाकर गांव वालों को अधिकार मिला है. आज गांव की व्यवस्था बदल गयी है. आधारभूत सुविधाएं भी है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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