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झारखंड की अनोखी होली, परंपरा, शालीनता और संस्कृति का रंग

Holi in Jharkhand: होली को अक्सर रंग, मस्ती और हुड़दंग से जोड़ा जाता है. कई जगहों पर तेज संगीत, अश्लील गाने और नशे का माहौल भी देखने को मिलता है. लेकिन झारखंड के कई गांवों में होली बिल्कुल अलग अंदाज में मनाई जाती है. यहां न तो अश्लील गाने बजते हैं और न ही हुड़दंग होता है. यहां होली शालीनता, परंपरा और आपसी सम्मान के साथ स्पोर्ट्सी जाती है. इन गांवों में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अपनी विरासत और संस्कृति को आगे बढ़ाने का अवसर है. लोग मौज-मस्ती भी करते हैं, लेकिन मर्यादा और परंपरा का पूरा ध्यान रखते हैं.

लातेहार के पोचरा गांव की राख वाली होली

लातेहार मुख्यालय से करीब आठ किलोमीटर दूर पोचरा गांव में होली आज भी प्राचीन रीति-रिवाजों के साथ मनाई जाती है. होलिका दहन के अगले दिन सुबह ग्रामीण मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं. इसके बाद “चुलेही होली” की शुरुआत होती है. यहां लोग राख से होली स्पोर्ट्सते हैं. राख को अहंकार और नकारात्मकता के अंत का प्रतीक माना जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा उन्हें अपने पूर्वजों से मिली है. ढोलक और मजीरे की थाप पर लोकगीत गाए जाते हैं. यहां की होली राधा-कृष्ण के प्रेम और वसंत ऋतु के आगमन का संदेश देती है.

कोडरमा में कीर्तन और कीचड़ की होली

कोडरमा जिले के सतगावां प्रखंड के कई गांवों में आज भी पारंपरिक होली मनाई जाती है. होलिका दहन के दिन ढोलक-झाल के साथ गाना-बजाना होता है. मरचोई, माधीपुर, टेहरी, शिवपुर, नावाडीह और समलडीह जैसे गांवों में लोग पौराणिक शैली में होली स्पोर्ट्सते हैं. गांव के चौक-चौराहों पर कीर्तन मंडली द्वारा भजन-गीत प्रस्तुत किए जाते हैं. कुछ स्थानों पर कीचड़ की होली स्पोर्ट्सने की भी परंपरा है. इसके बाद होलिका दहन की राख को उड़ाने की रस्म निभाई जाती है. यह सब मिलकर होली को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप देते हैं.

गुमला में तीन दिन का डोल जतरा

गुमला जिले में होली के साथ “डोल जतरा” का आयोजन होता है. यह उत्सव तीन दिनों तक चलता है. आदिम जनजातियां आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं. बिशुनपुर प्रखंड के पतारी क्षेत्र के पौलपील पाट में हर साल डोल जतरा लगता है. इस दौरान पूजा-पाठ, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं. पढ़े-लिखे युवक-युवती भी अपने पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं. वे इसे केवल त्योहार नहीं, बल्कि अपनी पहचान मानते हैं.

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बिशुनपुर में परंपरा और पकवान

बिशुनपुर क्षेत्र में डोल जतरा के दौरान पारंपरिक खान-पान का खास आकर्षण होता है. यहां आदिम जनजाति के लोग अपने पारंपरिक व्यंजन बनाकर स्टॉल लगाते हैं. इस मौके पर शादी-ब्याह के लिए लड़का-लड़की देखने की परंपरा भी निभाई जाती है. बदलते समय के साथ रहन-सहन और पहनावे में बदलाव आया है, लेकिन परंपरा आज भी जीवित है.

जरियागढ़ की ऐतिहासिक डोल होली

झारखंड में ब्रज जैसी होली का अनुभव करना हो, तो जरियागढ़ की डोल होली खास मानी जाती है. यह परंपरा करीब 300 साल पुरानी बताई जाती है. यहां होली केवल रंगों का स्पोर्ट्स नहीं, बल्कि आस्था और अनुशासन का प्रतीक है. सखुआ की डालियों और पलाश के फूलों से भगवान कृष्ण, सुभद्रा और बलभद्र की डोली सजाई जाती है. भजन-कीर्तन के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है. जनजातीय और स्थानीय भाषा में गीत गाए जाते हैं, जिससे माहौल भक्तिमय बन जाता है.

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परंपरा में बसती है असली होली

झारखंड के इन गांवों में होली सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि संस्कृति और सम्मान की होली है. यहां लोग नशा या अश्लीलता से दूर रहकर प्रेम और भाईचारे के साथ त्योहार मनाते हैं. इन परंपराओं को देखकर यह समझ आता है कि होली का असली अर्थ आपसी मेल-मिलाप, खुशी और संस्कृति को सहेजने में है. ऐसी होली न केवल त्योहार को खास बनाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़कर भी रखती है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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