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झारखंड की एक ऐसी जगह जहां हर साल लगता है महिलाओं का मेला, पुरुषों की एंट्री बैन

शचिंद्र कुमार दाश/धीरज कुमार

Saraikela-Kharsawan: झारखंड न केवल खनिज संपदा में समृद्ध है, बल्कि यहां संस्कृति भी काफी विकसित और समृद्ध है. झारखंड के सरायकेला-खरसांवा जिले में एक जगह ऐसी है, जहां पर मकर संक्रांति के बाद पहले शनिवार को सिर्फ और सिर्फ स्त्रीओं का मेला लगता है. खास बात यह है कि स्त्रीओं के इस मेले में पुरुर्षों का प्रवेश वर्जित है. इस मेले में झारखंड ही नहीं, पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी स्त्रीएं आती हैं. यह जगह सरायकेला-खरसावां की खरकई नदी के बीचोंबीच स्थित मिर्गी चिगड़ा जगह है, जहां पर शनिवार को भी स्त्रीओं का मेला लगा.

मेले में कहां-कहां से आईं स्त्रीएं

इस मेले में सरायकेला, खरसावां, राजनगर, जमशेदपुर, सीनी के साथ ही पड़ोसी राज्य ओड़िशा से भी स्त्रीएं पहुंची थीं. मेला में पहुंची स्त्रीओं ने पारंपरिक रुप से वनभोज का आनंद उठाया. खरकई नदी के बीचों बीच स्थित चट्टानों पर स्त्रीओं ने मनपसंद व्यंजन का जायका लिया. यहां अलग अलग ग्रुप में स्त्रीयें पहुंची थी. कई स्त्रीओं को यहां के मनोरम वादियों के बीच भोजन तैयार कर खाते देखा गया. तो कई स्त्रीयें अपने घर से ही व्यंजन तैयार कर मेला में पहुंची थी.

मेला में स्त्रीओं ने पकाया शाकाहारी भोजन

मेला में पहुंची स्त्रीओं ने साकाहारी भोजन किया. यहां मांशाहारी भोजन करना निषेध है. मेला में लगाए गए अधिकांश दुकानदार भी स्त्रीएं ही थीं. शनिवार को सुबह से शाम तक बच्चों के साथ स्त्रीओं का मिर्गी चिगड़ा में आना-जाना लगा रहा. हर साल मकर संक्रांति के बाद पहले शनिवार को खरकई नदी के बीच में स्थित मिरगी चिगड़ा में स्त्रीओं का मेला लगता है. मेला में अपने बच्चों के साथ जाकर पिकनिक मनाती हैं. दिन भर आनंद उठाते हुए शाम को घर वापस लौट जाती हैं.

बाबा गर्भेश्वर की हुई पूजा अर्चना

मिर्गी चिगड़ा में शनिवार को बाबा गर्भेश्वर नाथ की पूजा-अर्चना कर अपने परिवार के सुख समृद्धि की कामना की गई. यहां पहुंची स्त्रीएं पहले नदी के बीचों-बीच स्थित बाबा गर्भेश्वर नाथ की पूजा-अर्चना की. फिर मेला में घुमने के साथ साथ पारंपररिक भोजन का लुफ्त उठाया. बड़ी संख्या में शिशु खरकई नदी के स्वच्छ पानी में डूबकी लगाते भी देखे गये. मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे दिल से पूजा करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है. स्थानीय किवंदंती के अनुसार, महाहिंदुस्तान में पांडव पुत्र के अज्ञातवास के समय यहां पहुंचे थे और विश्राम किया था. पत्थरों पर उभरे उनके पदचिह्न आज भी दिखाई देते हैं.

मेला में पुरुषों का प्रवेश वर्जित

क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि स्त्री मेला में पुरुषों का प्रवेश हमेशा से वर्जित रहा है. परंतु वर्तमान समय में स्त्रीओं के इस मेला में पुरुष भी पहुंच रहे हैं. इस बार भी भी मेला में इक्का-दुक्का पुरुषों को भी देखा गया. हालांकि, अब भी स्त्रीओं की संख्या काफी अधिक थी.

क्या कहती हैं श्रद्धालु

मेले में आई कन्या कुमारी साहू ने कहा, ‘मिर्गी चिंगडा का मेला हमारी परंपरा से जुड़ा हुआ है.पहले यहां बचपन से आ रहे हैं. पहले बाबा गर्भेश्वर नाथ की पूजा-अर्चना करते है, उसके बाद पिकनिक का आनंद लेते हैं.’ एक अन्य श्रद्धालु कल्पना दास कहती हैं, ‘मिर्गी चिंगडा का मेला हमारी ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा हुआ है. ऐसे आयोजनों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है.’ वहीं, रानी कुमारी कहती हैं कि मेला का ऐतिहासिक महत्व है. इस मेले में पहले केवल स्त्रीएं ही आती थीं, लेकिन अब पुरुष भी मेला में पहुंचने लगे है.

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बाबा गर्भेश्वर की पूजा से मिलते हैं सुयोग्य वर

सुरमा साहू ने कहा कि मिर्गी चिंगडा के मेले में हर वर्ष पहुंचना रोमांचित करता है. जिन स्त्रीओं से पूरे साल कभी कभार मुलाकात नहीं होती है, मेला में उनसे मिलकर अच्छा लगता है. ज्योति जामुदा का कहना है कि यहां की प्राकृतिक सौंदर्यता काफी सुकुन देता है. यहां अपनों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है. सुषमा पति ने कहा कि मकर संक्रांति के बाद मिर्गी चिंगड़ा में मेला आयोजित होता है. यह मेला राजराजवाड़े के समय से चला आ रहा है. माधुरी पति के अनुसार, मिर्गी चिंगड़ा मेला के दौरान बाबा गर्भेश्वर महादेव की पूजा की जाती है. मान्यता है कि कुंवारी कन्याओं द्वारा बाबा की पूजा करने से सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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