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झारखंड बिहार की पेंच में फंसा उत्तर कोयल परियोजना उवि, पहुंचा बंदी के कगार पर

उत्तर कोयल परियोजना उच्च विद्यालय मोहम्मदगंज केवल एक शैक्षणिक संस्था नहीं, बल्कि स्थानीय समाज का आधार स्तंभ है. यह विद्यालय शिक्षा, लोकतंत्र और प्रशासनी संपत्ति की सुरक्षा तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है. विद्यालय को बचाने के लिए संघर्ष समिति का गठन स्थानीय लोगों ने किया है. झारखंड प्रशासन और शिक्षा विभाग इस विद्यालय को अधिग्रहित कर शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करें. तभी विद्यालय का गौरवशाली इतिहास पुनः जीवित हो सकेगा और आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा का अधिकार मिल सकेगा. पंहले विद्यालय का संचालन जल संसाधन विभाग, बिहार प्रशासन द्वारा किया जाता रहा विभाजन के बाद इसे शिक्षा विभाग में अधिग्रहित नहीं किया सिंचाई विभाग ही संचालित कर रहा है पहले 11 शिक्षक थे, जिसमें 10 सेवानिवृत्त हो गये फोटो 29 डालपीएच 14 प्रतिनिधि, मोहम्मदगंज पलामू जिले के मोहम्मदगंज प्रखंड में स्थित उत्तर कोयल परियोजना उच्च विद्यालय पिछले चार दशकों से शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र रहा है. वर्ष 1985 में इस विद्यालय की स्थापना उत्तर कोयल सिंचाई परियोजना परिसर में की गयी थी. इसका उद्देश्य सिंचाई परियोजना के कर्मियों के बच्चों और आसपास के ग्रामीण विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना था. अगले ही वर्ष 1986 में बिहार प्रशासन के उपशिक्षा निदेशक द्वारा विद्यालय की स्थापना को औपचारिक अनुमति प्रदान की गयी. तब से यह विद्यालय जल संसाधन विभाग, बिहार प्रशासन के अधीन संचालित होता रहा. राज्य विभाजन के बाद की स्थिति बिहार-झारखंड राज्य विभाजन के पश्चात इंद्रपुरी, तेनुघाट, कोसी, बीरपुर और बाल्मीकिनगर जैसे अन्य परियोजना विद्यालयों को शिक्षा विभाग ने अधिग्रहित कर लिया. लेकिन मोहम्मदगंज का यह विद्यालय शिक्षा विभाग में शामिल नहीं हो सका. यही कारण है कि यहां शिक्षकों की नियमित पदस्थापना नहीं हो पायी. समय के साथ विद्यालय में कार्यरत नौ शिक्षक, दो चतुर्थवर्गीय कर्मचारी और एक रात्रि प्रहरी सेवानिवृत्त हो गये. वर्तमान में केवल एक शिक्षक, चंद्रशेखर मेहता, कार्यरत हैं, जो अगले वर्ष सेवानिवृत्त होने वाले हैं. संकट की गहराती तस्वीर शिक्षकों की कमी के कारण विद्यालय में छात्रों की उपस्थिति लगातार घट रही है. कभी पलामू जिले के मैट्रिक परिणामों में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाला यह विद्यालय अब बंद होने की स्थिति में पहुंच गया है. यह स्थिति न केवल शिक्षा के लिए हानिकारक है, बल्कि प्रशासनी संपत्ति के लिए भी खतरा है. विद्यालय के पास भवन, चहारदीवारी, स्पोर्ट्स मैदान, शौचालय, पेयजल और अन्य आधारभूत सुविधाएं मौजूद हैं. लेकिन यदि विद्यालय बंद हो गया तो इन संसाधनों पर अनधिकृत कब्जा, चोरी और बर्बादी की आशंका बढ़ जायेगी. मतदान केंद्र के रूप में महत्व इस विद्यालय का महत्व केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है. विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान यहां तीन मतदान केंद्र स्थापित किए जाते हैं. इनमें माहूर गांव का मतदान केंद्र संख्या 43 अति संवेदनशील माना जाता है. यदि विद्यालय बंद हो गया तो इन मतदान केंद्रों को अन्यत्र स्थानांतरित करना पड़ेगा, जिससे मतदाताओं को कठिनाई होगी और कई लोग मतदान से वंचित भी हो सकते हैं. विद्यालय के अस्तित्व की लड़ाई विद्यालय को बचाने के लिए स्थानीय अभिभावकों, पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने बैठक कर उत्तर कोयल परियोजना उवि बचाओ संघर्ष समिति का गठन किया है. समिति ने विद्यालय को बंद होने से बचाने का संकल्प लिया है. समिति के संरक्षक अशोक यादव, अध्यक्ष अश्विनी सिंह, उपाध्यक्ष गणेश मेहता और धीरेंद्र कुमार, महासचिव महेंद्र प्रसाद सिंह, सचिव डॉ. पचू राजवार और नगीना सिंह, कोषाध्यक्ष मिथिलेश कुमार सिंह और नित्यानंद पाठक, कानूनी सलाहकार रामदेव मेहता तथा संयोजक विवेक विशाल समेत कई अन्य सदस्य सक्रिय रूप से जुड़े हैं. समिति ने आईटी सेल और मीडिया प्रभारी भी नियुक्त किए हैं ताकि संघर्ष को व्यापक स्तर पर आवाज दी जा सके. शिक्षा विभाग से अपेक्षा वर्ष 2011 से लगातार शिक्षा विभाग को विद्यालय के अधिग्रहण के लिए पत्राचार किया जा रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है. यह विडंबना है कि अन्य परियोजना विद्यालयों को शिक्षा विभाग ने अधिग्रहित कर लिया, जबकि मोहम्मदगंज का विद्यालय उपेक्षित रह गया. यदि प्रशासन समय रहते कदम नहीं उठाती तो यह विद्यालय बंद हो जायेगा और आसपास के 12 किलोमीटर के क्षेत्र में बच्चों के लिए कोई अन्य उच्च विद्यालय उपलब्ध नहीं रहेगा.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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