Trump Arms Sale Policy: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नए एग्जीक्यूटिव ऑर्डर (EO) पर साइन कर दिए हैं. इस फैसले के बाद अब अमेरिका से हथियार खरीदना पहले जैसा आसान नहीं रहेगा. ट्रंप ने साफ कर दिया है कि उनकी अमेरिका फर्स्ट आर्म्स ट्रांसफर स्ट्रैटेजी के तहत हथियार उन्हीं देशों को प्राथमिकता पर दिए जाएंगे, जो अपनी सुरक्षा पर दिल खोलकर खर्च कर रहे हैं और अमेरिकी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं.
जो अपनी मदद करेगा, अमेरिका भी उसी का साथ देगा
आसान शब्दों में कहें तो, ट्रंप ने एक ‘VIP लिस्ट’ तैयार करने को कहा है. इस ऑर्डर के मुताबिक, अमेरिका उन देशों को पहले हथियार बेचेगा जो:
- अपनी रक्षा (Self-defence) के लिए खुद भारी निवेश कर रहे हैं.
- अमेरिकी मिलिट्री के ऑपरेशन्स और प्लानिंग में काम आने वाली खास लोकेशन (Geography) पर हैं.
- अमेरिका की आर्थिक सुरक्षा यानी इकोनॉमी को फायदा पहुंचा रहे हैं.
- ट्रंप का मानना है कि अमेरिकी हथियार दुनिया में बेस्ट हैं और अब इनका इस्तेमाल एक ‘टूल’ की तरह होगा ताकि अमेरिका को दुनिया में सबसे ऊपर रखा जा सके.
पुरानी ‘फर्स्ट कम, फर्स्ट सर्व’ वाली पॉलिसी खत्म
अब तक अमेरिका हथियार बेचने में ‘पहले आओ, पहले पाओ’ वाली नीति अपनाता था, लेकिन ट्रंप ने इसे पूरी तरह बदल दिया है. नए नियमों के अनुसार, अब हथियारों की सप्लाई को अमेरिका की विदेश नीति और घरेलू फैक्ट्रियों की ताकत बढ़ाने से जोड़ दिया गया है. इसका बड़ा मकसद अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री को इतना मजबूत बनाना है कि वह किसी भी संकट के समय अपने और अपने सहयोगियों के काम आ सके.
अधिकारियों को मिला 120 दिन का अल्टीमेटम
ट्रंप ने अपनी कैबिनेट के बड़े अफसरों को काम पर लगा दिया है. आदेश के अनुसार, सेक्रेटरी ऑफ वॉर (युद्ध सचिव) को स्टेट और कॉमर्स सेक्रेटरी के साथ मिलकर अगले 120 दिनों में एक ‘सेल्स कैटलॉग’ तैयार करना होगा. इसमें उन हथियारों और सिस्टम्स की लिस्ट होगी जिन्हें अमेरिका अपने खास पार्टनर देशों को खरीदने के लिए प्रोत्साहित करेगा.
यही नहीं, कॉमर्स सेक्रेटरी को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे ऐसे सुझाव दें जिससे दुनिया भर के देश ज्यादा से ज्यादा ‘मेड इन अमेरिका’ हथियार खरीदें. इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका का मुनाफा और अमेरिकी लोगों के लिए ज्यादा रोजगार.
सप्लाई चेन और सुरक्षा पर भी नजर
रिपोर्ट के मुताबिक, इस नए फैसले में इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि हथियारों की बिक्री से अमेरिका की अपनी मिलिट्री की तैयारी (Readiness) पर कोई बुरा असर न पड़े. ट्रंप चाहते हैं कि विदेशी पैसा अमेरिका में आए और यहां नई फैक्ट्रियां लगें (Reindustrialization), जिससे अमेरिका का डिफेंस बेस और भी मजबूत हो जाए. साथ ही, यह भी देखा जाएगा कि हथियार खरीदने वाले देश नियमों का सही पालन कर रहे हैं या नहीं.
हिंदुस्तान के लिए क्या है इसमें?
इस पूरे मामले में हिंदुस्तान का जिक्र काफी अहम है. एक हालिया बयान में बताया गया है कि हिंदुस्तान और अमेरिका के बीच एक बड़े ट्रेड डील (Interim Agreement) की रूपरेखा तैयार हुई है. इसमें हिंदुस्तान ने लगभग 500 बिलियन डॉलर (करीब 41 लाख करोड़ रुपये) के अमेरिकी विमान और उनके पुर्जे खरीदने का इरादा जताया है.
सबसे खास बात यह है कि इन पुर्जों में हिंदुस्तान के अपने स्वदेशी ‘तेजस’ फाइटर जेट प्रोग्राम के लिए इंजन (Power Plants) भी शामिल हैं. यानी ट्रंप की इस नई पॉलिसी से हिंदुस्तान और अमेरिका के रक्षा संबंध एक नए लेवल पर पहुंच सकते हैं.
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