हिंदुस्तान से दूर लघु हिंदुस्तान कहे जाने वाले टापू देश त्रिनिदाद और टोबैगो के आम चुनाव में कमला प्रसाद-बिसेसर के नेतृत्व वाली यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है. चुनाव विगत 25 अप्रैल को हुए थे. इस जीत के बाद वह फिर से अपने देश की प्रधानमंत्री बन गयी हैं. उनकी इस उपलब्धि से न केवल त्रिनिदाद में, बल्कि हिंदुस्तान, विशेषकर बिहार के बक्सर में लोग खुश होंगे. कमला प्रसाद के पुरखे बक्सर के भेलपुर गांव से थे. कमला प्रसाद-बिसेसर इससे पहले 2010 से 2015 तक त्रिनिदाद और टोबैगो की प्रधानमंत्री थीं. ऐसे ही कुछ समय पहले तक कमला हैरिस अमेरिका की उपराष्ट्रपति थीं.
कमला प्रसाद-बिसेसर की जीत को हिंदुस्तान-त्रिनिदाद संबंधों के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कमला प्रसाद की जीत पर उन्हें बधाई दी है. कमला प्रसाद-बिसेसर ने त्रिनिदाद और टोबैगो की पहली स्त्री प्रधानमंत्री के रूप में (2010-2015) भी हिंदुस्तान के साथ द्विपक्षीय सांस्कृतिक, आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने में मदद की थी. त्रिनिदाद में हिंदुस्तानीय मूल के लोग, जो देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं, अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखने के लिए दिवाली, होली जैसे उत्सवों और हिंदुस्तानीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं. कमला प्रसाद ने इन आयोजनों में सक्रिय भागीदारी की और हिंदुस्तानीय संस्कृति को त्रिनिदाद की मुख्यधारा में एकीकृत करने के प्रयास किये. उनकी हिंदुस्तानीय जड़ों ने उन्हें हिंदुस्तानीय डायस्पोरा के बीच एक प्रतीकात्मक व्यक्तित्व बनाया. त्रिनिदाद और टोबैगो की नेतृत्व मुख्य रूप से दो प्रमुख दलों- पीपुल्स नेशनल मूवमेंट (पीएनएम) और यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस ( यूएनसी) के इर्द-गिर्द घूमती है. वहां चुनाव अक्सर वित्तीय स्थिति, अपराध, भ्रष्टाचार, और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों पर लड़े जाते हैं. जातीय पहचान भी एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है, हालांकि समय के साथ इसमें बदलाव आया है.
गौरतलब है कि कमला प्रसाद-बिसेसर के परदादा पंडित रामलखन मिश्रा बिहार के बक्सर जिले के इटाढ़ी प्रखंड के भेलपुर गांव से थे, जिन्हें 19वीं सदी में मजदूरी के लिए त्रिनिदाद और टोबैगो ले जाया गया था. तब हजारों हिंदुस्तानीयों को गिरमिटिया मजदूरों के रूप में कैरेबियाई देशों में भेजा गया था. रामलखन मिश्रा त्रिनिदाद में ही बस गये और उनकी संतानों ने वहां की सामाजिक और नेतृत्वक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. यहां यह याद किया जा सकता है कि कमला प्रसाद-बिसेसर ने त्रिनिदाद और टोबैगो की प्रधानमंत्री के तौर पर 2012 में हिंदुस्तान का दौरा किया था. तब अपने हिंदुस्तानीय मूल पर गर्व व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि उनके पूर्वज हिंदुस्तान की संस्कृति और परंपरा से गहरे तौर पर जुड़े थे, और यह सांस्कृतिक विरासत उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है. बक्सर के भेलपुर गांव में आज भी उनका पैतृक घर मौजूद है. उस यात्रा के दौरान उन्होंने गांव के लोगों से भेंट की, अपने रिश्तेदारों से बातचीत की और एक सभा को संबोधित किया. उनके उस दौरे ने स्थानीय समुदाय में उत्साह पैदा किया और हिंदुस्तान-त्रिनिदाद संबंधों को प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. मौजूदा पीढ़ी को शायद छेदी जगन के बारे में जानकारी न हो, जो 1961 में सुदूर कैरिबियाई टापू देश गुयाना के प्रधानमंत्री बन गये थे. गुयाना त्रिनिदाद का पड़ोसी देश है. उनके बाद तो गुयाना और त्रिनिदाद में हिंदुस्तानवंशी प्रधानमंत्री बनते ही रहे हैं. हिंदुस्तानवंशी ऋषि सुनक भी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. हिंदुस्तानीयों का नेतृत्व करने में कोई जवाब नहीं है. संसद का चुनाव चाहे कनाडा का हो, ब्रिटेन का हो या फिर किसी अन्य लोकतांत्रिक देश का, हिंदुस्तानीय उनमें अपना असर दिखाने से पीछे नहीं रहते. अगर यह बात न होती, तो लगभग 22 देशों की पार्लियामेंट में 182 हिंदुस्तानवंशी सांसद न होते.
अपनी धरती से दूर जाकर हिंदुस्तानवंशी नेतृत्व तक ही सीमित नहीं रहे. उन्होंने स्पोर्ट्सों में भी बुलंदियों को छुआ. क्रिकेट की ही बात करें, तो सोनी रामाधीन की जादुई स्पिन गेंदबाजी के बाद कैरिबियाई देशों में रहने वाले नौजवानों को लगा कि वे स्पोर्ट्सों में अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ सकते हैं. सोनी रामाधीन त्रिनिदाद से ही थे. रोहन कन्हाई, एल्विन कालीचरण, इंसान अली, शिव नारायण चंद्रपाल, राम नरेश सरवान आदि कितने ही हिंदुस्तानीय मूल के खिलाड़ी वेस्टइंडीज से स्पोर्ट्से और कइयों ने कप्तानी भी की. रामाधीन से हटकर बात करें, तो फिजी के हिंदुस्तानवंशी गोल्फर विजय सिंह दुनिया के चोटी के गोल्फ खिलाड़ी बने, तो फिजी के ही विकास धुरासू ने फ्रांस की फुटबॉल टीम से फीफा विश्व कप में हिस्सा लिया. हिंदुस्तान से बाहर बसा हरेक हिंदुस्तानवंशी हिंदुस्तान का ब्रांड एंबेसेडर है. जो सिलसिला छेदी जगन ने शुरू किया और जिसे मॉरीशस में शिवसागर रामगुलाम से लेकर अनिरुद्ध जगन्नाथ, त्रिनिदाद और टोबैगो में वासुदेव पांडे और कमला प्रसाद, सूरीनाम में चंद्रिका प्रसाद संतोखी, अमेरिका में कमला हैरिस और ब्रिटेन में सुनक ने आगे बढ़ाया, वह निरंतर चलता रहेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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