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दक्षिणेश्वर मंदिर निजी संपत्ति या सार्वजनिक, मालिकाना हक पर कलकत्ता हाईकोर्ट में 17 से होगी लगातार सुनवाई

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Dakshineshwar Kali Mandir| कोलकाता, अमित कुमार दास / अमर शक्ति : पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के प्रतिष्ठित दक्षिणेश्वर काली मंदिर के मालिकाना हक पर कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर हुई है. याचिकाकर्ता ने पूछा है कि दक्षिणेश्वर मंदिर किसी की निजी संपत्ति है या सार्वजनिक संपत्ति. दक्षिणेश्वर मंदिर को लेकर पिछले कुछ दशक में कई बार हाईकोर्ट में सवाल उठाये गये हैं. कभी मंदिर के ट्रस्ट के चयन को लेकर, तो कभी मंदिर में आर्थिक भ्रष्टाचार सहित अन्य आरोपों को लेकर मामला किया गया है. इन सभी मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट में लंबित है. इन मामलों पर पिछले 2 वर्ष में एक बार भी सुनवाई नहीं हुई है.

कलकत्ता हाईकोर्ट की 2 जजों की बेच करेगी याचिका पर सुनवाई

अब मंदिर के मालिकाना हक पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट में नयी याचिका दाखिल की गयी है. दक्षिणेश्वर मंदिर के जुड़े सभी मामलों को सुनवाई के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सब्यसाची भट्टाचार्य और न्यायाधीश सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ को भेजा गया है. 17 दिसंबर से इन सभी मामलों पर सुनवाई शुरू होगी. हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में केंद्र और राज्य प्रशासन सहित सभी पक्षों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई के दिन केंद्र और राज्य प्रशासन को अदालत में बताना होगा कि उनकी ओर से दक्षिणेश्वर मंदिर को कोई आर्थिक अनुदान दिया गया था या नहीं.

मंदिर को मिले दान का ट्रस्ट ने नहीं रखा है कोई हिसाब

इससे पहले दक्षिणेश्वर काली मंदिर के खातों की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से कराने की मांग करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआइएल) दायर की गयी थी. मंदिर के पुजारियों और भक्तों ने मंदिर ट्रस्ट के खातों और संपत्ति के रख-रखाव में घोर अनियमितता का आरोप लगाया है. याचिका में उन्होंने आरोप लगाया है कि इस वर्ष काली पूजा के अवसर पर मंदिर के अधिकारियों ने बड़ी संख्या में गहने और साड़ियों के दान का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा है.

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Dakshineshwar Kali Mandir: दक्षिणेश्वर मंदिर के अधिकारियों पर लगाये गये हैं गंभीर आरोप

आरोप है कि दक्षिणेश्वर मंदिर के अधिकारियों के पास पिछले कुछ वर्षों में बंगाल प्रशासन से प्राप्त 130 करोड़ रुपए और केंद्र प्रशासन से विभिन्न मदों में मिले 20 करोड़ रुपए का उचित लेखा-जोखा नहीं है. मंदिर के ट्रस्ट के अधिकारियों ने मंदिर परिसर के भीतर दुकान मालिकों को स्थान आवंटित करने के साथ-साथ ट्रस्टी बोर्ड के पदाधिकारियों का चुनाव किया, जो अदालत के निर्देश के 20 साल बाद हुआ. इस चुनाव प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं. याचिकाकर्ताओं ने ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसी या किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली न्यायिक समिति से मामले की स्वतंत्र जांच की अपील की है.

1848 में रानी रासमणि ने शुरू करवाया था मंदिर का निर्माण

प्रसिद्ध समाजसेवी रानी रासमणि ने वर्ष 1848 में मंदिर का निर्माण शुरू करवाया था. मंदिर का निर्माण वर्ष 1856 में पूरा हुआ. गदाधर चट्टोपाध्याय, जो बाद में रामकृष्ण परमहंस के रूप में विख्यात हुए, को पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया. शुरू में रामकृष्ण अपने बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय की सहायता करते थे, जो उस समय मंदिर के मुख्य पुजारी थे. बाद में बड़े भाई की मृत्यु के बाद रामकृष्ण ने मुख्य पुजारी के रूप में पदभार संभाला. कहा जाता है कि रानी रासमणि ने सपने में देवी काली के दिव्य दर्शन के बाद मंदिर का निर्माण शुरू करवाया था.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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