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नगालैंड में बाजों के संरक्षण की अनूठी पहल

Eagles in Nagaland : यह सुनना कितना सुखद है कि सुदूर नगालैंड के वोखा जिले को दो महीने के लिए शांत क्षेत्र (साइलेंट जोन) घोषित किया गया है, ताकि हजारों किलोमीटर दूर से आकर कुछ समय सुस्ताने वाले प्रवासी पंछियों को सुकून दिया जा सके. वास्तव में, यह क्षेत्र वैश्विक पर्यावास की दृष्टि से अनूठा है, क्योंकि एक दुर्लभ पक्षी ‘अमूर बाज’, अर्थात ‘फाल्कन’ अपने लंबे सफर के दौरान आराम के लिए यहां रुकते हैं. यह भी कम रोचक नहीं है कि एक मांसाहारी राज्य में एक पक्षी के संरक्षण के लिए समाज और प्रशासन एकजुट होकर काम कर रहे हैं.

अमूर बाज, बाज परिवार का एक छोटा प्रवासी पक्षी है, जो विश्व में सबसे लंबी यात्रा करने वाले शिकारी पक्षियों में से एक है. ये पक्षी हर वर्ष साइबेरिया और उत्तरी चीन के अपने प्रजनन क्षेत्रों से उड़ान भरकर, दक्षिण अफ्रीका में अपने शीतकालीन निवास स्थान तक लगभग 22,000 किलोमीटर की यात्रा तय करते हैं. हिंदुस्तान, विशेष रूप से नगालैंड, उनकी इस लंबी यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव (स्टॉप ओवर) के रूप में कार्य करता है. प्रत्येक वर्ष अक्तूबर और नवंबर महीने के दौरान लाखों अमूर बाज नगालैंड से होकर गुजरते हैं. इस दौरान वे लंबी उड़ान की थकान से उबरने और अरब सागर के ऊपर अपनी निर्बाध उड़ान के लिए स्वयं को तैयार करने के लिए यहां कुछ सप्ताह के लिए रुकते हैं.

नगालैंड के वोखा जिला स्थित दोयांग जलाशय के आसपास का क्षेत्र अमूर बाज के सबसे बड़े वार्षिक सम्मिलन के लिए विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है. इसी कारण नगालैंड को ‘विश्व की फाल्कन राजधानी’ के रूप में भी जाना जाता है. अमूर बाजों का यह विशाल जमावड़ा नगालैंड की समृद्ध जैव विविधता और इसके प्राकृतिक आवासों के महत्व को दर्शाता है, जो इन प्रवासी पक्षियों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है. अमूर बाज वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और प्रवासी प्रजातियों पर कन्वेंशन (सीएमएस) के तहत संरक्षित हैं. विदित हो कि हिंदुस्तान इस संधि का एक हस्ताक्षरकर्ता है.

नगालैंड प्रशासन ने प्रवास के मौसम के दौरान पांगती गांव में इन पंछियों के बसेरा स्थल को आधिकारिक तौर पर तीन किलोमीटर के दायरे में एक अस्थायी ‘शांत क्षेत्र’ घोषित किया है. वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि तेज आवाज से जंगली पक्षियों में भय पैदा हो सकता है, जिससे वे संभवतः अपने आवास को छोड़ सकते हैं और प्रजनन तथा अस्तित्व से जुड़े महत्वपूर्ण संचार को बाधित कर सकते हैं. प्रशासनी आदेश में यह चेतावनी भी दोहरायी गयी है कि शिकार या नुकसान पहुंचाने में शामिल गांवों को दिये जाने वाले प्रशासनी अनुदानों की समीक्षा की जायेगी और उन्हें रोका जा सकता है.

यही नहीं, इस क्षेत्र में एयरगन पर भी पाबंदी लगा दी गयी है. जिला प्रशासन ने सभी नागरिकों, समुदायों और आगंतुकों से इस अद्वितीय पारिस्थितिक घटना के संरक्षण में सहयोग करने और सफल वन्यजीव संरक्षण के लिए नगालैंड की वैश्विक प्रतिष्ठा को बनाये रखने का आग्रह किया है. यह पहल हिंदुस्तान में समुदाय आधारित संरक्षण की एक अद्भुत मिसाल है, जिसने शिकार के मैदान को विश्व के सबसे बड़े पक्षी संरक्षण स्थलों में से एक में बदल दिया है. अमूर बाज एक मध्यम आकार का पक्षी है, जिसके पंखों का फैलाव 63 से 71 सेमी तक और वजन लगभग 120 ग्राम होता है. नर अमूर बाज का रंग गहरा भूरा, जबकि मादा और किशोर का रंग अलग होता है. इसकी आंखों के चारों ओर नारंगी रंग का घेरा होता है, जो इसकी विशिष्ट पहचान है. यह बहुत सामाजिक पक्षी है और इतने बड़े झुंडों में आता है कि आसमान में बादल होने का भ्रम होता है.

वर्ष 2012 में, नगालैंड में कुछ ही दिनों में कई हजार अमूर बाज का शिकार कर लिया गया था. स्थानीय लोग भोजन के लिए इन पक्षियों को पेड़ों पर जाल लगाकर फंसाते थे. शिकार के कारण इनकी जनसंख्या को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया था. उस वर्ष अफ्रीका तक अमूर बाज पहुंच ही नहीं पाये, उधर पांगती गांव के आसपास दीमक ने बहुत नुकसान किया था. वास्तव में, इन बाजों का पसंदीदा भोजन दीमक होते हैं, और जब अमूर मारे गये, तो दीमकों की संख्या भी बढ़ गयी. दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार में जब इसकी समाचार छपी, तो पर्यावरण प्रेमी लेखिका नेहा सिन्हा वहां पहुंचीं और उन्होंने वहां के समाज को बताया कि ये पक्षी तो आपके मेहमान हैं.

ये उन कीटों को खा कर समाज की मदद करते हैं, जो खेती को नुकसान पहुंचाते हैं. नेहा ने इस काम के लिए राजनेताओं, धर्म गुरुओं और शिक्षकों की मदद ली. उन्होंने समाज को विश्वास दिलाया कि दुनिया में समाप्त हो रही इस प्रजाति के बाज को देखने पर्यटक आयेंगे. इससे उनकी आय बढ़ेगी. नेहा के समझाने और लेखन का प्रभाव यह हुआ कि अगले वर्ष नगालैंड में एक भी पक्षी का शिकार नहीं हुआ. अब तो वहां लोगों को अमूर बाज की प्रतीक्षा रहती है. अब नगालैंड के कई स्कूलों में अमूर बाज को बचाने के लिए क्लब बन गये हैं. वहीं अमूर बाज के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए, मणिपुर के तामेंगलोंग जिले में वार्षिक ‘अमूर फाल्कन महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है, जो इन पक्षियों को एक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में मान्यता देता है. 
 (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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