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नीतीश के ‘टच’ का सियासी ट्रेंड, जिसे बताया वारिस, वही हुआ साइडलाइन! क्‍या अब सम्राट की बारी?

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Nitish Kumar political successor pattern : बिहार की नेतृत्व में Nitish Kumar की शैली हमेशा से संकेतों और प्रतीकों के जरिए संदेश देने वाली रही है. लेकिन उनके सियासी ‘टच’ को लेकर एक दिलचस्प और कुछ हद तक डराने वाला ट्रेंड भी रहा है. जिसकी वजह से नीतीश चर्चा में भी रहे हैं. बिहार की नेतृत्व में अक्सर इस बात की चर्चा होती है कि नीतीश कुमार ने जिन नेताओं को भी आगे बढ़ाया है या उसे अपना नेतृत्वक वारिस बताया है. उस नेता का नेतृत्वक करियर धीरे-धीरे हाशिये पर चला गया है.

प्रशांत किशोर बिहार में तलाश रहे जमीन

ऐसा नहीं है कि यह बात हवा में कही जा रही है. इसके पीछे उदाहरण भी हैं. बिहार की नेतृत्व में ऐसे आधे दर्जन उदाहरण तो हैं ही! इसमें एक नाम तेजस्वी यादव का भी लिया जा सकता है. आपको याद होगा नीतीश कुमार ने कभी प्रशांत किशोर पर भरोसा जताया था. उनके कंधे पर भी हाथ रखा था. Prashant Kishor कभी जेडीयू के सेकेंड मैन कहे जाते थे. नीतीश ने उन्हें जेडीयू का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया. लेकिन बाद हुआ क्या? आज वो पार्टी से बाहर हैं. बिहार की नेतृत्व में जमीन तलाश रहे हैं.

आरसीपी सिंह प्रशांत की पार्टी में दे रहे सेवा

दूसरा नाम आरसीपी सिंह का भी है. एक प्रशासनिक अधिकारी को नेतृत्व में लाने वाले नीतीश कुमार ही थे. उन्हें पार्टी में महत्वपूर्ण पद दिए. नीतीश ने उन्हें उपाध्यक्ष बनाया. एक बार उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बना डाला. लेकिन हुआ क्या? आज वो बिहार की नेतृत्व में लगभग खोया हुआ नाम हैं. जेडीयू से अलग होने के बाद उन्होंने संघर्ष किया. अपनी अलग पार्टी बनाई. मगर आज वो अपनी पार्टी का विलय प्रशांत किशोर की जनसुराज के साथ कर उनकी पार्टी में ही अपनी सेवा दे रहे हैं. कभी उन्हें जेडीयू का सर्वेसर्वा माना जाता था. नीतीश कुमार का नेतृत्वक उत्तराधिकारी माना जाता था.

हाशिए पर गए ललन

ललन सिंह भी इस लिस्ट में शामिल हैं. जिन्हें नीतीश कुमार का करीबी और विश्वासपात्र माना जाता था. उन्हें भी कभी पार्टी का सर्वेसर्वा और नीतीश का उत्तराधिकारी माना जा रहा था. इस बात की चर्चा बिहार की नेतृत्व में आम थी कि नीतीश कुमार अपनी नेतृत्वक विरासत ललन सिंह के हाथ सौंप सकते हैं. नीतीश कुमार ने उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया. लेकिन बाद में उन्हें हटना पड़ा. आज की स्थिति से आप सभी अवगत हैं.

मनीष वर्मा और संजय झा फोकस से बाहर

इसी लिस्‍ट में मनीष वर्मा और संजय झा जैसे नाम भी शामिल हैं. अब इनके बारे में ज्यादा लिखा जाएगा तो स्‍टोरी लंबी हो जाएगी. मगर इन्‍हें भी ‘नेक्‍सट टू नीतीश’ कहा जा रहा था. यह भी अनुमान लगाया जा रहा था कि नीतीश कुमार आगे चल कर अपनी विरासत इन्‍हीं को सौंप सकते हैं. मगर आज नेतृत्व के हाशिये पर हैं और केंद्र में केवल नीतीश. यहां गौर करने वाली बात ये है कि नीतीश ने इन सभी के ‘कंधे पर अपना हाथ’ रखा था.

नीतीश का ‘हाथ’ सियासी ‘ग्रहण’ तो नहीं

अब नीतीश कुमार का ‘हाथ’ बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी के ‘कंधे’ पर है. वो अपनी आधी दर्जन जनसभाओं में सम्राट को अपने उत्तराधिकारी के रूप में भरोसा जता चुके हैं. ऐसे में जो उदाहरण पीछे हैं. उसके आधार पर ये सियासी सवाल विश्लेषकों के मन में उठना लाजमी है कि क्या नीतीश का हाथ ‘सियासी ग्रहण’ तो नहीं! 

तेजस्वी के कंधे पर भी रखा था हाथ

इसी कड़ी में बिहार की विपक्षी पार्टी के युवा नेता तेजस्वी यादव का नाम भी है. नीतीश ने कभी इनके कंधे पर भी हाथ रखा था. ये भी कहा था कि ‘अब आगे यही लोग देखेगा’. लेकिन हुआ क्या! तेजस्वी यादव 25 सीटों पर सिमट गए. नेता प्रतिपक्ष बने रहने की हैसियत भी बाल बाल बची.

क्‍या कहते हैं नेतृत्वक विश्लेषक

पत्रकार और बिहार की नेतृत्व पर पैनी निगाह रखने वाले कौशलेंद्र प्रियदर्शी नीतीश कुमार का सम्राट चौधरी के ‘कंधे पर हाथ’ को ‘सियासी ग्रहण’ के रूप में देख रहे हैं. उनका कहना है कि अब तक नीतीश कुमार ने जिन जिन नेताओं पर भरोसा जताया है, उनका नेतृत्वक करियर अर्श से फर्श पर आया है. अब सम्राट चौधरी के कंधे पर हाथ है. ऐसे में उन्‍हें अंदेशा है कि कहीं सम्राट के लिए भी नीतीश का आशीर्वाद घातक तो साबित नहीं होगा?

सम्राट के पक्ष में नहीं कयास

इधर, इन्हीं आशंकाओं के बीच एक और नेतृत्वक अटकलें जोर पकड़ रहीं हैं. वो सम्राट चौधरी के पक्ष में नहीं. वैसे तो सम्राट चौधरी विपक्ष के हमलों तीखा जवाब देते हैं. एक मजबूत छवि भी दिखाने की कोशिश करते हैं. जिसमें वो सफल भी रहे हैं. लेकिन यहां नेतृत्वक मैग्निफाइन ग्‍लास को थोड़ा ऊपर करने की जरूरत है. ताकी वो महीन चीजें भी नजर आएं जो नंगी आंखों से नहीं दिखाई दे रही है. 

बीजेपी और सम्राट के लिए असहज ‘इतना प्रोजेक्‍शन’

नीतीश लगातार सम्राट चौधरी को अगले मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं. जो बीजेपी और खुद सम्राट को असहज कर रहा है. ये अलग बात है कि बीजेपी ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री के रूप में तैयार किया है. लेकिन बीजेपी चुपचाप काम करने वाली पार्टी है. ऐसे में जिस तरह से नीतीश सम्राट को प्रोजेक्ट कर रहे हैं, वह उनके लिए घातक हो सकता है. बीजेपी ने हमेशा चौंकाया है. दिल्ली हो या मध्‍यप्रदेश हमने अचानक से एक अलग ही चेहरा देखा है. जो चर्चा से बिल्कुल अलग रहा है. ऐसे में नीतीश कुमार का इतना प्रोजेक्‍शन सम्राट के लिए ग्रहण साबित हो सकता है. ये अलग बात है कि बीजेपी ने सम्राट पर अपना समय लगाया है लेकिन बीजेपी एक सेंट्रलाइज पार्टी है.

सम्राट के सामने भी कम चुनौती नहीं

नेतृत्वक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सम्राट चौधरी के लिए राह पूरी तरह आसान नहीं है. उनकी सबसे बड़ी चुनौती उनकी ‘आयातित नेता’ वाली छवि है. वे पहले राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यूनाइटेड) में रह चुके हैं कुछ दिन जीतन मांझी की पार्टी और समता पार्टी से भी जुड़े रहे. बाद में वह बीजेपी में शामिल हुए. यही वजह है कि पार्टी के कुछ पुराने और संघ के कोर कार्यकर्ता उन्हें पूरी तरह ‘अपना’ नहीं मानते. हालांकि, सम्राट ने खुद को काफी इंप्रूव किया है. उन्होंने खुद को बीजेपी और नीतीश के साथ कैलिब्रेट किया है.

सम्राट बीजेपी के लिए अछूत नहीं

ऐसा भी नहीं है कि सम्राट बीजेपी के लिए पूरी तरह से अछूत हैं. बीजेपी ने कई राज्यों में ऐसे नेताओं को भी बड़ी जिम्मेदारी दी है, जो बाद में पार्टी में आए. इसलिए उनका आयातित होना और पूरी तरह से संघ से न जुड़ा होना, निर्णायक तो है, लेकिन अंतिम बाधा नहीं. इन नेतृत्व कयासों और चर्चाओं के बीच देखने वाली बात ये होगी कि नीतीश का ‘हाथ’ सम्राट के लिए कितना ‘शुभ’ साबित होता है?

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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