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‘पाकिस्तान को क्यों दिया पैसा, बम खरीदने के लिए?’ एडीबी की फंडिंग पर भारत की कड़ी आपत्ति

Pakistan ADB Funding: एशियाई विकास बैंक (एडीबी) की ओर से पाकिस्तान को प्रस्तावित वित्तीय सहायता पर हिंदुस्तान ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है. हिंदुस्तान का स्पष्ट तौर पर कहा है कि एडीबी के फंड का इस्तेमाल वास्तविक आर्थिक सुधारों या विकास कार्यों में किए जाने के बजाय सैन्य खर्चों में किया जा रहा है. इन पैसों से वह आतंकवादी की फैक्टरी और बम-बारूद का जखीरा ही खड़ा करेगा.

कर संग्रह में गिरावट, रक्षा खर्च में बढ़ोतरी

हिंदुस्तान ने एडीबी के सामने पाकिस्तान के राजकोषीय असंतुलन का तथ्यात्मक ब्योरा भी पेश किया है. एडीबी के सामने पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में पाकिस्तान का कर-संग्रह जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के 13% से घटकर 9.2% पर आ गया है, जबकि इसी अवधि में रक्षा खर्च में लगातार बढ़ोतरी हुई है. यह स्थिति एशिया-प्रशांत क्षेत्र के औसत (19%) से काफी नीचे है और गंभीर वित्तीय कुप्रबंधन की ओर इशारा करती है.

हिंदुस्तान की गंभीर आपत्ति

हिंदुस्तान ने अपनी आपत्ति में स्पष्ट तौर पर कहा है कि पाकिस्तान की ओर से विकास सहायता को रक्षा क्षेत्र में डायवर्ट किया जा रहा है. नीति आधारित ऋण और विनिमय योग्य वित्तीय साधनों के माध्यम से यह फंडिंग पाकिस्तान की फौजी प्राथमिकताओं में तब्दील हो रही है, जो न केवल एडीबी की नीतियों के खिलाफ है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी खतरा है.

आईएमएफ और एडीबी ट्रैक रिकॉर्ड पर सवाल

हिंदुस्तान ने एडीबी के पहले के कार्यक्रमों की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं. पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय सहायता के बावजूद अब तक 24 बेलआउट ले लिए हैं. यह स्पष्ट करता है कि देश के अंदर सुधार की कोई प्रतिबद्धता नहीं है और बाहरी सहायता को बार-बार तात्कालिक राहत के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

सेना का आर्थिक मामलों में बढ़ता दखल

हिंदुस्तान ने इस ओर भी इशारा किया कि पाकिस्तान में सेना केवल रक्षा ही नहीं, बल्कि आर्थिक नीति निर्माण और निवेश निर्णयों में भी दखल देते हुए अग्रणी भूमिका निभा रही है. विशेष निवेश सुविधा परिषद (एसआईएफसी) में सेना की भागीदारी से पता चलता है कि वहां की वित्तीय स्थिति नागरिक प्रशासन के बजाय सैन्य नियंत्रण में जा रही है, जो किसी भी दीर्घकालिक सुधार के लिए हानिकारक है.

क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा पर खतरा

हिंदुस्तान ने पाकिस्तान को क्षेत्रीय शांति के लिए एक निरंतर खतरा बताया. सीमा पार आतंकवाद और एफएटीएफ (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) की ओर से उठाए गए बिंदुओं पर पाकिस्तान की मंद पड़ी प्रगति इस बात को और पुष्ट करती है. हिंदुस्तान ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से घोषित आतंकवादी संगठनों के खिलाफ पाकिस्तान की ढीली कार्यवाही एडीबी के फैसलों को और अधिक जटिल बना देती है.

नीतिगत सुधार या बाहरी निर्भरता का चक्र?

हिंदुस्तान का कहना है कि पाकिस्तान की नीतिगत रणनीति स्थायी सुधारों की बजाय अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर निर्भरता पर आधारित है. ऐसा मॉडल न केवल स्थानीय स्वामित्व को कमजोर करता है, बल्कि इसे एक ‘आर्थिक नशे’ के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसमें देश सुधारों के नाम पर केवल राहत चाहता है, बदलाव नहीं.

जोखिम में एडीबी की वित्तीय सेहत

हिंदुस्तान ने एडीबी को आगाह किया है कि पाकिस्तान की उच्च ऋण-से-जीडीपी अनुपात, कमजोर क्रेडिट रेटिंग और बाहरी कर्ज पर निर्भरता से बैंक की वित्तीय स्थिरता को भी खतरा है. अगर ऐसे देश को बिना सख्त निगरानी के सहायता दी जाती है, तो वह बैंक के दीर्घकालिक हितों के लिए भी हानिकारक हो सकता है.

हिंदुस्तान की मांग: कड़ी शर्तें और पारदर्शी निगरानी

हिंदुस्तान ने एडीबी से स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि पाकिस्तान को फंड दिया जाता है, तो उसमें कड़ी शर्तें होनी चाहिए और उनकी निगरानी पारदर्शी और सतत होनी चाहिए. नहीं तो, यह फंड एक बार फिर रक्षा और आतंकवाद पोषण जैसी गतिविधियों में बदल जाएगा, जिससे विकास का नामोनिशान तक नहीं रहेगा.

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विकास का पैसा, हथियारों की होड़?

हिंदुस्तान के रुख से यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान के मौजूदा आर्थिक और सुरक्षा व्यवहार को देखते हुए एडीबी जैसी संस्थाओं को ‘विकास सहायता’ को ‘सैन्य ताकत’ में बदलने से रोकना होगा. हिंदुस्तान का संदेश साफ है, “पैसे दो, पर उसकी दिशा तय करो.”

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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