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बांग्लादेश के पटरी पर लौटने की उम्मीद, पढ़ें डॉ संजय भारद्वाज का आलेख

डॉ संजय भारद्वाज, प्रोफेसर, अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान जेएनयू

Bangladesh: बाग्लादेश के चुनाव में बीएनपी यानी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिला, जो पिछले 18 महीने के हालात में स्वागतयोग्य है. दरअसल कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी ने अंतरिम प्रशासन के प्रमुख मोहम्मद यूनुस को पूरी तरह अपने प्रभाव में कर लिया था और बांग्लादेश पटरी से उतर गया था. नतीजों को देखते हुए उम्मीद कर सकते हैं कि बांग्लादेश अब वापस पटरी पर आ जायेगा. हालांकि 13वीं जातीय संसद का चुनाव एक खास विचार के नेतृत्वक दलों के बीच मुकाबला था, जो इस्लाम की नेतृत्व में अधिक विश्वास रखते हैं. बांग्ला संस्कृति की मुख्य पक्षधर पार्टी अवामी लीग को इस चुनाव में हिस्सा नहीं लेने दिया गया. अतः बीएनपी एवं जमात-ए-इस्लामी के सामने चुनाव में कोई बड़ी चुनौती नहीं थी. जाहिर है कि इस चुनाव को समावेशी और अर्थपूर्ण नहीं कह सकते. वर्ष 2014, 2018 एवं 2024 के चुनावों पर भी इसी तरह के आरोप थे. उन सभी चुनावों में भागीदारी के लिए एकतरफा निर्णय लिये गये थे.

बांग्लादेश का आखिरी समावेशी चुनाव 2008 में ही हुआ था. वर्ष 2008 के बाद बांग्लादेश में नेतृत्वक स्थायित्व आया और वही देश के आर्थिक विकास की वजह बना. संतुलित विदेश नीति से व्यापार एवं निवेश को प्रोत्साहन मिला. अवामी लीग वह नेतृत्वक पार्टी है, जिसके नेतृत्व में बांग्लादेश का एक स्वतंत्र देश के रूप में जन्म हुआ एवं उसने बांग्लादेश को बांग्ला सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार दिया. इस चुनाव को हम सही अर्थों में आम चुनाव तभी कह सकते थे, जब जनता के सामने सभी विकल्प खुले होते और नेतृत्वक दलों को स्वीकार एवं अस्वीकार करने का अवसर मतदाताओं को दिया जाता. वर्ष 2008 का चुनाव आखिरी चुनाव था, जिसमें बांग्लादेश के सभी नेतृत्वक पार्टियों ने भाग लिया था और लगभग 86 फीसदी वोटिंग हुई थी. इस बार के चुनाव में वोटिंग लगभग 59 प्रतिशत बताई गयी यानी देश के लगभग 40 फीसदी मतदाताओं ने वोटिंग नहीं की. दरअसल विवादित चुनावों में वोटिंग प्रतिशत को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की परंपरा भी रही है. इसके कारण हैं. चूंकि बांग्लादेश के चुनाव पर नजर रखने वाली घरेलू और विदेशी संस्थाएं हैं, लिहाजा चुनाव प्रक्रिया को एक हद तक विश्वसनीय बनाया जाना जरूरी होता है.

मोटे तौर पर बांग्लादेश के चुनावों में दो फॉर्मूलों का जिक्र होता है-माइनस टू (यानी दोनों मुख्य पार्टियों, अवामी लीग और बीएनपी के मुख्य लीडर्स को बाहर करें), दूसरा, माइनस वन और मैनेज वन (यानी एक पार्टी को सत्ता में लाने के लिए मैनेज करें). इस बार का चुनाव मैनेज वन-यानी बीएनपी को मैनेज करने का मामला ज्यादा लगता है. वर्ष 2006-2008 के बीच में इस फॉर्मूले की चाभी सेना के पास थी एवं 2024-26 तक जमात ड्राइवर सीट पर थी. इसलिए बहुत खुश होने की आवश्यकता नहीं है. यह गनीमत है कि बेहतर को चुना गया. सिर्फ यही नहीं कि मैनेज वन के तहत बीएनपी को बड़ा चेहरा बनाने की कवायद की गयी होगी, बल्कि इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि तारिक रहमान एक ऐसा चेहरा हैं, जिस पर किसी भी बाहरी देश को- चाहे वह पाकिस्तान हो या अमेरिका- आपत्ति नहीं थी. इसी कारण तारिक रहमान के खिलाफ चल रहे सभी मुकदमे एवं सजा निरस्त कर दिये गये. इस बार हुए चुनाव की एक खास बात यह है कि जो जमात बीएनपी की सहयोगी पार्टी के तौर पर जानी जाती रही है और जिसने बीएनपी के साथ मिलकर 2001 और 2006 का चुनाव लड़ा था, वही इस बार बीएनपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने थी.

हालांकि बीएनपी और जमात में भी कुछ फर्क है. बीएनपी जहां सॉफ्ट इस्लाम की पैरोकार है, वहीं जमात की छवि कट्टर इस्लामी-यानी हार्डलाइनर की है, पर कुल मिलाकर, बीएनपी इस्लामी राष्ट्रवाद पर ही विश्वास करती है. खालिदा जिया के पति और तारिक रहमान के पिता जियाउर रहमान बीएनपी के संस्थापक थे और सत्ता में आने पर उन्होंने बांग्लादेश को बंगाली राष्ट्रवाद से बांग्लादेशी राष्ट्रवाद में तब्दील किया था, जिसका मूल इस्लाम रहा. जियाउर रहमान के दौर में इस्लामी देशों से बांग्लादेश के संबंध मधुर हुए. सत्ता में आने के बाद खालिदा जिया ने वही नीति जारी रखी. उन्होंने पाकिस्तान-चीन से नजदीकी बनायी थी. इसी कारण बीएनपी की नयी प्रशासन की नीतियों के बारे में संशय है. हालांकि बांग्लादेश में चुनाव की घोषणा के बाद लौटे तारिक रहमान ने अपनी शुरुआती टिप्पणियों में जो कुछ कहा, उसका अर्थ यह था कि वह बीएनपी की पहले की नीतियों में बदलाव करेंगे तथा इस्लामिक राष्ट्रवाद की जगह सहिष्णुता और उदारवाद को तरजीह देंगे, लेकिन बीएनपी के इतिहास को देखते हुए उस पर बहुत भरोसा करना ठीक नहीं. ध्यान रखना चाहिए कि बांग्लादेश में जब 2001 के चुनाव हुए थे, तब भी हिंदुस्तान को बीएनपी से उम्मीद थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद खालिदा जिया ने हिंदुस्तान से दूरी बनायी थी.

अब इस चुनाव में शानदार जीत के बाद बीएनपी प्रशासन बना रही है, लेकिन उसके सामने बहुत सारी चुनौतियां हैं. जमात-ए-इस्लामी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है, जो कट्टर इस्लाम को बढ़ावा देने का काम करती रहेगी. ऐसे में, बीएनपी के साथ विभिन्न मुद्दों पर उसकी असहमति तय है. बांग्लादेश में अब भी अवामी लीग के समर्थक बड़ी संख्या में हैं. नयी प्रशासन का अवामी लीग के प्रति क्या रुख रहेगा? क्या तारिक रहमान (जिस तर्ज पर तारिक रहमान को माफ किया) अवामी लीग की ज्यादतियां माफ कर सकेंगे? नयी प्रशासन के सामने जुलाई चार्टर को लागू करने का भी दबाव रहेगा. जहां तक विदेश नीति की बात है, तो हकीकत में यदि बीएनपी की नीतियों में कोई बदलाव न आया, तो नयी प्रशासन बांग्लादेश को पाकिस्तान-अमेरिका के रास्ते पर ले जा सकती है. वैसे में, चीन भी अपनी रोटी सेंकता रहेगा, लेकिन हिंदुस्तान चूंकि बड़ा देश है और वहां लगभग 10 अरब डॉलर का निवेश है, ऐसे में, बांग्लादेश द्वारा हिंदुस्तान की अनदेखी मुश्किलें पैदा कर सकती हैं और आपसी विवाद, सुरक्षा के मुद्दे उलझा सकते है.

लिहाजा हिंदुस्तान को फूंक-फूंककर कदम उठाना होगा. हालांकि अच्छी बात यह है कि हिंदुस्तान ने पहले से ही बीएनपी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया. खालिदा जिया का जब देहांत हुआ था, तब हमारे विदेश मंत्री बांग्लादेश गये थे. फिर चुनावी नतीजों की घोषणा के साथ ही प्रधानमंत्री ने तारिक रहमान को शुभकामनाएं दीं. उधर बीएनपी भी चाहती है कि नयी प्रशासन के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री मोदी भाग लें. ऐसे में, आपसी रिश्तों के सुधरने की उम्मीद बनती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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