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बांग्लादेश में भारत-विरोध अपने चरम पर

Bangladesh : ढाका में कट्टरपंथी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के पश्चात बांग्लादेश में हुए हिंसक प्रदर्शन और विरोध, हिंदू युवक दीपचंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या, व्यापक आगजनी, कुछ मीडिया संस्थानों पर हमले और हिंदुस्तान विरोधी प्रदर्शन स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि बांग्लादेश में व्यापक अशांति का जो दौर 2024 में शेख हसीना प्रशासन के विरोध के रूप में शुरू हुआ था, वह अभी थमा नहीं है. अंतरिम प्रशासन के गठन के एक साल से अधिक होने बाद भी वहां स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है. इस्लामी कट्टरपंथी पार्टियों का बोलबाला बढ़ रहा है. कुख्यात पाक खुफिया एजेंसी आइएसआइ का असर हाल के दौर में वहां बढ़ा है. बांग्लादेश-पाकिस्तान की दोस्ती की बातें हो रही हैं और अवामी लीग के विरोध के साथ-साथ हिंदू और हिंदुस्तान विरोध अपने चरम पर है.

ऐसे में, हिंदुस्तान-बांग्लादेश के रिश्तों में उतार-चढ़ाव जारी है. बांग्लादेश के प्रमुख समाचारपत्रों ‘प्रोथोम आलो’ और ‘द डेली स्टार’ के कार्यालयों पर हिंसक हमले तथा सांस्कृतिक संस्था ‘छायानट’ में तोड़फोड़ केवल मीडिया से जुड़े लोगों की सुरक्षा का मामला नहीं है, यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला है तथा बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली में बाधा डालने का सुनियोजित प्रयत्न है. कुछ मीडिया घरानों को निशाना बना कर निश्चित रूप से उदार और सर्वदेशीय विचार को हतोसाहित करने का प्रयत्न किया गया है. जबकि यूनुस प्रशासन इन कट्टरपंथी प्रदर्शनकारियों और विध्वंसकारियों पर नकेल कसने में अभी तक विफल साबित हुई है. ऐसे में, यह सवाल उठता है कि मोहम्मद यूनुस प्रशासन बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली को लेकर अभी तक क्या सचमुच गंभीर रही है.

बांग्लादेश के हालात अंतरिम प्रशासन के मुखिया यूनुस की विवशता बताते हैं, या फिर यूनुस प्रशासन की नीति यही है? बांग्लादेश में यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम प्रशासन के गठन का मुख्य उद्देश्य था जल्द से जल्द निष्पक्ष चुनाव करा कर नयी लोकतांत्रिक प्रशासन का गठन करना. लेकिन यह पूरी तरह स्पष्ट है कि यूनुस प्रशासन कट्टरपंथियों के प्रति नरम रुख अपना रही है और उसकी नीतियों से जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश और उससे संबद्ध छात्र शिविर से जुड़े प्रर्दशनकारियों और दंगाइयों को बढ़ावा मिल रहा है. अवामी लीग के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि हाल के दिनों में बांग्लादेश में स्थिति काफी बिगड़ गई है और बदली हुई स्थिति ने जेहादियों और कट्टरपंथी तत्वों को मुख्यधारा में प्रवेश करने की अनुमति दी है.

छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी को मिला अपार समर्थन इसी का सबूत थी. उस्मान हादी ने शेख हसीना के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश में काफी लोकप्रियता हासिल की थी और अपनी नेतृत्वक सफलता के लिए हिंदुस्तान-विरोधी लहर का फायदा उठाया था. देर से ही सही, बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने आम चुनाव की तारीखों की घोषणा की, लेकिन देश की स्थिति, सुरक्षा संबधी चिंताओं, और अंतरिम प्रशासन के रवैये को देखते हुए आयोग की स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कराने की क्षमता पर निरंतर सवाल उठाये जा रहे हैं.

बांग्लादेश में फिर से हुए व्यापक अशांति, विद्रोह और हिंसक प्रदर्शन से हिंदुस्तान की चिंता बढ़ गयी है कि वहां अगले साल फरवरी में चुनाव सफलता से संपन्न हो भी पायंगे या नहीं. दरअसल हिंदुस्तान के हित बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली के साथ जुड़े हुए हैं. हिंसक प्रदर्शन, बांग्लादेशी हिदुओं की सुरक्षा की चिंता, हिंदुस्तान-विरोधी बयानबाजी, सीमा की सुरक्षा एवं घुसपैठ, द्विपक्षीय रिश्तों में अस्थायित्व और इस्लामी कट्टरपंथियों का उभार तो चिंता के विषय हैं ही, बांग्लादेश की भू-नेतृत्वक स्थिति भी आशंकित करती है. चीन भी मौके का फायदा उठाने में पीछे नहीं हट रहा.

हिंदुस्तान के विदेश मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट में पिछले दो वर्षों के हिंदुस्तान-बांग्लादेश संबंधों की अस्थिरता का व्यापक विश्लेषण किया गया है. समिति का यह मानना है कि बांग्लादेश में परिवर्तन हो रहा है और आवश्यक समायोजन के बिना हिंदुस्तान बांग्लादेश में अपना वर्तमान रणनीतिक लाभ खो सकता है. और हिंदुस्तान की रणनीतिक हानि चीन के लिए लाभ साबित होगी. शेख हसीना के इस्तीफे के बाद चीन के राजदूत की बीएनपी और जमात के नेताओं से मुलाकात और प्रशंसा छिपी हुई बात नहीं थी. अमेरिका भी बंगाल की खाड़ी में स्थित रणनीतिक सेंट मार्टिन द्वीप को बांग्लादेश से लीज पर लेने में रुचि दिखा रहा है. बंगाल की खाड़ी में अमेरिका और चीन के बढ़ते प्रभाव को हिंदुस्तान अपनी रणनीति से किस तरह संतुलित करेगा, यह देखना दिलचस्प होगा.

शेख हसीना के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय रिश्तों में स्थायित्व लाने की भरपूर कोशिश हिंदुस्तान कर रहा है, लेकिन यूनुस प्रशासन से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा. बल्कि हाल की कुछ घटनाओं से लगता है कि बांग्लादेश चुनाव से पहले हिंदुस्तान को उकसाने की कोशिश कर रहा है. बांग्लादेशी नौसेना के एक जहाज द्वारा मछली पकड़ने वाली एक हिंदुस्तानीय नाव को टक्कर मारने, बंगाल की खाड़ी में हिंदुस्तानीय जलक्षेत्र में बांग्लादेशी मछली पकड़ने वाली नावों की संख्या में लगातार वृद्धि इसके उदाहरण हैं. बांग्लादेश की अंतरिम प्रशासन के साथ द्विपक्षीय रिश्तों के मामले में हिंदुस्तान ने परिपक्व और संतुलित विदेश नीति का प्रदर्शन किया है और गंभीर चुनौतियों के बावजूद प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण को प्राथमिकता नहीं दी गयी है. इसके बजाय हिंदुस्तान की ‘नेवरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी में फिलहाल वेट एंड वाच की नीति अपनाई गयी है.

इसकी वजह यह है कि हिंदुस्तान-बांग्लादेश के बीच बिगड़ते रिश्ते पाकिस्तान और चीन के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं. हिंदुस्तान एक जिम्मेदार तथा दक्षिण एशिया के आर्थिक विकास के लिए सजग देश है. इसे पता है कि दक्षिण एशिया के विकास में बांग्लादेश का योगदान अहम है. दक्षिण एशिया के विकास के लिए बिम्सटेक जैसे मंचों की महत्ता का हिंदुस्तान को पता है, इसलिए पूरे क्षेत्र और उपक्षेत्र के विकास को ध्यान में रख कर वह अपनी बांग्लादेश नीति को दिशा दे रहा है. हिंदुस्तान के लिए बंगाल की खाड़ी की सुरक्षा और शांति भी अहम है. बांग्लादेश से जुड़ी बंदरगाह कनेक्टिविटी परियोजना में कोई बड़ी बाधा न आये, यह हिंदुस्तान की प्राथमिकता है. पोर्ट कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स में बाधा से नेपाल, भूटान, हिंदुस्तान और बांग्लादेश प्रभावित हो सकते हैं. हिंदुस्तान चाहता है कि बांग्लादेश में शांति हो, कट्टरपंथी प्रशासन पर हावी न रहें, प्रशासन बांग्लादेशी हिंदुओं को सुरक्षा प्रदान करे, जल्द से जल्द लोकतंत्र की बहाली हो और द्विपक्षीय रिश्तों में पहले की तरह स्थायित्व आये.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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