Israel-Iran War Impact: देश में पारा 45 डिग्री के पार जाने को तैयार है और ठीक इसी समय बोतलबंद पानी की मांग अपने चरम पर होती है. लेकिन इस बार ‘वॉटर बिजनेस’ के लिए यह गोल्डन पीरियड नहीं, बल्कि संकट काल साबित हो रहा है. ईरान युद्ध के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में मची हलचल ने प्लास्टिक और कांच की बोतलों की लागत को आसमान पर पहुंचा दिया है. नतीजा यह है कि महाराष्ट्र की 20% बोतल बनाने वाली फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं और आने वाले दिनों में पानी की बोतलों की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी तय मानी जा रही है.
प्लास्टिक की बोतलें क्यों हो रही हैं महंगी?
बोतलबंद पानी के महंगा होने का सीधा संबंध कच्चे तेल (Crude Oil) से है.
- कच्चा माल: प्लास्टिक की बोतलें ‘PET रेजिन पेलेट्स’ से बनती हैं, जो कच्चे तेल का बाय-प्रोडक्ट है.
- लागत में उछाल: कच्चे तेल की कीमतें $119 प्रति बैरल तक पहुंचने से बोतलों के कच्चे माल (प्रीफॉर्म) की लागत ₹115 प्रति किलो से बढ़कर ₹180 हो गई है.
- सप्लाई चैन: महाराष्ट्र बोतलबंद जल निर्माता संघ के मुताबिक, लागत बढ़ने और सप्लाई घटने से 20% फैक्ट्रियों में ताले लग गए हैं.
कांच का संकट: बीयर और सॉफ्ट ड्रिंक्स भी निशाने पर
सिर्फ प्लास्टिक ही नहीं, कांच की बोतलें बनाने वाला उद्योग भी युद्ध की मार झेल रहा है.
- गैस की किल्लत: कांच पिघलाने वाली भट्टियों को चलाने के लिए प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है. प्रशासन ने गैस की सप्लाई में 20% की कटौती कर दी है.
- 20% महंगी हुई बोतलें: कांच की बोतलों के दाम 20% तक बढ़ गए हैं. इसी वजह से शराब निर्माता संघ ने प्रशासनों से बीयर की कीमतों में 12-15% बढ़ोतरी की मांग की है.
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