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बिहार का नक्सली अरविंद 4 साल पहले ही करवा रहा था अपना श्राद्ध, एनकाउंटर में ही लिखी थी मौत

झारखंड के बोकारो में आठ नक्सली सोमवार की सुबह एनकाउंटर में ढेर हुए जिसमें एक बिहार के जमुई का निवासी दुर्दांत अरविंद यादव उर्फ अविनाश दा भी है. अरविंद यादव का बिहार के मुंगेर, जमुई और लखीसराय जिले में करीब 25 साल तक आतंक रहा. अरविंद यादव बेखौफ होकर पुलिस अधिकारियों को भी मौत के घाट उतारता था. उसने कई बार पुलिस वाहनों को बम से उड़ाने की साजिश की. पुलिस की दबिश बढ़ी तो बचने के लिए उसने एकबार अपनी मौत का भी अफवाह उड़वा दिया था.

कैसे नक्सली बना अरविंद यादव?

अरविंद यादव के पिता के हिस्से में जो जमीन थी उसे लेकर विवाद हुआ और यह खूनी संघर्ष में बदल गया. बदला लेने के लिए उतावला अरविंद नक्सल संगठन के संपर्क में आ गया. वर्ष 2000 के आसपास वह नक्सली बन गया. तेज दिमाग वाला अरविंद नक्सल संगठन में आते ही कमांडरों की नजर में बेस्ट बन गया. धीरे-धीरे उसके जिम्मे मजबूत जिम्मेवारी मिलने लगी.

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अरविंद का खौफ बिहार के कई जिलों में रहा

अरविंद का दहशत शुरू हुआ. उसने पुलिसकर्मियों की हत्या भी की. लेवी वसूलने, अपहरण, हत्या, केन बम से जवानों को उड़ाने की साजिश रचने समेत अनेकों कांडों में वह अभियुक्त बना. उसपर अलग-अलग जिलों के कई थानों में केस दर्ज हुए. जहां भी नक्सल संगठन कमजोर पड़ता वहां अरविंद सक्रिय हो जाता था और संगठन को मजबूत करने लगता था.

पुलिस की बढ़ी दबिश तो घबराने लगा था अरविंद

अरविंद ने पुलिस की परेशानी भी बढ़ा दी थी. अब उसे गिरफ्तार करने या उसके एनकाउंटर की तैयारी शुरू हो चुकी थी. अरविंद पुलिस की बढ़ती दबिश से चिंता में जरूर था. उसने एकबार अपने मौत की अफवाह खुद फैला दी थी.

अपनी मौत की अफवाह उड़वायी, घर में श्राद्ध की होने लगी थी तैयारी

करीब चार साल पहले की बात है. यह बात जंगल में आग की तरफ फैली की अरविंद यादव मारा गया. दरअसल, चोरमारा में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी. अरविंद यादव की मौत की समाचार इसी मुठभेड़ में उड़ी थी. स्थिति यह थी कि घर में श्राद्ध कर्म तक की तैयारी हो गयी थी, लेकिन यह सब झूठ था. अरविंद यादव जिंदा था. पुलिस की मानें तो अरविंद ने खुद ही जानबूझकर अपने मारे जाने की अफवाह फैलायी थी. ताकि पुलिस की नजर में वह मृत रहे और सही सलामत वह रह सके. कुछ ही दिनों बाद यह समाचार सामने आ गयी थी कि अरविंद की मौत की समाचार झूठी थी.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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