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भारत में विदेशी उद्यमियों की बढ़ती रुचि

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एप्पल के सीइओ को धमकी दी कि कंपनी हिंदुस्तान में एप्पल फोन का उत्पादन बंद कर दे और इसके बदले एप्पल की फैक्ट्री अमेरिका में स्थानांतरित कर दे. इसके बावजूद एप्पल की सहयोगी कंपनी फॉक्सकॉन ने एप्पल आइफोन के उत्पादन के लिए हिंदुस्तान में 1.5 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की. अब ट्रंप ने अमेरिका में आयातित एप्पल फोन पर 25 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा की. ऐसा अमेरिका के बाहर एप्पल फोन के उत्पादन को हतोत्साहित करने के लिए किया गया है. पर ऐसा लगता है कि कंपनी इस संबंध में अमेरिकी राष्ट्रपति की बात मानने को तैयार नहीं है.

इसी तरह अमेरिका की टैरिफ घोषणा के बाद यूरोपीय आयोग ने भी रक्षा वस्तुओं के उत्पादन में हिंदुस्तान के साथ साझेदारी करने की इच्छा व्यक्त करते हुए कहा था कि वह रक्षा वस्तुओं के उत्पादन में वैश्विक मूल्य शृंखला में हिंदुस्तान को एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखता है. यह देखने की बात है कि ट्रंप की नीतियां विश्व व्यापार के संदर्भ में हमारे लिए लाभकारी नहीं हैं. यह भी साबित हो चुका है कि बहुपक्षीय समझौते हिंदुस्तान जैसे विकासशील देशों के लिए शुभ नहीं हैं. ऐसे में, समय आ गया है कि जब अमेरिका जैसे विकसित देश डब्ल्यूटीओ की अवहेलना कर रहे हैं, तब हमें भी डब्ल्यूटीओ में ट्रिप्स समेत अन्य शोषणकारी समझौतों से बाहर आने की रणनीति के बारे में सोचना चाहिए. ध्यातव्य है कि डब्ल्यूटीओ से पहले, हिंदुस्तान लगभग 10,000 वस्तुओं के आयातों पर मात्रात्मक नियंत्रण (क्यूआर) लगाता था, लेकिन डब्ल्यूटीओ समझौतों के कारण वह संभव नहीं रहा. डब्ल्यूटीओ के विघटन के बाद अब मात्रात्मक नियंत्रण लगाना संभव हो सकेगा, जिससे हमारे लिए अपने उद्योगों को संरक्षित एवं संवर्धित करना संभव हो सकेगा. पूर्व में रोजगार सृजन के उद्देश्य से लगभग एक हजार वस्तुओं के उत्पादन को लघु उद्योगों के लिए आरक्षित रखा गया था, लेकिन डब्ल्यूटीओ के अंतर्गत चूंकि विदेशों से हर प्रकार की वस्तु के आयात को अनुमति अनिवार्य है, ऐसे में लघु उद्योगों के आरक्षण की नीति अप्रभावी हो गयी, और यह आरक्षण धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया. अमेरिका की हठधर्मिता के चलते, यदि डब्ल्यूटीओ समाप्त होता है, तो वैसी स्थिति में हम आरक्षण की नीति फिर से लागू कर अपने छोटे उद्योगों की रक्षा और संवर्धन के लिए कुछ ऐसे उत्पादों को छोटे उद्योगों के लिए आरक्षित कर, विकेंद्रीकरण और रोजगार सृजन के लिए बड़ा प्रयास कर सकते हैं.

अब जब ट्रंप ने दुनियाभर से आयात पर टैरिफ लगा दिया है, तब हमें इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार की रणनीति बनानी होगी. ऐसे कई क्षेत्र हैं, जिन्हें लाभ हो सकता है, क्योंकि हमारे निर्यात को अमेरिका में नये बाजार मिल सकते हैं, जबकि चीन के निर्यात को ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाये गये उच्च पारस्परिक टैरिफ के कारण नुकसान हो सकता है, साथ ही, चूंकि यूरोपीय संघ और अन्य देश वैश्विक मूल्य शृंखला में नयी साझेदारी के लिए आगे आ रहे हैं, ऐसे में, रक्षा जैसे क्षेत्रों में हमें बहुत लाभ हो सकता है. नये परिदृश्य में हिंदुस्तान को बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के बजाय द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के साथ अपना विदेशी व्यापार बढ़ाना चाहिए. हालांकि, अमेरिका और अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते करते समय अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जानी चाहिए, खासकर हमारे किसानों और छोटे उद्यमियों की. हमने देखा है कि पिछले दस वर्षों में प्रशासन व्यापार समझौतों पर बातचीत करते समय किसानों के हितों और उनकी आजीविका की रक्षा कर रही है, चाहे वह ऑस्ट्रेलिया के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से कृषि को बाहर करना हो, या डेयरी और कृषि पर इसके प्रतिकूल प्रभाव की चिंताओं के कारण क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीइपी) से बाहर आना हो. जहां तक कृषि और लघु उद्योग का सवाल है, तो इस नीति को जारी रखने की जरूरत है, खासकर जहां किसानों और श्रमिकों की आजीविका प्रभावित हो रही हो. इसके अलावा, हिंदुस्तानीय रुपये में विदेशी व्यापार को बढ़ाने के लिए प्रशासन के प्रयास सराहनीय हैं. हालांकि, यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए कि स्विफ्ट जैसी पश्चिमी प्रणाली को हमारे देश पर दबाव बनाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल न करने दी जाये. पूरी दुनिया भू-आर्थिक विखंडन के दौर से गुजर रही है और इस परिदृश्य में ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति सफलता की कुंजी है.

एक तरफ जहां ट्रंप द्वारा हिंदुस्तान और दूसरे देशों पर शुल्क बढ़ाये जा रहे हैं और डब्ल्यूटीओ नियमों को दरकिनार किया जा रहा है, वहीं नये परिप्रेक्ष्य में नयी संभावनाएं भी जन्म ले रही हैं. चीन पर अधिक शुल्क लगाने और चीनी सामान पर अमेरिका और यहां तक कि यूरोपीय देशों द्वारा भी विभिन्न प्रकार की रुकावटें लगाने से हिंदुस्तान के लिए इन देशों में संभावनाएं बेहतर हुई हैं. यूरोपीय देश, जो हिंदुस्तान से सामान्यतः प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और अन्य प्रकार के सहयोग से बचते थे, अब हिंदुस्तान को प्रतिरक्षा के क्षेत्र में भी वैश्विक मूल्य शृंखला में शामिल करने के लिए आतुर हो रहे हैं.

ट्रंप द्वारा एप्पल को हिंदुस्तान में निवेश करने हेतु बारंबार मना करने के बावजूद फॉक्सकॉन द्वारा, जो एप्पल कंपनी के आइफोन उत्पादन में मुख्य भूमिका रखती है, 1.5 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा इस बात का संकेत है कि वैश्विक कंपनियां अब हिंदुस्तान को एक महत्वपूर्ण निवेश गंतव्य मान रही हैं. यही नहीं, हाल ही में पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने हेतु हिंदुस्तान द्वारा चलाये गये ऑपरेशन सिंदूर में हिंदुस्तान के घरेलू प्रयास से बनी युद्ध सामग्री की मांग भी शेष दुनिया में बढ़ने की पूरी संभावना है. आने वाले वर्षों में लड़ाकू विमानों समेत विभिन्न प्रकार के प्रतिरक्षा सामान के उत्पादन में निवेश बढ़ने की पूरी संभावनाएं हैं. यही नहीं, हिंदुस्तान प्रशासन द्वारा आत्मनिर्भर हिंदुस्तान की नीति भी देश में निवेश बढ़ाने में खासी सहयोगी सिद्ध हो रही है. समझा जा सकता है कि चाहे अमेरिका द्वारा थोपा गया व्यापार और टैरिफ युद्ध हो अथवा पाकिस्तान द्वारा आतंकी गतिविधियों को प्रश्रय देने के खिलाफ हिंदुस्तान की ऑपरेशन सिंदूर के नाते की गयी कार्रवाई, ये सभी देश में उत्पादन और निवेश के नये अवसर के रास्ते खोल रहे हैं. चीन के प्रति शेष दुनिया की विमुखता, हिंदुस्तान के वैज्ञानिकों और उद्यमियों के प्रयासों और दुनिया की हिंदुस्तान के प्रति बढ़ती रुचि- ये सब हिंदुस्तानीय वित्तीय स्थिति में नयी उम्मीदों का कारण बन रही हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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