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मंत्री से लेकर अफसर तक की पहली पसंद थी Ambassador, फिर क्यों सड़कों से हो गई गायब?

Ambassador Car: कई दशकों तक हिंदुस्तान एंबेसडर सिर्फ एक कार नहीं थी, बल्कि हिंदुस्तान में रौब, प्रशासनी सिस्टम और सत्ता की पहचान मानी जाती थी. केंद्रीय मंत्री हो, मुख्यमंत्री, कलेक्टर या प्रशासनी बाबू, हर जगह यही गाड़ी नजर आती थी. लेकिन 2014 तक ये गाड़ी प्रशासनी बेड़ों से लगभग गायब हो गई और इसके साथ ही एक पूरा दौर भी खत्म हो गया. Ambassador की बादशाहत कोई इत्तेफाक नहीं थी. इसे 1957 में हिंदुस्तान मोटर्स ने लॉन्च किया था. उस समय हिंदुस्तान में कार के ऑप्शन गिने-चुने ही थे. उस दौर में देश में Licence Raj चलता था, जहां गाड़ियों का प्रोडक्शन, इम्पोर्ट और मार्केट में कॉम्पिटिशन सब कुछ प्रशासन के कंट्रोल में होता था.

प्रशासनी विभागों की पहली पसंद क्यों थी Ambassador?

प्रशासनी इस्तेमाल के लिए एंबेसडर गाड़ी एकदम फिट बैठती थी. इसमें काफी जगह मिलती थी, जिससे बड़े अफसर आराम से बैठकर सफर कर लेते थे. इसकी मजबूत बॉडी खराब और उबड़-खाबड़ हिंदुस्तानीय सड़कों पर भी बढ़िया चलती थी. सबसे अच्छी बात ये थी कि इसका मैकेनिज्म इतना आसान था कि दूर-दराज के इलाकों में भी इसे आसानी से ठीक कराया जा सकता था. 

समय के साथ प्रशासनी खरीद के नियमों ने भी इसमें बड़ा रोल निभाया. प्रशासनी विभाग ऐसे गाड़ी को ज्यादा अहमियत देते थे जो पहले से भरोसेमंद हो, देश में ही बनी हो और जिसकी सर्विस हर जगह आसानी से मिल जाए. इन सभी शर्तों पर एंबेसडर पूरी तरह खरी उतरती थी, जिससे प्रशासनी बेड़े में इसकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई.

धीरे-धीरे एम्बेसडर हिंदुस्तान की नेतृत्व और प्रशासनी सिस्टम की पहचान बन गई. इसका सीधा-सादा डिजाइन, बिना ज्यादा दिखावे वाला लुक और सिंपल रंग प्रशासनी अधिकारियों की सादगी वाली छवि को बिल्कुल सूट करता था. यह कार ना ज्यादा लग्जरी दिखती थी और ना ही रौब-दाब वाली, जो उस दौर में काफी मायने रखता था. सड़क पर सफेद एम्बेसडर पर लाल या नीली बत्ती दिखते ही लोग समझ जाते थे कि कोई मंत्री या बड़ा अधिकारी आ रहा है. फिल्मों, न्यूज और रोजमर्रा की जिंदगी में भी इस कार की यही छवि लोगों के दिमाग में बस गई. इसी वजह से एम्बेसडर को धीरे-धीरे ‘प्रशासनी गाड़ी’ वाला खास और मजबूत टैग मिल गया.

दूसरी कारें इसकी जगह क्यों नहीं ले पाई?

1990 के शुरुआती दौर तक एम्बेसडर कार का कोई ढंग का ऑप्शन था ही नहीं. Premier Padmini साइज में छोटी थी, इसलिए प्रशासनी काम-काज और अफसरों की पसंद नहीं बन पाई. बाहर से आने वाली गाड़ियां बहुत महंगी थीं और उन पर कई तरह की पाबंदियां भी लगी रहती थीं. 1991 में आर्थिक सुधार शुरू होने के बाद भी अच्छी, भरोसेमंद और सस्ती नई गाड़ियां लोगों तक पहुंचने में थोड़ा समय लग गया.

आखिर क्यों खत्म हो गया Ambassador का दौर?

धीरे-धीरे Ambassador की चमक फीकी पड़ने लगी. खासकर 90 के दशक के आखिर और 2000 के शुरुआती सालों में. उस समय Maruti Esteem, Tata Indigo और बाद में Swift Dzire जैसी गाड़ियां आ गई. ये गाड़ियां ज्यादा माइलेज, नए फीचर्स और कम खर्च में चलने का फायदा दे रही थीं. ऊपर से सेफ्टी और प्रदूषण के नियम भी सख्त होते चले जा रहे थे, जिससे Ambassador को अपडेट करना Hindustan Motors के लिए काफी महंगा पड़ने लगा.

हालत ये हो गई कि प्रशासनी खरीद भी कम होने लगी. आखिरकार 2014 तक बिक्री इतनी गिर गई और कंपनी पर आर्थिक दबाव इतना बढ़ गया कि Hindustan Motors को Ambassador का प्रोडक्शन बंद करना पड़ा. नई टेक्नोलॉजी और बड़े अपडेट न मिलने की वजह से ये आइकॉनिक कार ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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