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रांची से 50 KM दूर इस गांव में आज भी ‘अंधेरा कायम है’, आजादी के अमृत काल में भी नहीं पहुंची बिजली

Jharkhand Village Story, खूंटी, (प्रशांत तिवारी): एक तरफ देश डिजिटल इंडिया और तकनीक की नई ऊंचाइयों की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर झारखंड की राजधानी रांची से महज 50 किलोमीटर दूर खूंटी जिले का बलंगा गांव आज भी अंधेरे में जीने को मजबूर है. आजादी के 78 साल बाद भी इस गांव में बिजली नहीं पहुंच पाई है. यहां हर शाम सूरज ढलते ही पूरा गांव सन्नाटे और अंधेरे में डूब जाता है. बलंगा गांव मरहू प्रखंड में आता है. यहां के लोगों के लिए अंधेरा सिर्फ बिजली गुल होने की बात नहीं, बल्कि विकास से कटे रहने की कहानी है. नया विचार के प्रतिनिधि प्रशांति तिवारी ने बलंगा गांव पहुंचकर ग्रामीणों की हालात को नजदीक से देखा और गांव में रहने वाले कई लोगों से बातचीत की. आइये जानते हैं गांव के लोगों ने नया विचार के साथ बातचीत में क्या कहा.

आसपास के सब गांव रोशन, बस हमारा नहीं : संजय मुंडा

नया विचार से बात करते हुए ग्रामीण संजय मुंडा ने गांव का दर्द साझा करते हुए कहते हैं कि जब से हमें आजादी मिली है तब से यहां बिजली नहीं लग पायी है. जबकि आजादी मिले हुए हमारे देश को 70 साल से ज्यादा हो गये हैं. हमारे आसपास के सभी गांवों में बिजली लग गयी है, बस हम ही लोग छूट गए हैं.” आज भी हमारे गांव के लोग लालटेन और टॉर्च के सहारे चल रहे हैं.

बिजली कनेक्शन और मीटर लगाने के नाम पर मांगे जा रहे हैं पैसे

वहीं, ग्रामीण संदीप का आरोप है कि ग्रामीणों से “बिजली कनेक्शन और मीटर लगाने के नाम पर 300 से 400 रुपये मांगे जा रहे हैं. जिन्होंने पैसे दिये, उनका कनेक्शन अंदर तक हो गया, जो नहीं दे पाए उनका कनेक्शन ही नहीं हुआ.” प्रशासनी विज्ञापनों में उज्ज्वला योजना को मुफ्त का बताया जाता है, लेकिन गांव में ऐसे कई लोग हैं जो पैसे देने को मजबूर हैं.

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कागजों में गांव रोशन, जमीन पर अंधेरा

साल 2018 में प्रशासन ने खुल मंच से कहा था कि देश का हर गांव में बिजली आ चुकी है. लेकिन बलंगा गांव इस दावे की पोल खोलता है. प्रशासनी नियमों के मुताबिक अगर किसी गांव के 10 फीसदी घरों या किसी सार्वजनिक भवन में बिजली पहुंच जाए, तो गांव को कागजों में “रोशन” मान लिया जाता है. यही वजह है कि फाइलों में बलंगा गांव में बिजली है, लेकिन हकीकत में आदिवासी टोलों और पहाड़ी इलाकों तक तार और खंभे नहीं पहुंचे.

मोबाइल का टॉर्च जलाकर बनाया जाता है खाना

बिजली नहीं होने से गांव की रोजमर्रा की जिंदगी बेहद मुश्किल है. ग्रामीणों के अनुसार पहले उन्हें महीने में 3 लीटर मिट्टी का तेल मिलता था. बाद में यह घटकर 2.5 लीटर, फिर 2 लीटर और अब सिर्फ 1 लीटर रह गया है. वह भी अब बंद होने की कगार पर है. रात में स्त्रीएं या तो लालटेन की कमजोर रोशनी में खाना बनाती हैं या मोबाइल का टॉर्च जलाकर चूल्हा जलाती हैं. जिनके पास यह सुविधा भी नहीं है, वे आज भी पेंसिल बैटरी वाली लाइट से रात काटते हैं.

गांव का सोलर पूरी तरह धूप पर निर्भर

ग्रामीण बताते हैं कि गांव में सोलर से चलने वाली मोटर लगी तो है, लेकिन वह पूरी तरह धूप पर निर्भर है. जैसे ही बादल आते हैं, पानी की सप्लाई बंद हो जाती है. ऐसे में स्त्रीओं को पीने के पानी के लिए पैदल दूर में स्थित डांड़ी (प्राकृतिक जल स्रोत) पर जाना पड़ता है.

वादे हुए, तारीखें बदलीं, बिजली नहीं आई

ग्रामीणों के मुताबिक पहले कहा गया था कि क्रिसमस तक गांव रोशन हो जाएगा, फिर नए साल की डेडलाइन दी गई. लेकिन क्रिसमस और नया साल दोनों गुजर गए, लेकिन गांव आज भी अंधेरे में है.

पढ़ाई पर असर, स्मार्ट टीवी सिर्फ शोपीस

गांव के प्रशासनी प्राथमिक स्कूल में स्मार्ट टीवी और पूरी वायरिंग की गई है, लेकिन बिजली नहीं होने से वह सिर्फ शोपीस बनकर रह गया है. स्कूल निगरानी समिति के अध्यक्ष बताते हैं कि गांव के कई शिशु पढ़ाई छोड़ रहे हैं. इसके पीछे बिजली की कमी भी एक प्रमुख वजह है. अभिभावकों में जागरूकता की कमी और स्थानीय स्तर पर हंडिया संस्कृति भी एक बड़ी वजह बनकर सामने आयी है.

कब आएगी पहली रोशनी?

बलंगा गांव की कहानी आजादी के अमृत काल में विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है. यह गांव सिर्फ बिजली के खंभों और तारों का नहीं, बल्कि उस पहली रोशनी का इंतजार कर रहा है जो सच में इसकी जिंदगी बदल सके.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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