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लिंग आधारित मॉडल से रुकेगा कामकाजी महिलाओं का पलायन, यूनिसेफ युवाह की नई पहल

Women Workforce Migration: हिंदुस्तान में रोजगार के लिए पलायन एक सामान्य रास्ता है, लेकिन कार्यबल में स्त्रीओं की भागीदारी आज भी कई बाधाओं से घिरी हुई है. विशेष रूप से जो युवतियां अपने करियर की शुरुआत करती हैं, उन्हें सुरक्षा की कमी, सामाजिक मानदंडों, वित्तीय असुरक्षा और समर्थन सेवाओं के अभाव के कारण काम के लिए अनजान जगहों पर प्रवास करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए यूनिसेफ युवाह की ओर से हाई लेवल राउंड टेबल सम्मेलन का आयोजन किया.

यूनिसेफ युवाह द्वारा राउंड टेबल सम्मेलन का आयोजन

नई दिल्ली स्थित यूनिसेफ कार्यालय में आयोजित इस सम्मेलन में प्रमुख इकोसिस्टम साझेदारों को आमंत्रित किया गया. इसका उद्देश्य ऐसे सफल और लिंग-आधारित मॉडल पर चर्चा करना था, जो स्त्रीओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक प्रवासन सुनिश्चित कर सकें. यह पहल उन युवतियों को मदद पहुंचाने के लिए है, जो गांवों से शहरों में बेहतर रोजगार की तलाश में जाती हैं.

डिजिटल गर्ल्स हब पहल के तहत प्रवासन सहायता कार्यक्रम

यूनिसेफ युवाह की “डिजिटल गर्ल्स हब” पहल के तहत एक विशेष प्रवासन सहायता कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य उन युवा स्त्रीओं और उनके परिवारों को समर्थन प्रदान करना है जो शहरी क्षेत्रों में काम की तलाश में प्रवास करना चाहते हैं। कार्यक्रम के तहत बंडल, अल्पकालिक सहायता सेवाएं प्रदान की जाएंगी, जिससे स्त्रीओं को सुरक्षित और आत्मविश्वास के साथ प्रवास करने का अवसर मिलेगा।

युवाओं की आकांक्षाओं का सम्मान

युवाह की प्रमुख जियोर्जिया वरिस्को ने बताया, “युवा स्त्रीएं सार्थक और स्वाभिमानी काम करने की इच्छा रखती हैं, लेकिन इन अवसरों की उपलब्धता मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित है. यही कारण है कि हम ऐसा मॉडल तैयार कर रहे हैं जो न केवल स्त्रीओं को प्रवास के लिए प्रोत्साहित करे बल्कि उन्हें पर्याप्त समर्थन भी दे.”

पूर्व नौकरशाहों और संस्थागत भागीदारों की राय

हिंदुस्तान प्रशासन के श्रम और रोजगार मंत्रालय की पूर्व सचिव आरती आहूजा ने सम्मेलन में कहा, “गांव छोड़कर शहर में काम के लिए जाना बहुत बड़ी चुनौती है, खासकर स्त्रीओं के लिए. हमें ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जो उन्हें प्रवास के हर चरण में सहायता प्रदान करें. इसमें स्रोत राज्य में जागरूकता, प्रवास से पहले प्रशिक्षण और गंतव्य स्थल पर सहयोग शामिल हैं.”

राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRDPR) के निदेशक एल. सुधाकर रेड्डी ने कहा, “प्रवास और प्रतिधारण का समाधान किसी एक संस्था के पास नहीं है. यह एक साझा जिम्मेदारी है, जिसमें प्रशिक्षण संस्थान, नियोक्ता और राज्य प्रशासनें मिलकर काम करें.”

लिंग-आधारित मॉडल की जरूरत

सम्मेलन में वक्ताओं ने ऐसे मॉडल विकसित करने पर जोर दिया जो स्त्री-केंद्रित हों और वास्तविक अनुभवों पर आधारित हों. उन्होंने उन उपायों पर चर्चा की, जो स्त्रीओं के लिए सुरक्षित, संगठित और टिकाऊ प्रवास सुनिश्चित कर सकें. इसमें नियोक्ताओं द्वारा कार्यस्थल पर सम्मान और सुरक्षा, सामुदायिक स्तर पर सामाजिक स्वीकृति और प्रशासन द्वारा नीति समर्थन की आवश्यकता प्रमुख रही.

श्रम बल भागीदारी दर में सुधार

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की ओर से प्रकाशित आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अनुसार, 2017-18 से 2023-24 के बीच हिंदुस्तान की कुल श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 51.5% से बढ़कर 60.5% हो गई है. यह वृद्धि मुख्यतः स्त्री श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) में बढ़ोतरी के कारण हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 23.5% से बढ़कर 42.8% हो गई है, जो कि एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक प्रगति को दर्शाता है.

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स्त्री प्रवासन के लिए सेफ इकोसिस्टम की जरूरत

यूनिसेफ युवाह की यह पहल हिंदुस्तान में स्त्री श्रमबल की भागीदारी को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है. यदि प्रवास के सभी चरणों में स्त्रीओं को सही दिशा, सुरक्षा और सहयोग मिले, तो न केवल उनकी सामाजिक स्थिति बेहतर होगी, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति में भी उनका योगदान बढ़ेगा. यह आवश्यक है कि प्रशासन, निजी क्षेत्र और सामाजिक संस्थाएं मिलकर एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाएं ताकि कार्यबल में स्त्रीओं का स्थान सशक्त और स्थायी हो सके.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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