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सदर अस्पताल में पांच महीनों में 1600 से अधिक महिलाओं का हुआ संस्थागत प्रसव

जमुई . मां बनना हर स्त्री के जीवन का सबसे सुंदर सपना होता है, लेकिन यह सपना तब डर और अनिश्चितता में बदल जाता है जब शरीर कमजोर हो, खून की कमी हो और हर कदम पर जान का खतरा महसूस हो. पोषण की अनदेखी और समय पर जांच न होना गर्भावस्था को आसान नहीं, बल्कि कई बार जानलेवा बना देता है. ऐसे में सुरक्षित संस्थागत प्रसव तक पहुंचना कई स्त्रीओं के लिए किसी चुनौतीपूर्ण सफर से कम नहीं होता. जानकारी देते हुए डीपीएम पवन कुमार बताते हैं कि समुदाय में खासकर स्त्रीएं बचपन और किशोरावस्था से ही अपने खान-पान को गंभीरता से नहीं लेतीं, यही लापरवाही आगे चलकर गंभीर एनीमिया का रूप ले लेती है. उन्होंने बताया कि अगर किशोरियों के स्तर पर ही पोषण, रहन-सहन और स्वास्थ्य जांच पर ध्यान दिया जाए तो गर्भावस्था के दौरान स्त्रीओं को इतनी जटिल परिस्थितियों से नहीं गुजरना पड़ेगा.

स्त्रीओं को खुद समझनी होगी अपनी स्थिति

आशा रेखा देवी कहती हैं कि एनीमिया की गंभीरता को स्त्रीओं को खुद समझना होगा. गर्भावस्था के दौरान खून की कमी मां और शिशु दोनों की जान जोखिम में डाल सकती है. समय पर आयरन की गोली लेना, नियमित एएनसी जांच कराना और दिए गए परामर्श का पालन करना ही सुरक्षित संस्थागत प्रसव की सबसे मजबूत नींव है.

अस्पताल में सुरक्षित प्रसव के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध

सदर अस्पताल के स्वास्थ्य प्रबंधक रमेश कुमार बताते हैं कि पिछले 5 महीनों में सदर अस्पताल में कुल 1626 संस्थागत प्रसव कराये गये हैं, जिनमें बड़ी संख्या गंभीर एनीमिया से पीड़ित स्त्रीएं भी शामिल हैं. उन्होंने बताया कि अस्पताल में सुरक्षित प्रसव के लिए सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं. प्रशिक्षित स्टाफ नर्स, दक्ष चिकित्सक, सुसज्जित प्रसव कक्ष, आधुनिक ऑपरेशन थियेटर, नवजात देखभाल की समुचित व्यवस्था और दवाओं की पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है.

सवालों और आशंकाओं के बीच उम्मीद

मजबूत व्यवस्था और समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों की वजह से आज जमुई सदर अस्पताल उन स्त्रीओं के लिए भरोसे का केंद्र बन रहा है, जिनके लिए मातृत्व का सफर कभी डर और असुरक्षा से भरा हुआ था.

केस स्टडी 1

मलयपुर की रहने वाली मधु कुमारी बताती हैं, “जब मुझे मां बनने की समाचार मिली, तो घर में खुशियों का माहौल था लेकिन जांच के बाद डॉक्टर ने बताया कि मेरे शरीर में 7 ग्राम से भी कम खून है. यह सुनते ही डर बैठ गया कि क्या मैं सुरक्षित रह पाऊंगी? क्या मेरा बच्चा सुरक्षित होगा?. मधु बताती हैं कि स्वास्थ्य कर्मियों की लगातार निगरानी, समय पर दवा और सही प्रबंधन ने असंभव को संभव कर दिया और गंभीर एनीमिया के बावजूद उनका सुरक्षित संस्थागत प्रसव हो सका.

केस स्टडी 2

दौलतपुर की सोना कुमारी बताती है कि प्रसव का समय जीवन का सबसे डरावना पल बन गया था. जब मुझसे कहा गया कि मैं एनीमिया की शिकार हूं, तो मैं अंदर तक कांप गयी. मन में बस यही सवाल था कि क्या मैं अपने शिशु को देख पाऊंगी? लेकिन सदर अस्पताल में प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की सतत देख-रेख और व्यवस्थित कार्य-प्रणाली ने उनके डर को भरोसे में बदला. आज सोना और उनका नवजात दोनों सुरक्षित हैं.

केस स्टडी 3

थेगुआ गांव की निभा कुमारी अपनी तकलीफ याद करते हुए बताती है कि मेरी हालत इतनी खराब थी कि चलना-फिरना तक मुश्किल हो गया था. निजी अस्पताल में डॉक्टर ने साफ कह दिया कि प्रसव जानलेवा हो सकता है. निभा बताती हैं कि अगर सदर अस्पताल में समय पर भर्ती नहीं होतीं, तो शायद आज वह अपने शिशु के साथ न होती. तमाम जोखिमों के बावजूद सदर अस्पताल की टीम ने उनका सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित किया.

डिस्क्लेमर: यह नया विचार समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे नया विचार डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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