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समाज ने कहा ‘छक्का’, पत्नी ने छोड़ा साथ, 35 साल की उम्र में पुरुष से ट्रांसजेंडर बनने की कहानी

Varanasi: बनारस के रहने वाले रवि मिश्रा की कहानी एक गहरी आत्ममंथन और सामाजिक संघर्ष की मिसाल है. अब रीना मिश्रा बन चुके रवि ने अपने जीवन में एक ऐसा मोड़ लिया है, जो कई लोगों के लिए हैरान करने वाला हो सकता है, लेकिन उनके लिए यह आत्मस्वीकृति और आत्मसम्मान का रास्ता है. उन्होंने समाज की बंदिशों और तानों से जूझते हुए अपनी असल पहचान को अपनाने का फैसला लिया है. उनका कहना है कि वे किन्नर (ट्रांसजेंडर) बनकर वो जीवन जीना चाहते हैं जिसमें उन्हें सम्मान मिले, तिरस्कार नहीं.

बचपन से थी अलग पहचान (Varanasi) 

रीना (पहले रवि) बताती हैं कि बचपन से ही उन्हें सजने-संवरने, साड़ी पहनने, और लड़कियों के साथ समय बिताने में खुशी मिलती थी. उन्हें खुद के अंदर एक स्त्रीत्व की भावना महसूस होती थी. वे कहती हैं कि उन्होंने हमेशा औरतों की तरह महसूस किया है और उन्हीं जैसे कामों में उनकी रुचि रही है – चाहे वह नाचना हो, गाना हो या घर के काम. हालांकि वे एक पुरुष के रूप में जीवन जीने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन समाज का तिरस्कार और परिवार की उपेक्षा उन्हें अंदर ही अंदर तोड़ रही थी.

समाज और परिवार से मिली उपेक्षा (Real Story of Varanasi boy)

रीना बताती हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ तब हुई जब उनके अपने भाई-भाभी ने उन्हें ताना मारा. समाज से ताने सुनना एक बात है, लेकिन जब घरवाले ही आपके अस्तित्व पर सवाल उठाएं, तो दर्द और गहरा हो जाता है. इस उपेक्षा और मानसिक यातना के चलते उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी, लेकिन पेड़ की डाल टूट जाने से उनकी जान बच गई.

किन्नर समाज में अपनापन और सम्मान (Male to Transgender)

रीना कहती हैं कि उन्होंने देखा है कि समाज भले ही किन्नरों को अलग नजरिए से देखे, लेकिन कई बार उन्हें सम्मान भी मिलता है. लोग उनके आशीर्वाद लेने आते हैं, शिशु के जन्म या किसी शुभ कार्य पर बुलाते हैं. उन्हें लगा कि मर्द बनकर भी अगर उन्हें किन्नर कहकर ताना मिलेगा, तो क्यों न किन्नर बनकर इस पहचान को स्वीकार कर लिया जाए और सम्मान के साथ जीवन जिया जाए.

शादी और वैवाहिक जीवन की विफलता (Transgender)

रीना बताती हैं कि उन्होंने 11 दिसंबर 2018 को शादी की थी. इसके लिए उन्होंने एक शादी कराने वाले को 10 हजार रुपए भी दिए थे. हालांकि ये रिश्ता लंबे समय तक नहीं चल सका. एक साल के भीतर ही उनके और उनकी पत्नी के बीच मतभेद हो गए. उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर चली गई और फिर कभी वापस नहीं आई. वे बताती हैं कि उन्होंने पत्नी से तलाक मांगा लेकिन उसने भी स्पष्ट फैसला नहीं लिया. रीना अब इस रिश्ते को पूरी तरह खत्म मानती हैं और कहती हैं कि अब उनकी पत्नी में कोई दिलचस्पी नहीं रही.

जेंडर चेंज की प्रक्रिया और संघर्ष (Gender change process)

रीना ने ट्रांसजेंडर बनने के लिए जेंडर चेंज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. वह बताती हैं कि उन्हें किन्नर समुदाय में शामिल होने के बाद यह बताया गया कि यदि उन्हें पूरी तरह से इस जीवन को अपनाना है तो जेंडर चेंज कराना होगा. इस प्रक्रिया के लिए उन्होंने आवेदन दे दिया है, दवाएं चल रही हैं और शरीर में कई बदलाव भी महसूस हो रहे हैं – जैसे चेहरे से बालों का हटना. उन्होंने बताया कि अगस्त-सितंबर के महीने में दिल्ली में उनका ऑपरेशन प्रस्तावित है, जिसकी लागत लगभग 1 से 1.5 लाख रुपये आएगी.

समाज से दूरी और आत्मनिर्भरता

रीना मानती हैं कि किन्नर बनने के बाद उनके पास इतना समय नहीं होगा कि वे समाज के तानों का जवाब दें. वे कहती हैं कि जब तक मां-बाप जीवित हैं, वे उनके लिए गांव आती-जाती रहेंगी, लेकिन समाज की बातों से अब फर्क नहीं पड़ता. उन्हें सबसे ज्यादा दुख अपने भाइयों से मिलती बातों से होता है. वे कहती हैं कि अगर भविष्य में गांव में इज्जत और अपनापन नहीं मिलेगा, तो वे वहां जाना छोड़ देंगी.

धर्म और आस्था के प्रति विश्वास

जब उनसे पूछा गया कि क्या वे भगवान के बनाए नियमों को तोड़ रही हैं, तो रीना बड़ी स्पष्टता से कहती हैं कि उन्हें भगवान पर पूरी आस्था है. उनका मानना है कि भगवान ने ही जीवन दिया है और उन्हें जैसा जीवन जीना है, उसे खुलकर जीने का अधिकार भी भगवान ने ही दिया है. वे कहते हैं, “स्त्री का रूप तो स्वयं भगवान नारायण ने भी धारण किया है.” इसलिए वे खुद को भगवान के नियमों के विरुद्ध नहीं, बल्कि उनके दिए हुए जीवन को अपनाने वाली समझती हैं.

आत्मसम्मान की ओर एक कदम

रीना का कहना है कि वे किन्नर बनकर समाज से वह मान-सम्मान पाना चाहती हैं, जो उन्हें अब तक नहीं मिला. उन्होंने कहा, “मैं साड़ी पहनकर, किन्नर बनकर वह इज्जत और मान-सम्मान लेकर जाऊंगी, जो मुझे इस ग्रुप में अब तक नहीं मिला.” उनके अनुसार, किन्नर समुदाय की जिंदगी समाज की सोच से कहीं ज्यादा आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान से भरी होती है.

रीना मिश्रा की यह कहानी केवल एक व्यक्ति के जेंडर परिवर्तन की नहीं है, बल्कि यह आत्मपहचान, आत्मसम्मान और सामाजिक बेड़ियों से बाहर निकलने की जद्दोजहद की कहानी है. यह उन अनगिनत लोगों की आवाज़ है जो समाज की बनी-बनाई परिभाषाओं में खुद को फिट नहीं पाते, लेकिन हार मानने के बजाय खुद को स्वीकार करके एक नई शुरुआत करते हैं. रीना का यह कदम एक साहसिक फैसला है, जो आने वाले समय में कई लोगों के लिए प्रेरणा बन सकता है. उनके लिए यह सिर्फ जेंडर बदलना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को स्वीकार करना है – बिना किसी डर, शर्म और संकोच के.

नोट- आपके आप भी अपनी कोई ऐसी कहानी है तो मेरे मेल आईडी  amankrpandeyprabhatkhabar@gmail.com पर मेल करें.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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