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हाईकोर्ट का फटकार भरा आदेश: वर्दी छोड़ रंगीन कपड़ों में कोर्ट पहुंची पुलिस, DGP को भेजा नोटिस

Allahabad Highcourt Police Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि पुलिस अधिकारियों को अदालत की कार्यवाही के दौरान निर्धारित प्रशासनी वर्दी में ही उपस्थित होना चाहिए. यदि कोई अधिकारी रंगीन सिविल कपड़ों में कोर्ट में आता है, तो यह न्यायपालिका की मर्यादा और गरिमा का स्पष्ट उल्लंघन माना जाएगा. न्यायालय ने यह टिप्पणी उस समय की जब एक भ्रष्टाचार मामले में आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान एक पुलिस अधिकारी बिना वर्दी के अदालत में उपस्थित हुआ. कोर्ट ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए संज्ञान लिया और स्पष्ट किया कि भविष्य में इस प्रकार की अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

आदेश की प्रति डीजीपी और प्रमुख सचिव को भेजी

कोर्ट ने इस मसले पर गंभीर रुख अपनाते हुए आदेश दिया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्देश पुलिस महानिदेशक (DGP) और उत्तर प्रदेश प्रशासन के प्रमुख सचिव (विधि) तक पहुंचाया जाए. रजिस्ट्रार (अनुपालन) को जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे इस आदेश की प्रति संबंधित अधिकारियों को जल्द से जल्द प्रेषित करें, ताकि आगे इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि संपूर्ण राज्य की पुलिस व्यवस्था के लिए दिशा-निर्देशक आदेश है, और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही अस्वीकार्य होगी.

मामला: रिश्वत लेने के आरोपी की जमानत याचिका

यह मामला मिर्जापुर जिले का है, जहां भ्रष्टाचार निवारण संगठन (Anti-Corruption Organization) की टीम ने याची शकील अहमद को पांच हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ लिया था. आरोप था कि शकील अहमद ने एक गंभीर आपराधिक मामले में जांच अधिकारी की भूमिका निभाते हुए एक व्यक्ति से नाम न शामिल करने के एवज में पैसे मांगे थे.
यह घटना 22 फरवरी 2025 की है, जिसके बाद से शकील अहमद न्यायिक हिरासत में हैं. उन्होंने अपनी जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां से यह पूरा मामला शुरू हुआ.

कोर्ट में पेश की गई केस डायरी, याची नहीं था जांच अधिकारी

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याची के वकील ने यह दलील दी कि उनके मुवक्किल शकील अहमद को कभी भी उस मुकदमे की जांच सौंपी ही नहीं गई थी. इसलिए उन पर रिश्वत मांगने का कोई औचित्य नहीं बनता.
इस तर्क को ध्यान में रखते हुए अदालत ने जांच अधिकारी कृष्ण मोहन राय को केस डायरी सहित कोर्ट में तलब किया. जब केस डायरी का गहन परीक्षण किया गया, तो यह तथ्य सामने आया कि शकील अहमद का नाम जांच अधिकारियों की सूची में नहीं था. इस आधार पर अदालत ने याची को कुछ शर्तों के साथ जमानत प्रदान कर दी, और इस बात को भी दर्ज किया कि प्रारंभिक आरोप बिना ठोस आधार के लगाए गए थे.

वर्दी की जगह रंगीन शर्ट-पैंट में पहुंचे जांच अधिकारी

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जब जांच अधिकारी कृष्ण मोहन राय, जो कि मिर्जापुर भ्रष्टाचार निवारण संगठन में निरीक्षक पद पर कार्यरत हैं, कोर्ट में उपस्थित हुए, तो उन्होंने प्रशासनी वर्दी की जगह रंगीन शर्ट और पैंट पहन रखी थी. जब अपर शासकीय अधिवक्ता ने उन्हें कोर्ट में इस प्रकार सिविल ड्रेस में आने को लेकर टोका, तो वे नाराज हो गए और इसका विरोध जताया. कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम की कड़ी निंदा की और कहा कि कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले इस प्रकार के रवैये को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा. साथ ही, जांच अधिकारी को चेतावनी दी गई कि भविष्य में यदि वे फिर इस तरह की अनुशासनहीनता करते हैं, तो उनके खिलाफ कठोर कदम उठाए जा सकते हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश से स्पष्ट है कि न्यायपालिका न केवल अपने निर्णयों में पारदर्शिता चाहती है, बल्कि उससे जुड़े सभी अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस प्रशासन से भी सख्त अनुशासन और गरिमापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा रखती है. यह आदेश भविष्य में उन सभी पुलिस अधिकारियों के लिए एक संदेश है कि अदालत की मर्यादा सर्वोपरि है, और कोर्ट परिसर में उनकी वर्दी न केवल पहचान, बल्कि सम्मान की प्रतीक है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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