Freebies Schemes: प्रशासन की ओर से फ्रीबीज जो मुफ्त की योजनाएं लाई जाती हैं, चलाई जाती हैं और लोगों को सुविधा दी जाती है. उन योजनाओं पर बात करना जरूरी है. मुफ्त की योजना जैसे बिजली फ्री, पानी फ्री, अनाज फ्री, फ्री में स्त्रीओं को पैसा, फ्री में बेरोजगारों को पैसा दिया जा रहा है. फ्रीबीज योजनाएं देश के लोगों को आत्मनिर्भरता की ओर से आगे ले जा रही हैं या फिर नागरिकों में मुफ्तखोरी की आदत डाल रही हैं. इस मुद्दे पर हमने झारखंड की राजधानी रांची के चार्टर्ड एकाउंटेंट विनोद बंका से विस्तार से बातचीत की. आइए, उनकी बातों को विस्तार से जानते हैं. प्रश्न: फ्रीबीज स्कीम्स से स्त्रीओं, युवाओं और गरीबों की आत्मनिर्भरता बढ़ती है या उनमें मुफ्तखोरी की आदत पड़ती है? विनोद बंका: देखिए, इसमें कोई दो राय नहीं है कि समाज में एक तबका ऐसा भी जिसके कंधे पर हाथ रखकर आगे बढ़ाने की जरूरत है. उनको एक स्पेशल सपोर्ट चाहिए. मगर, इसका यह मतलब नहीं है कि हम उसे सबकुछ फ्री में दे दें. कभी भी किसी को बिना किसी प्रयास के कोई सुविधा मिलती है, तो वह उसकी कीमत नहीं समझता है. धीरे-धीरे वह आत्मनिर्भरता तो नहीं, फ्रीबीज पर डिपेंडेंट हो जाता है. एक तरह से हमलोग उसको बेकार कर देंगे. उसके टैंलेंट को…उसकी जो रचनात्मक क्षमता है, उसका विकास नहीं कर रहे हैं. फ्रीबीज किसी को भी बहुत ज्यादा बेनिफिट देने वाला नहीं है. हमलोगों को ऐसी स्कीम लेके आनी चाहिए, जिससे हमलोग उन्हें उद्यमी बनाएं, उनकी कुशलता को डेवलप कर सकें, स्वरोजगार की ओर आगे बढ़ा सकें, ताकि उनको ये लगे कि हम कुछ किए हैं, तब हमको ये प्राप्त हुआ है. धीरे-धीरे वो ऐसा हो जाएगा कि हमको जब मुफ्त में ही मिल रहा है, तब कुछ करने की जरूरत नहीं है. मेरे ख्याल से सभी पॉलिटिकल पार्टी फ्रीबीज बांट रही हैं, मैं उसके अगेंस्ट में हूं. सुप्रीम कोर्ट ने भी बोला है कि फ्रीबीज के लिए स्पेशल डेलीगेशन बनना चाहिए. राज्यों पर बोझ बढ़ रहा है. उनकी फाइनेंशियल स्थिति खराब हो रही है. इलेक्शन जीतने के लिए भले ही हम फ्रीबीज की घोषणा कर दे रहे हैं, लेकिन अल्टीमेटली हम एक बड़े तबके को नीचे ले जा रहे हैं. मेरा ये मानना है. प्रश्न: राजकोषीय घाटा, राजकोष, प्रशासन की बैलेंसशीट, टैक्सपेयर्स और वित्तीय स्थिति पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है. विनोद बंका: देखिए, जैसा कि मैंने पहले क्योश्चन में ही बताया था कि प्रशासन टैक्स का पैसा कलेक्शन करती है विकास के लिए. अगर उसे हम फ्रीबीज में बांट दे रहे हैं, तो हमलोगों पर वित्तीय बोझ तो बढ़ता ही है और जब पैसा घटता है, तब हम लोन लेते हैं और वो पैसा इंट्रेस्ट में जा रहा है. विकास का काम ठप पड़ रहा है. धीरे-धीरे स्टेट पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है. ये राजकोषीय घाटा बढ़ाता है, बैलेंसशीट प्रशासन की नेगेटिव होती है और टैक्सपेयर को यह कहीं भी सटिस्फैक्शन नहीं होता है कि हम जो पैसा टैक्स के रूप में जमा कर रहे हैं, उसका सदुपयोग हो रहा है. इन सारी स्कीम्स का नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है. इसका एक्जाम्पल हमलोग पड़ोसी स्टेट में देख चुके हैं. श्रीलंका, पाकिस्तान और सुनने में आया है कि मालदीव की हालत भी बहुत खराब है. ये अल्टीमेटली होना ही है. इसलिए आप सावधानीपूर्वक तथ्यों को आगे बढ़ाइए. कहीं पर भी हमलोगों को कोई शिकायत नहीं है, मगर उसको इस तरह से आगे बढ़ाइए कि उनको ये लगे कि हम कुछ कर रहे हैं, तब हमको मिल रहा है. उनको जो पैसा प्रशासन की ओर से मिल रहा है, वह इंटरपेन्योरशिप के रूप में आगे बढ़े और स्वरोजगार के रूप में आगे बढ़े, तभी इसकी सफलता है, अन्यथा यह असफल है. प्रश्न: फ्रीबीज के लिए प्रशासन पैसा कहां से लाती है? विनोद बंका: देखिए, प्रशासन को फ्रीबीज बांटने के लिए जो भी पैसा चाहिए, वह या तो टैक्सपेयर का पैसा है या फिर प्रशासन लोन लेती है. हमलोग देख ही रहे हैं कि बहुत सारे स्टेट में उस पर परसेंटेज बहुत ज्यादा बढ़ गया है. जीडीपी पर बहुत बड़ा बोझ है और प्रशासन की आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा इंट्रेस्ट पे करने में जा रहा है. ये एक तरह से प्रशासन जो टैक्स का पैसा कलेक्शन कर रही है, जिससे विकास का काम होना चाहिए, उसका दुरुपयोग है. एक प्रकार से हमसे पैसा लेकर दूसरों में बांटा जा रहा है. बांटने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन आप उसे क्वांटिटेटिव वे में बांटिए. यह इस तरह से महसूस होना चाहिए कि हम कुछ कर रहे हैं. हमलोग गीता को पढ़ते हैं न, जिसमें कर्म को प्रधान कहा गया है. इंटरप्राइजिंग गेस्चर के रूप में फ्रीबीज को बांटना चाहिए. फ्रीबीज अपने आप में घातक स्कीम्स हैं. प्रश्न: प्रशासनें फ्रीबीज स्कीम्स चला रही हैं, उसका उद्देश्य क्या है? विनोद बंका: बहुत अच्छा सवाल है आपका. देखिए, फ्रीबीज सभी पार्टियां बांट रही हैं. मैं किसी पॉलिटिकल पार्टी के अगेंस्ट नहीं हूं और पक्षधर भी नहीं हूं. फ्रीबीज का उद्देश्य जो है, पेपर में भले ही है कि हम उसे सपोर्ट करना चाहते हैं, ताकि वह अपनी बेसिक नीड को बीट करे और उसे जो अभी तक आधारभूत सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं, वह उसे प्राप्त हो. लेकिन, अल्टीमेटली हम उसको ले कहां जा रहे हैं? उद्देश्य जो है, वह लॉन्ग रन में होना चाहिए. शॉर्ट टर्म में आप भले ही उसे बेनिफिट दे रहे हैं और उसमें भी इसमें बहुत सारा मैनुपुलेशन हो रहा है. एकाउंट्स में पैसा जा रहा है, उसको कितना पैसा मिल रहा है या कि नहीं मिल रहा है? सही आदमी को पैसा मिल रहा या नहीं मिल रहा है? बहुत पहले हमारे एक्स प्राइम मिनिस्ट बोले थे कि केंद्र से 1 रुपया देते हैं, तो 15 पैसा पहुंचता है. डीबीटी स्कीम से तो वह सक्सेस हुआ है और लाभार्थी के पास हैंड्रेड परसेंट पैसा जाता है. लेकिन, वह पैसा उसको मिल रहा है या नहीं मिल रहा है कि दलालों के चक्कर में पड़ जा रहा है? हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए कि प्रशासन हर नागरिक को उद्यमशील बनाए और देश के आर्थिक विकास में कंट्रीब्यूट करने लिए प्रेरित करे. स्कीम का उद्देश्य ये होना