Naya Vichar Exclusive Interview Part-1: ‘हमारी दुनिया से बड़ी-बड़ी सभ्यताएं खत्म हो गईं. यूनान खत्म हो गए, मिस्र खत्म हो गया, सब खत्म हो गए. कुछ बात तो है कि जो हिंदुस्तान बचा हुआ है.’ जी हां, ये बात हम नहीं, बल्कि राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश ने कही है. सदियों से हिंदुस्तान और इसकी संस्कृति समृद्ध रही है. इसकी समृद्धि से ललचाकर विदेशी आक्रांताओं ने हमलों पर हमले किये, लूटपाट मचाई, नरसंहार किया और माल-आसबाब लूटकर वापस चले गए. कुछ विदेशी आक्रांता आए और यहीं के होकर रह गए. अंग्रेजों ने न केवल यहां की समृद्धि को लूटा, बल्कि दो सौ साल तक हिंदुस्तान को गुलाम बनाए रखा. विदेशी आक्रांताओं ने चाहे लाख हमले किए, फिर भी हिंदुस्तान की समृद्धि और इसकी हस्ती को मिटा न सके. हिंदुस्तानीय सभ्यता के बाद पनपी दुनिया की कई सभ्यताएं खत्म हो गईं, लेकिन हिंदुस्तान आज भी हिमालय की तरह अडिग-अविचल खड़ा और डटा है. दुनिया भर के शासकों, विचारकों, शोधकर्ताओं और इतिहासकारों ने हिंदुस्तान की इसी समृद्धि के राज को जानने की कोशिश की और अनेक शोध किए. फिर भी, उसकी तह तक नहीं पहुंच पाए. हिंदुस्तान की इसी समृद्धि का राज जानने के लिए नया विचार डॉट कॉम के संपादक श्री जनार्दन पांडेय ने राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश से खास बातचीत की, जिसे हम आपको कुछ कड़ियों में पढ़ाने जा रहे हैं. आपकी सुविधा के लिए इंटरव्यू का वीडियो भी पेश किया जा रहा है. आपके सामने पेश है इस इंटरव्यू का पार्ट-1. जनार्दन पांडेय: हिंदुस्तान में एक विलक्षण जगह है बलिया. उत्तर प्रदेश और बिहार के बॉर्डर पर स्थित है. जब अंग्रेजी हुकूमत से हम सब आक्रांत थे, तब उस बलिया से मंगल पांडेय निकल कर के आते हैं और आवाज उठाते हैं. उसी बलिया से चित्तू पांडेय अंग्रेजों के खिलाफ जमकर खड़े रहते हैं, डट कर के खड़े रहते हैं. जब बात आजाद हिंदुस्तान में इमरजेंसी की आती है, तो उसी बलिया से निकलने वाले जेपी हिंदुस्तान को संपूर्ण क्रांति का नारा देते हैं और एक नया कालखंड शुरू करते हैं. हिंदुस्तान की नेतृत्व में एक नया अध्याय शुरू होता है बिफोर जेपी और आफ्टर जेपी करके आप उसे नाप सकते हैं. और उसी बलिया से एक ऐसे शख्सियत से आज हम रूबरू हो रहे हैं, जिनके बारे में अगर आप किसी से कुछ पूछेंगे ना कि आप उनको जानते हैं, तो इतने किस्से सुनाएंगे कि आपको कई दिन लग जाएंगे उस पूरे किस्से को सुनते सुनते. अगर आप उनके लिखे हुए को पढ़ना शुरू करेंगे, तो कई महीने लगेंगे उस पूरे, जो उनका लिखा हुआ साहित्य है… जो लिखा हुआ उनका पत्रकारी विमर्श है, उसको पढ़ते-पढ़ते कई वक्त लगेंगे आपको…. और कहीं अगर आपको उनसे मिलकर के बातचीत करने का अवसर मिल जाए, तब तो आप चाहेंगे कि बातचीत का सिलसिला खत्म ही ना हो. तो ऐसे ही एक शख्सियत हमारे साथ आज इस खास कार्यक्रम में मौजूद हैं. आपका स्वागत करता हूं राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह जी. बहुत स्वागत है सर. हरिवंश: बहुत-बहुत धन्यवाद तुम्हें और तुम्हारी टीम का. जनार्दन पांडेय: सर मैं जब आ रहा था ना, तो बड़ा संकट में मैं था कि मैं कहां से शुरू करूं. मैं उस गांव से शुरू करूं जो एक साल में छह महीने जलमग्न रहता है, जिसमें आम जरूरतों के लिए पानी में उतर कर के कहीं जाना पड़ता है या फिर उस जीवट से जो उस गांव से लेकर के बीएचयू ले जाती है, फिर मुंबई ले जाती है, फिर कोलकाता ले जाती है, हैदराबाद ले जाती है, दिल्ली ले जाती है और फिर उन सभी चकाचौंध को समेट हुए वहां से निकल कर एक संघर्षशील जगह रांची जैसे शहर में ले आती है… या फिर आपके उस पत्रिय संघर्ष के बारे में बात करूं, जो एक अखबार को 400 कॉपी से हिंदुस्तान के सबसे प्रमुख अखबारों की श्रेणी में ले आता है या फिर मैं प्रधानमंत्री के 9 अगस्त के उस व्याख्यान से शुरू करूं, जिसमें वो कहते हैं कि मतलब आप कलम के वह सिपाही हैं, जिनसे बाकी लोगों को सुनना चाहिए. बड़ा जद्दोजहद था मेरे मन में, फिर मैंने कहा कि मैं शुरुआत करूंगा आपकी उन 10 किताबों की पुस्तक शृंखला से… किताब की सीरीज से… जो आपने हाल ही में रिलीज की है. समय के सवाल तो उस तरफ मैं आगे बढूंगा, लेकिन उससे पहले मेरा पहला सवाल है कि आपको लोग एक कुशल प्रबंधक, प्रखर पत्रकार और एक गंभीर चिंतक के रूप में जानते हैं, लेकिन आप एक बेटे, भाई, पति और एक पिता और अब एक दादाजी कैसे हैं? हरिवंश: जनार्दन, व्यक्ति कुछ नहीं होता. आइंस्टीन ने अपने रोजमर्रा के जीवन के संदर्भ में एक बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही थी. अभी हाल के दिनों में पीएन हकसर का सरोजिनी नायडू पर दिया गया मेमोरियल लेक्चर पढ़ रहा था. आप जानते हो, पीएन हकसर हम से असहमत हैं. अलग बात है कि इंदिरा जी के जमाने में उनके प्रिंसिपल सेक्रेटरी थे हकसर जी और इस देश के नीति नियंताओं में अपने समय के सबसे बड़े लोगों में शुमार होते थे. सरोजनी नायडू जी की स्मृति के दौरान उन्होंने कहा कि आइंस्टीन ने कहा है कि जो हम रोज जीते हैं और जिन लोगों से मिलते हैं, जिनमें आपसे मिलना भी है, आपकी टीम से भी मिलना है. हकसर जी को हम हमेशा याद रखते हैं कि ये हमारे पहले के और हमारे साथ के उन हजारों हजार लोगों के साथ, जिनके साथ मैंने यात्रा की है. उनके कारण मुमकिन हो पाया, जिस चीज का अभी आपने उल्लेख किया. ये उनके कारण मुमकिन हुआ कि आज मैं यहां आपके सामने हूं. मेरी जिन चीजों से पहचान आज मुझे दुनिया देती है कि आप एक पत्रकार हैं या आप वो हैं. यह एक समय का आवरण है, पर यह सारी चीजें मुमकिन हुई है आप जैसे जो हजारों लोग साथ यात्रा करते रहे हैं, उनके सहयोग… उनके हमारे पहले जो हुए… उनके की हुई चीजें… संविधान निर्माताओं ने संविधान दिया, जिसके माध्यम से आज मैं उस जगह में पहुंचा. हमारे समय के जो बड़े प्रखर लोग अपने अपने क्षेत्रों में रहे, उनके सौजन्य से मुझे अलग-अलग जगहों पर मौके