विनय कुमार मिश्र/ Bihar News: जमुई जिले के सोनो प्रखंड में बरनार जलाशय निर्माण को लेकर हाल के दिनों में क्षेत्रवासियों की उम्मीदें जगी हैं. खासकर फरवरी माह में बिहार कैबिनेट की बैठक में जब से इस जलाशय निर्माण की स्वीकृति मिली है. इसके लिए लगभग 2580 करोड़ का बजट प्रस्तावित किया गया है. तब से दम तोड़ रही लोगों की उम्मीदों में नयी जान आ गयी है और फिर से बरनार जलाशय चर्चा में आ गया है. इसकी स्वीकृति को लेकर श्रेय लेने की होड़ लग गयी, पर इन सबसे इतर क्षेत्र के जानकार लोग संशय में हैं. उनके जेहन में प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे हैं कि क्या वास्तव में अब बरनार जलाशय का निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाएगा. क्या इसके बनने में जो भी बाधाएं थीं वह दूर हो गयी हैं. कहीं हर बार की तरह इस चुनावी वर्ष में भी यह सिर्फ छलावा तो नहीं है. वन विभाग से अब तक नहीं मिल सका है अनापत्ति प्रमाण पत्र बुद्धिजीवियों के मन में उठते प्रश्न के ठोस कारण भी हैं. दरअसल 70-80 के दशक में इस परियोजना को धरातल पर उतारने के प्रयास के साथ ही इसे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. इसमें से 90 के दशक में वन विभाग द्वारा जतायी गयी आपत्ति सबसे बड़ी बाधा बनी. डैम के बनने पर जंगल के डूब क्षेत्र से होनेवाले नुकसान और प्रयुक्त जमीन की क्षतिपूर्ति के लिए वन विभाग को उतनी जमीन चाहिए थी. इस मुश्किल के बाद बंद हुआ निर्माण कार्य वन विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र की बाट जोहता रह गया. बरनार जलाशय निर्माण की कई मुश्किलों में वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना सबसे बड़ी बाधा बना, जिसका पूर्ण समाधान आज तक नहीं हो सका. अब लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि वन विभाग से बिना अनापत्ति प्रमाण लिए कैबिनेट में निर्माण की स्वीकृति देकर भी निर्माण कैसे कराया जाएगा. प्रगति यात्रा के दौरान सीएम ने दिखायी थी रुचि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रगति यात्रा के दौरान जमुई आगमन पर बरनार जलाशय के प्रति रुचि दिखायी थी. कैबिनेट में स्वीकृति के बाद तीन अप्रैल को उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी, मुख्य सचिव व विभागीय प्रमुख सचिव के साथ बरनार निर्माण स्थल का हवाई सर्वेक्षण किये. इसके एक दिन बाद ही सिंचाई प्रमंडल झाझा के कार्यपालक अभियंता दीपक प्रधान के नेतृत्व में कई विभागीय पदाधिकारियों की एक टीम बरनार जलाशय निर्माण के लिए प्रस्तावित स्थल पर पहुंचकर प्री कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी की विधिवत शुरुआत की. इसमें सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता सह समाजसेवी रमेश प्रसाद सिंह ने महती भूमिका प्रदान की. इस एक्टिविटी के दौरान महाराष्ट्र के पुणे से आयी टीम ने आधुनिक तकनीक से लैस बड़े ड्रोन और सेटेलाइट के माध्यम से डूब क्षेत्र, डिस्ट्रीब्यूशन प्वाइंट, बायां व दायां केनाल वगैरह का ड्रोन से सर्वे का कार्य प्रारंभ किया, जो लगभग 20 से 25 दिनों तक चलेगा. इससे कवर केनाल के लिए भूमि सहित अन्य कई डाटा को प्राप्त किया जा रहा है. अभी भी वन विभाग को चाहिए 667.76 एकड़ जमीन डैम का पानी पहाड़ और जंगल के बीच जहां जमा होगा, उस डूब क्षेत्र का रकबा 1135.87 एकड़ है. इसी डूब क्षेत्र की जमीन के बदले वन विभाग को अन्यत्र कहीं जमीन चाहिए. इसके लिए जमुई के तत्कालीन डीएम कौशल किशोर ने 468.11 एकड़ जमीन को कैबिनेट से स्वीकृति दिलवाकर भूमि वन विभाग को हस्तांतरित करवा दी थी. शेष 667.76 एकड़ गैर वन भूमि अभी भी वन विभाग को चाहिए, जिसे बीते 10 वर्षों में भी नहीं दिया जा सका. अब इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर काम तेज हो गया है. इसके लिए डीएम अभिलाषा शर्मा द्वारा सार्थक पहल की जा रही है. इसके तहत 478 एकड़ भूमि वन विभाग को हस्तांतरित करने के लिए स्वीकृति दी गयी है, जिसे जल्द ही कैबिनेट से मंजूरी मिल जाएगी. बिना पूरी जमीन लिए वन विभाग नहीं देगा अनापत्ति प्रमाण वन विभाग बिना पूरी जमीन लिए अनापत्ति प्रमाण नहीं देगा, यह तो इतने दिनों में लोगों की समझ में आ चुका है. सूत्र की मानें तो वन विभाग प्राप्त जमीन का म्यूटेशन सहित अधिग्रहण करना चाहता है. साथ ही ऐसी जमीन चाहता है, जो पहाड़ी पठारी न हो यानि समतल हो. अगर इस तरह की भूमि नहीं होगी, तो उन्हें समतल समतुल्य के हिसाब से अधिक जमीन चाहिए. कुल मिलाकर वन विभाग समतल और म्यूटेशन सहित जमीन चाहता है. वन विभाग के डिमांड से प्रशासन की कठिनाई बढ़ना स्वाभाविक है. लिहाजा प्रक्रिया में समय भी लगेगा. इस परिस्थिति में जलाशय निर्माण और लागत राशि के कैबिनेट स्वीकृति का क्या होगा. केनाल के लिए आवश्यक भूमि का भी नहीं हो सका है पूर्ण अर्जन जलाशय बनने के बाद सिंचाई के लिए पानी के निकास और डिस्ट्रीब्यूशन को लेकर बननेवाले बायां और दायां कवर केनाल के लिए आवश्यक भूमि का पूरी तरह अब तक अर्जन नहीं हो सका है. इसके लिए आवश्यक 633.33 एकड़ भूमि के बदले अभी तक 490 एकड़ भूमि अर्जित की जा चुकी है. पर, अभी भी 143.33 एकड़ भूमि का अर्जन शेष है. यहां गौर करनेवाली बात यह है कि यह भूमि रैयती है, जिसके लिए भू मालिकों को मुआवजा भी देना होगा. यहां बता दें कि इस परियोजना के लिए आम लोगों से ली गयी जमीन के एवज में उस समय 55 करोड़ की राशि मुआवजे के तौर पर दी गयी थी. शुक्रवार से शुरू किये गये मुख्य केनाल और इसकी शाखा की जमीन के ड्रोन सर्वेक्षण के बाद प्राप्त रिपोर्ट व नक्शा को सिंचाई विभाग अंचल कार्यालय और भू अर्जन कार्यालय को देगा. इसके बाद शेष भूमि का भू अर्जन होगा. स्वाभाविक तौर पर इसमें भी समय लगेगा. एनएच के लिए लैंड बैंक में दी गयी भूमि को बरनार परियोजना में एडजस्ट करने की हुई मांग डीएम अभिलाषा शर्मा ने 27 मार्च को मुख्य सचिव पटना के नाम लिखे पत्र में बरनार जलाशय के लिए वन विभाग को दिये जानेवाले शेष 190.0562 एकड़ समतल समतुल्य भूमि को उस 572.68 एकड़ गैर वन भूमि में से समायोजित करने की मांग की है, जिसे जमुई प्रशासन द्वारा राष्ट्रीय उच्च पथ परियोजना के लिए लैंड बैंक में दिया गया था. वन विभाग को दी जानेवाली जमीन की व्यवस्था को