आधुनिक हिंदुस्तान के निर्माता पं जवाहरलाल नेहरू को इस संसार से गये इकसठ वर्ष हो गये हैं. इस अवसर पर उनकी यादों को ताजा करते हुए पहली बड़ी बात यही याद आती है कि स्वतंत्रता के पहले सूर्योदय से पूर्व 14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि तत्कालीन वायसराय लॉज (अब राष्ट्रपति भवन) में उन्होंने जो ऐतिहासिक ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ भाषण दिया, जानकार उसे बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ भाषणों में गिनते हैं. अलबत्ता, उनके उसके बाद के कई भाषण भी कुछ कम उल्लेखनीय नहीं हैं. यह बात और है कि तब तक उनके प्रधानमंत्री काल की कई तल्ख हकीकतों से रूबरू देश का सुहाना सपना टूटने, उल्लास फीका होने और उत्साह मंद पड़ने लगा था. वर्ष 1954 के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से देशवासियों को आईना दिखाते हुए उन्होंने कहा था- हम अभी आजादी के रास्ते पर हैं, यह न समझिए कि मंजिल पूरी हो गयी है. हमें इस देश के एक-एक आदमी को आजाद करना है. यदि देश में कहीं गरीबी है, तो (मानना होगा कि) वहां तक आजादी नहीं पहुंची. इसी तरह, यदि हम आपस के झगड़ों में फंसे हुए हैं, आपस में बैर है, बीच में दीवारें हैं, तब भी हम पूरे तौर पर आजाद नहीं हैं. हिंदुस्तान के किसी गांव में किसी हिंदुस्तानी को, चाहे वह किसी भी जाति का है, यदि उसको हम उसे जातिसूचक शब्दों से पुकारें, हरिजन कहें, यदि उसको खाने-पीने में, रहने-चलने में वहां कोई रुकावट है, तो वह गांव भी आजाद नहीं है, गिरा हुआ है. वर्ष 1958 के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देशवासियों को संबोधित करते हुए वे कुछ और यथार्थवादी हो उठे थे- यहां मैं आपके सामने किसी एक दल की तरफ से नहीं खड़ा हुआ हूं. एक मुसाफिर की तरह से, आपके हमसफर के रूप में खड़ा हुआ हूं. इस मुल्क के करोड़ों लोगों से और आपसे यह दरखास्त करने कि जरा हम अपने दिल में देखें, अपने को और औरों को समझाएं कि इस वक्त भी लोग आपस में झगड़ा-फसाद करते हैं, एक-दूसरे को मारते हैं और एक-दूसरे की संपत्ति को जलाते हैं, तो हमारा कर्तव्य क्या है? कोई भी पॉलिसी हो, उसमें हम सफल एक ही तरह से हो सकते हैं कि हम मिलकर, शांति से काम करें. नहीं तो हमारी सारी ताकत एक-दूसरे के खिलाफ जाया हो जाती है. यदि हमारी राय में फर्क है तो हम एक-दूसरे को समझाएं, एक-दूसरे को अपनाएं. दूसरा और कोई तरीका नहीं है. वर्ष 1960 में उन्होंने लाल किले से कहा था कि आजादी की सालगिरह कोई तमाशा नहीं है. यह एक बार फिर से इकरार करने का दिन है, फिर से प्रतिज्ञा करने का, फिर से जरा अपने दिल में देखने का कि हमने अपना कर्तव्य पूरा किया कि नहीं. आजादी की लड़ाई हमेशा जारी रहती है. कभी उसका अंत नहीं होता. हमेशा उसके लिए परिश्रम करना पड़ता है, हमेशा उसके लिए कुर्बानी करनी पड़ती है, तब वह कायम रहती है. जब कोई मुल्क या कौम ढीली पड़ जाती है, कमजोर हो जाती है, असली बातें भूलकर छोटे झगड़ों में पड़ जाती है, उसी वक्त उसकी आजादी फिसलने लगती है. उस समय उन्होंने लोगों से पूछा था कि आजादी किसके लिए आयी? क्या चंद लोगों के लिए आयी? जवाहरलाल के लिए आयी कि उसको आपने चंद रोज के लिए प्रधानमंत्री बना दिया? नहीं, जवाहरलाल आयेंगे और जायेंगे, और लोग भी. लेकिन हिंदुस्तान हमेशा रहेगा. तो फिर यह सबके लिए है, जो हिंदुस्तान के चालीस करोड़ लोग हैं, जो आजादी के हिस्सेदार हैं, वारिस हैं, उनको पूरा लाभ मिले, तब आजादी पूरी होगी. ‘हिंदुस्तानमाता’ की बात करें, तो उन्होंने आजादी से पहले 1920 में ही कह दिया था कि हम सब देशवासी हिंदुस्तानमाता का एक-एक टुकड़ा हैं और हमसे मिलकर ही हिंदुस्तानमाता बनी है. जब भी हम हिंदुस्तानमाता की जय बोलते हैं, तो वास्तव में अपनी ही जय बोल रहे होते हैं. जिस दिन हमारी गरीबी दूर हो जायेगी, हमारे तन पर कपड़ा होगा, बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा मिलेगी, हम सब खुशहाल होंगे, उसी दिन हिंदुस्तानमाता की सच्ची जय होगी. यदि हम ही, जो अंग्रेजी राज में जुल्म गरीबी व भुखमरी का सामना करते हुए अपनी आजादी के लिए लड़ रहे हैं, नहीं होंगे तो इस धरती को हिंदुस्तानमाता कौन कहेगा? दिल्ली में नौ अप्रैल, 1950 को इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस के स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि जब लोग भूखे हों और मर रहे हों, तो किसी भी दूसरे विषय पर बात करने से पहले सामान्य मनुष्यों के जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करना सबसे जरूरी है. आज का मनुष्य कष्टों, भुखमरी और असमानता को बर्दाश्त करने की मनःस्थिति में नहीं है. विशेषकर जब दिख रहा है कि बोझ बराबर नहीं उठाया जा रहा. कुछ थोड़े से लोग मुनाफा कमाते हैं और बाकी बहुत से लोग केवल बोझ उठाते हैं The post पुण्यतिथि पर विशेष-आधुनिक हिंदुस्तान के निर्माता थे जवाहरलाल नेहरू appeared first on Naya Vichar.