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August 9, 2026

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गंभीर हालत की अटकलों के बीच सामने आए मोजतबा खामेनेई, ईरानी एजेंसी ने जारी किया 13 सेकेंड का VIDEO

ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की सेहत को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं. बीते दिन इजरायली मीडिया में उनकी हालत गंभीर होने और अस्पताल में भर्ती होने के दावे सामने आने के बाद ईरान की अर्ध-प्रशासनी मेहर न्यूज एजेंसी ने उनका एक वीडियो जारी किया है. वीडियो में मोजतबा खामेनेई स्वस्थ दिखाई दे रहे हैं, हालांकि यह वीडियो कब रिकॉर्ड किया गया था, इसकी तारीख साफ नहीं की गई है. इजरायली मीडिया ने किया गंभीर हालत का दावा इजरायली मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि मोजतबा खामेनेई की हालत बेहद गंभीर है. चैनल 14 और द जेरूसलम पोस्ट ने अलग-अलग सूत्रों के हवाले से कहा कि ईरानी नेतृत्व के भीतर भी उनकी सेहत को लेकर चिंता है. हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और ईरानी पक्ष ने भी ऐसी समाचारों को आधिकारिक तौर पर सही नहीं बताया है. इसे भी पढ़ेंः इ/जराइली मीडिया का दावा: ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की हालत नाजुक, अस्पताल में हुए भर्ती मेहर न्यूज ने जारी किया वीडियो इन समाचारों के बीच मेहर न्यूज एजेंसी की ओर से मोजतबा खामेनेई का एक अप्रकाशित वीडियो सामने आया है. वीडियो में वह सामान्य और स्वस्थ दिखाई दे रहे हैं. माना जा रहा है कि इसे उनकी सेहत और ठिकाने को लेकर चल रही अटकलों का जवाब देने के लिए जारी किया गया है. हालांकि वीडियो की रिकॉर्डिंग की तारीख नहीं बताई गई है, इसलिए इससे उनकी मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति की निश्चित पुष्टि नहीं होती है. सार्वजनिक रूप से नहीं आए सामने रिपोर्टों के मुताबिक, अपने पिता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई ने सर्वोच्च नेता की जिम्मेदारी संभाली थी. इसके बाद से उनकी सार्वजनिक मौजूदगी बेहद कम रही है और वह मुख्य रूप से लिखित संदेशों के जरिए ही संवाद करते रहे हैं. कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि पहले हुए हमलों में वह घायल हुए थे. ईरानी अधिकारियों ने इन चोटों को लेकर अलग-अलग समय पर अलग जानकारी दी है. राष्ट्रपति ने भी संपर्क मुश्किल बताया ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के एक बयान का हवाला देते हुए रिपोर्टों में कहा गया कि मोजतबा खामेनेई से सीधा संपर्क करना फिलहाल मुश्किल है. इसी वजह से उनके स्वास्थ्य और ठिकाने को लेकर सवाल और बढ़े हैं. ईरानी अधिकारियों का कहना है कि खामेनेई देश के रणनीतिक और प्रशासनिक मामलों पर नजर बनाए हुए हैं. फिलहाल उनकी वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं. Also Read: रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर लागू होगा अमेरिका का नया कानून, समझिए हिंदुस्तान के लिए क्यों है चिंता का सबब? The post गंभीर हालत की अटकलों के बीच सामने आए मोजतबा खामेनेई, ईरानी एजेंसी ने जारी किया 13 सेकेंड का VIDEO appeared first on Naya Vichar.

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JPSC-JSSC विवाद में छात्रों के समर्थन में निर्जला अनशन पर बैठे जयराम महतो, सरकार को दी चेतावनी

Jairam Mahato : रांची में JPSC-JSSC नियुक्ति विवाद को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं. इसी बीच डुमरी विधायक और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के नेता जयराम महतो छात्रों के समर्थन में आज, 9 अगस्त को एक दिवसीय निर्जला अनशन कर रहे हैं. जयराम महतो सुबह 6 बजे पुराने विधानसभा परिसर में अनशन पर बैठ रहे हैं. उनका यह अनशन जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में पिछले 15 दिनों से जारी छात्र आंदोलन और भूख हड़ताल के समर्थन में हो रहा है. जयराम महतो ने प्रशासन को दी चेतावनी जयराम महतो ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट कर लिखा है कि जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में चल रहे छात्र आंदोलन समर्थन में पुराना विधानसभा परिसर में आज सुबह 6:50 बजे से एक दिवसीय 24 घंटे का निर्जला उपवास शुरू कर चूका हूं. विगत 25 जुलाई से छात्र आंदोलनरत हैं. भूख हड़ताल से छात्रों की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही है और प्रशासन इसे बहुत गंभीरता से नहीं ले रही है. पूरे विश्व के कानों में ये आवाज पहुंच रही है लेकिन शायद राज्य प्रशासन के कानों तक नहीं पहुंच रही है. इस उपवास का उद्देश्य छात्रों की आवाज को राजा तक पहुंचाना है. अगर कारगर हुआ तो अच्छी बात है अन्यथा मेरे आंदोलन की नई रुपरेखा तय की जाएगी, संघर्ष जारी रहेगा. टीडीपीएल (TDPL) द्वारा लिए गए JPSC/JSSC के सभी नियुक्ति परीक्षाओं को रद्द करो. दोषियों को गिरफ्तार करो, CBI/ED से जांच करवाओ. साथ ही JPSC और JSSC के सभी पदाधिकारियों के घोटाले में संलिप्तता की भी निष्पक्ष जांच हो. ये भी पढ़ें: एनएसयूआई से मंत्रियों की वार्ता, 14वीं जेपीएससी परीक्षा रद्द करने और 90 दिनों में जांच पूरी करने की मांग View on Instagram The post JPSC-JSSC विवाद में छात्रों के समर्थन में निर्जला अनशन पर बैठे जयराम महतो, प्रशासन को दी चेतावनी appeared first on Naya Vichar.

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झारखंड की आदिवासी संस्कृति को खास बनाती हैं ये 5 अनोखी बातें, हर किसी को होनी चाहिए इनकी जानकारी

World Tribal Day: हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस यानी कि वर्ल्ड ट्राइबल डे के रूप में मनाया जाता है. इस दिन को खास तौर पर आदिवासी समाज की अनोखी जिंदगी, उनकी बिल्कुल ही अलग पहचान और जंगलों को बचाने के लिए उनके द्वारा किए गए कामों को सलाम करने के लिए चुना गया है. जब भी देश में आदिवासी समाज की पुरानी और सुंदर परंपराओं की बात होती है, तो हमारे दिमाग में झारखंड का नाम आता ही है. झारखंड की आदिवासी संस्कृति आज की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है. लेकिन यह आज भी ठीक वैसे ही फ्रेश और उसी तरह वाइब्रेंट बनी हुई है. यहां के लोगों की अगर बात करें, तो ये हमें कुदरत के साथ दोस्ती बनाकर और खुश रहकर जिंदगी कैसे जी जाती है, यह बहुत ही अलग तरीके से सिखा सकते हैं. आज इस आर्टिकल में हम आपको झारखंड की आदिवासी संस्कृति की 5 ऐसी खास बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो हर एक इंसान को जरूर मालूम होनी चाहिए. तो चलिए इनके बारे में विस्तार से जानते हैं. world tribal day connection to nature रिश्तों और जानवरों को समर्पित यहां के अनोखे त्यौहार झारखंड में मनाए जाने वाले त्यौहार सिर्फ पूजा करने तक सीमित नहीं होते हैं. इन त्योहारों में अपनों के प्रति प्यार भी छिपा हुआ होता है. उदाहरण के लिए, करम त्यौहार में बहनें अपने भाइयों की अच्छी सेहत और कामयाबी के लिए उपवास रखकर प्रार्थना करती हैं. वहीं, सोहराय त्यौहार में घर के गाय, बैल और दूसरे मवेशियों को नहलाकर सजाया और तैयार किया जाता है. इस दिन उनकी सेवा भी की जाती है. ऐसा करने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि यही जानवर खेती-बाड़ी के कामों में इंसानों का साथ देते हैं. world tribal day equality ढोल-मांदर की धुन और मजेदार डांस झारखंड के लोगों की जिंदगी डांस और संगीत के बिना अधूरी सी है. यहां गांव के बीच में एक खाली सी जगह छोड़ी जाती है, जिसे अखड़ा कहा जाता है. इसी जगह पर शाम के समय लोग ढोल, मांदर और बांसुरी बजाते हैं. यहां मौजूद सभी लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक गोल घेरा बना लेते हैं और उसी में डांस करते हैं. झूमर, छऊ और पाइका यहां के बहुत ही फेमस डांस हैं. अक्सर इन गानों और नृत्यों में कोई न कोई पुरानी कहानी या जीवन का गहरा संदेश छिपा होता है. world tribal day art and cuisine ये भी पढ़ें: हर झारखंडी को मॉनसून में एक बार जरूर घूम आनी चाहिए ये 7 खूबसूरत जगहें, नजारे ऐसे कि हर साल जाने का करेगा मन The post झारखंड की आदिवासी संस्कृति को खास बनाती हैं ये 5 अनोखी बातें, हर किसी को होनी चाहिए इनकी जानकारी appeared first on Naya Vichar.

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भारत के सबसे सफल टेस्ट गेंदबाज अनिल कुंबले ने आज ही के दिन किया था डेब्यू, पहले ही टेस्ट में लगाना चाहते थे शतक

Anil Kumble Test Debut: 9 अगस्त का दिन हिंदुस्तानीय क्रिकेट के इतिहास में एक खास वजह से याद किया जाता है. आज ही के दिन 36 साल पहले हिंदुस्तान के महान स्पिनर और पूर्व कप्तान अनिल कुंबले ने इंटरनेशनल क्रिकेट में कदम रखा था. 9 अगस्त 1990 को मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ कुंबले ने अपना पहला टेस्ट मैच स्पोर्ट्सा था. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह युवा लेग स्पिनर आगे चलकर हिंदुस्तान का सबसे सफल टेस्ट गेंदबाज बनेगा. दिलचस्प बात यह है कि कुंबले ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वे अपने पहले ही टेस्ट में शतक लगाना चाहते थे. 10 विकेट लेकर बनाया रिकॉर्ड खिलाड़ी अवधि (Span) मैच (Mat) पारी (Inns) गेंदें (Balls) ओवर (Overs) मेडन (Mdns) रन (Runs) विकेट (Wkts) सर्वश्रेष्ठ (BBI) औसत (Ave) इकोनॉमी (Econ) स्ट्राइक रेट (SR) 4 विकेट 5 विकेट 10 विकेट अनिल कुंबले 1990-2008 132 236 40850 6808.2 1576 18355 619 10/74 29.65 2.69 65.99 31 35 8 अनिल कुंबले का नाम सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि टेस्ट क्रिकेट के महान गेंदबाजों में लिया जाता है. 132 टेस्ट मैचों में उन्होंने 619 विकेट लिए. वह टेस्ट क्रिकेट में हिंदुस्तान के सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं. वनडे में भी कुंबले के नाम 271 मैचों में 337 विकेट दर्ज हैं. 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ दिल्ली टेस्ट में कुंबले ने एक पारी में सभी 10 विकेट लेकर इतिहास रच दिया था. वह टेस्ट क्रिकेट में एक पारी में 10 विकेट लेने वाले सिर्फ दूसरे गेंदबाज बने थे. पहले टेस्ट से था शतक का सपना कुंबले की कहानी का एक और दिलचस्प पहलू उनकी बल्लेबाजी से जुड़ा है. गेंद से दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों को परेशान करने वाले कुंबले के मन में खुद भी बल्ले से बड़ी पारी स्पोर्ट्सने की इच्छा थी. वह पहले टेस्ट मैच से ही शतक लगाने की कोशिश करते रहे. हालांकि, उनका यह सपना पूरा होने में 117 टेस्ट मैच लग गए. 117वें मैच में ठोका शतक इंग्लैंड के खिलाफ अपने 117वें टेस्ट में कुंबले ने करियर का इकलौता टेस्ट शतक लगाया. इस पारी को याद करते हुए उन्होंने बताया था कि वह लगातार गेंदबाजों को पढ़ने और उनके खिलाफ सही अनुमान लगाने की कोशिश करते थे. आखिरकार 117वें टेस्ट में उनका अनुमान सही साबित हुआ.कुंबले के मुताबिक, उनके शतक से ज्यादा उनके साथी खिलाड़ी खुश थे. उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया कि वीवीएस लक्ष्मण उनके शतक का जश्न मनाते हुए गिर तक गए थे. Also Read: श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट में सबसे ज्यादा रन और विकेट लेने वाले हिंदुस्तान के ‘टॉप-3’ दिग्गज, देखें लिस्ट में कौन-कौन है शामिल फैंस के साथ शेयर किया था भावुक पोस्ट View on Instagram कुंबले ने पिछले साल अपने डेब्यू की 35वीं सालगिरह को याद करते हुए सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट शेयर किया था. उन्होंने बताया कि उनके पहले टेस्ट ने उन्हें ऐसी सीख दी, जिसे उन्होंने पूरे करियर में अपने साथ रखा. पहली पारी में 47 ओवर गेंदबाजी करते हुए उन्होंने 105 रन देकर तीन विकेट लिए, जबकि दूसरी पारी में 13 ओवर में उन्हें कोई विकेट नहीं मिला. यह वह शुरुआत नहीं थी, जिसकी कोई युवा खिलाड़ी उम्मीद करता है, लेकिन यही अनुभव आगे चलकर उनके लिए बड़ी सीख बना. एक्सपर्ट और कॉमेंटेटर के रूप में सक्रिय रिटायरमेंट के बाद भी पूर्व हिंदुस्तानीय कप्तान अनिल कुंबले खाली नहीं बैठे है. वर्तमान में वे स्टार स्पोर्ट्स और जियोसिनेमा जैसे प्रमुख मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एक क्रिकेट एक्सपर्ट और कॉमेंटेटर के रूप में सक्रिय हैं. इसके साथ ही, वह कर्नाटक वन विभाग के वन्यजीव संरक्षण ब्रांड एंबेसडर के तौर पर पर्यावरण जागरूकता बढ़ा रहे हैं. वे 2019 से लेकर 2022 तक आईपीएल टीम पंजाब किंग्स के हेड कोच भी रह चुके है. सुत्रों के अनुसार अभी उनकी आईपीएल टीम दिल्ली कैपिटल्स के बॉलिंग कोच बनने को लेकर भी सकारात्मक बातचीत चल रही है. इसके अलावा, वह अपनी स्पोर्ट्स प्रबंधन कंपनी ‘Tenvic’ भी संभालते हैं. Also Read: श्रीलंका दौरे पर टीम इंडिया की मुश्किलें बढ़ीं, साई सुदर्शन हुए टेस्ट सीरीज से बाहर The post हिंदुस्तान के सबसे सफल टेस्ट गेंदबाज अनिल कुंबले ने आज ही के दिन किया था डेब्यू, पहले ही टेस्ट में लगाना चाहते थे शतक appeared first on Naya Vichar.

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RJD की 20 साल की सियासी कहानी: 2005 की हार से 2020 की वापसी और 2025 के झटके तक, कहां चूकी पार्टी?

RJD Political Journey: बिहार की नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का इतिहास केवल चुनावी जीत-हार का इतिहास नहीं है. यह सामाजिक न्याय की नेतृत्व, मंडल के बाद बदले सामाजिक समीकरण, सुशासन और विकास की मांग, गठबंधन की नेतृत्व और नेतृत्व परिवर्तन की कहानी भी है. 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने जिस नेतृत्वक आधार को तैयार किया, उसने लंबे समय तक बिहार की सत्ता को प्रभावित किया. लेकिन 2005 के बाद परिस्थितियां बदलने लगीं. यह कहना सही नहीं होगा कि 2005 के बाद RJD लगातार कमजोर ही होती गई. पार्टी को 2010 में बड़ा झटका लगा, 2015 में उसने शानदार वापसी की और 2020 में विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी. इसके बावजूद वह सत्ता से दूर रही और 2025 के विधानसभा चुनाव में उसकी सीटों में फिर बड़ी गिरावट आई. ऐसे में सवाल है कि RJD की कमजोरी की वजह क्या रही? लालू यादव की नेतृत्व में कहां सीमाएं दिखाई दीं? तेजस्वी यादव ने पार्टी को कितना बदला और BJP-JDU ने RJD की चुनौती का मुकाबला किस तरह किया? बिहार विधानसभा चुनाव 2010 में लालू यादव की पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा 2010: RJD को सबसे बड़ा चुनावी झटका 2010 का विधानसभा चुनाव RJD के लिए बेहद खराब रहा. पार्टी केवल 22 सीटों पर सिमट गई. दूसरी ओर JDU और BJP गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की. इस चुनाव ने बता दिया कि बिहार की नेतृत्व में RJD का पुराना चुनावी मॉडल अब मुकाबला जीतने के लिए पर्याप्त नहीं रह गया है. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली प्रशासन ने सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को नेतृत्वक उपलब्धि के रूप में पेश किया. BJP ने भी संगठन और अपने पारंपरिक सामाजिक आधार के साथ गठबंधन को मजबूती दी. RJD के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या केवल चुनावी हार नहीं थी. पार्टी के पास लालू यादव की लोकप्रियता तो थी, लेकिन उनके बाद के नेतृत्व और संगठनात्मक विस्तार का सवाल भी सामने आने लगा था. 2015: RJD की वापसी 2015 में बिहार की नेतृत्व ने फिर करवट ली. BJP से अलग होने के बाद नीतीश कुमार ने RJD और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाया. लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, जो लंबे समय तक एक-दूसरे के नेतृत्वक प्रतिद्वंद्वी रहे थे, इस बार एक मंच पर थे. इस गठबंधन ने BJP के सामने एक बड़ा सामाजिक और नेतृत्वक गठजोड़ खड़ा कर दिया. नतीजे RJD के पक्ष में रहे. पार्टी 80 सीटों के साथ विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी. JDU को 71 और कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं. यह RJD की बड़ी वापसी थी. लेकिन इस चुनाव की एक दिलचस्प बात यह रही कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद RJD के पास नहीं गया. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री. 2015 के परिणाम ने यह भी बताया कि बिहार में गठबंधन सामाजिक समीकरणों को किस तरह बदल सकता है. चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव तेजस्वी यादव का उभार 2015 के बाद तेजस्वी यादव को RJD के भविष्य के चेहरे के रूप में देखा जाने लगा. उनके सामने दोहरी चुनौती थी. पहली, लालू यादव के मजबूत सामाजिक आधार को बनाए रखना. दूसरी, नई पीढ़ी का विश्वास जीतना और नया आधार बनाना. तेजस्वी ने धीरे-धीरे रोजगार, शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों को अपनी नेतृत्व के केंद्र में रखा. यह बदलाव महत्वपूर्ण था क्योंकि RJD पर लंबे समय से जातीय नेतृत्व पर अधिक निर्भर रहने का आरोप लगता रहा था. तेजस्वी की नेतृत्व ने पार्टी को एक नया चेहरा जरूर दिया, लेकिन पुरानी छवि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. यही उनकी नेतृत्वक चुनौती बनी रही. 2017: महागठबंधन का टूटना 2017 में बिहार की नेतृत्व फिर बदल गई. नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर BJP के साथ प्रशासन बना ली. इसके बाद RJD विपक्ष में चली गई और तेजस्वी यादव को विपक्ष के नेता के रूप में अपनी नेतृत्वक पहचान बनाने का अवसर मिला. यहीं से तेजस्वी की नेतृत्व का नया दौर शुरू हुआ. उन्होंने प्रशासन पर बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास को लेकर सवाल उठाने शुरू किए. धीरे-धीरे वह RJD के प्रमुख चुनावी चेहरे के रूप में स्थापित हुए. 2020: तेजस्वी ने RJD को फिर सबसे बड़ी पार्टी बनाया 2020 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के लिए महत्वपूर्ण रहा. 75 सीटें जीतकर राजद विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी. इस चुनाव में रोजगार बड़ा मुद्दा बना. तेजस्वी ने प्रशासनी नौकरियों और बेरोजगारी के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया. युवा मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ बढ़ी. लेकिन NDA ने भी प्रभावी रणनीति अपनाई. BJP का संगठन, नरेंद्र मोदी की मास अपील, नीतीश कुमार की प्रशासन की योजनाएं और सामाजिक गठबंधन NDA के पक्ष में रहे. नतीजा यह हुआ कि RJD सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद प्रशासन नहीं बना सकी. यह RJD के लिए बड़ा सबक था. प्रशासन बनाने के लिए सिर्फ मजबूत कोर वोट बैंक पर्याप्त नहीं है. उसे अतिरिक्त सामाजिक समूहों में भी समर्थन बढ़ाना होगा. BJP और JDU ने RJD को कैसे चुनौती दी? RJD के सामने BJP और JDU की रणनीति अलग-अलग लेकिन कई मामलों में एक-दूसरे की पूरक रही. JDU ने अत्यंत पिछड़े वर्गों, स्त्रीओं और गैर-यादव पिछड़े समूहों में अपना आधार बनाया. नीतीश कुमार ने विकास और सुशासन को अपनी नेतृत्वक पहचान से जोड़ा. BJP ने अपने मजबूत संगठन और राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ सामाजिक विस्तार किया. समय के साथ BJP ने पिछड़े, अति पिछड़े और दलित समुदायों में भी अपनी पहुंच बढ़ाई. दोनों दलों ने RJD के सामने एक ऐसा गठबंधन खड़ा किया जिसमें सामाजिक समीकरण के साथ विकास, कल्याणकारी योजनाएं, स्त्री मतदाता और राष्ट्रीय नेतृत्व जैसे मुद्दे शामिल थे. यही RJD के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी. 2025 ने फिर उठाए गंभीर सवाल 2025 के विधानसभा चुनाव ने RJD की रणनीति पर फिर सवाल खड़े किए. पार्टी को करीब 23 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन उसकी सीटों की संख्या 25 रह गई. यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है. इसका मतलब है कि RJD का मूल मतदाता आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. कई सीटों पर पार्टी मजबूत रही, लेकिन जीत के लिए जरूरी अतिरिक्त सामाजिक समर्थन हासिल नहीं कर सकी. दूसरी ओर NDA ने अपने वोट को सीटों में ज्यादा प्रभावी

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25 साल में कितनी बदली Bajaj Pulsar, साल 2001 की 150cc से N160 4V तक जानें आइकॉनिक ब्रांड का इतिहास?

हिंदुस्तानीय सड़कों पर जब भी किसी दमदार और स्पोर्टी बाइक की बात होती है, तो पल्सर की आवाज सबसे पहले सुनाई देती है. डेफिनेटली मेल के पॉपुलर मैसेज के साथ आई इस बाइक ने देश के युवाओं को रफ्तार और स्टाइल का असली मतलब सिखाया. हाल ही में बजाज ने अपनी नई पल्सर N160 4V को बाजार में उतारा है, जो अपने मॉडर्न लुक्स और बेहतरीन परफॉर्मेंस की वजह से चर्चा में है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि साल 2001 में शुरू हुआ पल्सर का यह सफर आज 2026 तक कैसे आगे बढ़ा? आइए जानते हैं पिछले 25 सालों में पल्सर के इतिहास, इसके प्रमुख मॉडल्स और समय के साथ आए बड़े बदलावों के बारे में. नई पल्सर N160 4V में क्या नया है? बजाज ने पल्सर N160 को अब 4-वॉल्व (4V) इंजन के साथ पेश किया है. 4-वॉल्व तकनीक की वजह से बाइक का इंजन बेहतर तरीके से सांस ले पाता है, जिससे तेज रफ्तार पर भी बाइक बहुत स्मूथ चलती है और पिकअप में सुधार होता है. इस नए मॉडल में कई आधुनिक फीचर्स USD फ्रंट सस्पेंशन: बेहतर हैंडलिंग और स्पोर्टी लुक के लिए. डुअल चैनल ABS: राइडर की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए. डिजिटल कंसोल: बाइक की पूरी जानकारी आसानी से देखने के लिए. यह बाइक उन लोगों के लिए बेहतरीन विकल्प है जो रोजाना के इस्तेमाल के साथ-साथ थोड़ा थ्रिल भी चाहते हैं. 2001 में जब पहली बार सामने आई मस्कुलर पल्सर 2001 से पहले हिंदुस्तान में ज्यादातर लोग 100cc की साधारण माइलेज वाली बाइक ही चलाते थे. तब बजाज ने पल्सर 150 और पल्सर 180 को पेश करके पूरे मार्केट का माहौल बदल दिया. बड़ी टंकी, गोल हेडलाइट और दमदार पावर के साथ आई इस बाइक ने हिंदुस्तानीय टू-व्हीलर मार्केट में पहली बार असली ‘स्पोर्ट्स राइडिंग’ की शुरुआत की.  2003 से 2009: पावर और तकनीक का नया मेल शुरुआती सफलता के बाद कंपनी ने पल्सर को लगातार अपडेट करना जारी रखा. DTS-i इंजन (2003): बजाज ने अपनी जुड़वा स्पार्क वाली DTS-i तकनीक पेश की, जिससे बाइक का माइलेज और इंजन की ताकत दोनों बढ़ गए. डिजिटल मीटर और LED लाइट्स (2006): इस दौरान पल्सर में डिजिटल स्पीडोमीटर और तीखी LED टेललाइट्स दी गईं, जो युवाओं को बहुत पसंद आईं. पल्सर 220F की एंट्री (2007): अपनी आधी फेयरिंग वाली डिजाइन और तेज रफ्तार के कारण इसे उस समय हिंदुस्तान की सबसे तेज बाइक माना गया. ये भी पढ़ें: Bajaj Pulsar N160 S और N160 SS हिंदुस्तान में लॉन्च, पहले से ज्यादा पावर और स्मार्ट फीचर्स से लैस 2012 में NS200 और नई पीढ़ी की एंट्री साल 2012 में बजाज ने पल्सर की पूरी डिजाइन को एक नया मोड़ दिया. केटीएम (KTM) के सहयोग से पल्सर NS200 (नेकेड स्पोर्ट्स) बाजार में आई. इसमें लिक्विड कूलिंग और ट्रिपल स्पार्क जैसी नई तकनीक का इस्तेमाल हुआ. इसके बाद बजाज ने फुल फेयरिंग वाली RS200 और लंबी दूरी के सफर के लिए AS (एडवेंचर स्पोर्ट्स) सीरीज भी पेश की. 2020 से 2026: N सीरीज, BS6 और 4V तकनीक BS6 इंजन अपडेट: प्रदूषण के नियमों का पालन करते हुए सभी इंजनों को ज्यादा साफ और रिफाइंड बनाया गया. N और F सीरीज: बजाज ने पल्सर N250, F250 और N160 जैसे नए चेसिस वाले मॉडल्स उतारे, जिनकी रोड ग्रिप और राइड क्वालिटी काफी बेहतर है. 4V इंजन तकनीक: अब 160cc और 200cc की रेंज को 4-वॉल्व इंजन से लैस किया जा रहा है, ताकि बाइक ज्यादा रिफाइंड और पावरफुल बने. ये भी पढ़ें: Bajaj Pulsar N160 4V vs TVS Apache RTR 160 4V: दोनों में से कौन-सी बाइक है ज्यादा दमदार? देखें कंपैरिजन 2001 से 2026 तक पल्सर के मुख्य मॉडल्स पल्सर 135 LS पल्सर 150 (ब्रांड की सबसे ज्यादा बिकने वाली बाइक) पल्सर 180 और 200 पल्सर 220F पल्सर NS125, NS160 और NS200 पल्सर RS200 पल्सर N150, N160, N250 और F250 नई पल्सर N160 4V कंपनी ने हर कुछ सालों में नए ग्राफिक्स, बेहतर सस्पेंशन, ब्लूटूथ कनेक्टिविटी और डिस्क ब्रेक देकर पल्सर को हमेशा समय से आगे रखा. पल्सर की सफलता का असली राज क्या है? पल्सर की सबसे बड़ी खूबी रही है – सस्ती कीमत में बेहतरीन स्टाइल और पावर. बजाज ने हमेशा आम हिंदुस्तानीय बाइक प्रेमी की जरूरत को समझा और महंगे फीचर्स को बजट रेंज में उपलब्ध कराया. यही वजह है कि 2001 से लेकर आज 2026 तक, पल्सर युवाओं के दिलों पर राज कर रही है. The post 25 साल में कितनी बदली Bajaj Pulsar, साल 2001 की 150cc से N160 4V तक जानें आइकॉनिक ब्रांड का इतिहास? appeared first on Naya Vichar.

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9 अगस्त की टॉप 20 खबरें: सुप्रीम कोर्ट में JPSC परीक्षा में धांधली पर याचिका, भारत पर 100% US टैरिफ का खतरा

1. JPSC Controversy: सुप्रीम कोर्ट में 14वीं JPSC परीक्षा में धांधली पर याचिका दायर, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा 2025 में कथित धांधली का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. अभ्यर्थियों ने परीक्षा रद्द कर निष्पक्ष जांच की मांग की है. याचिका में रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में समिति बनाने और ओएमआर स्कैनिंग का ऑडिट कराने का अनुरोध किया गया है. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 2. JPSC-JSSC Protest: झारखंड के छात्र आंदोलन में CJP ने मारी एंट्री, रांची पहुंची अभिजीत दीपके की टीम रांची में JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन को बड़ा समर्थन मिला है. सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के प्रतिनिधिमंडल ने आंदोलनकारियों से मुलाकात कर एकजुटता जताई है. CJP ने छात्रों की मांगों को पूरा होने तक साथ देने का भरोसा दिलाया है. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 3. परिसीमन: क्या दो धड़ों में बंट गया तमिलनाडु? CM विजय की बैठक का DMK-AIADMK ने किया बायकॉट केंद्र प्रशासन के प्रस्तावित परिसीमन के मुद्दे पर तमिलनाडु की नेतृत्व दो पार्ट में बंटती नजर आ रही है. मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय द्वारा बुलाई गई सांसदों की बैठक से द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIDMK) समेत राज्य के 37 सांसदों ने दूरी बना ली. DMK और AIDMK ने बैठक को ढोंग, नाटक और हंसी-मजाक वाली कवायद करार दिया. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 4. FCRA सर्टिफिकेट सीज हुआ तो स्कूल-अस्पतालों का क्या होगा? Section 14B, 16A और 16B को लेकर क्या है विवाद FCRA Amendment Bill में Section 14B, 16A और 16B को लेकर विवाद तेज है. सवाल यह है कि FCRA registration खत्म होने पर विदेशी फंड से बनाए गए स्कूल, अस्पताल और दूसरी संपत्तियों का क्या होगा और उन पर किसका नियंत्रण रहेगा. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 5. रील के चक्कर में भविष्य न गंवा देना! प्रयागराज में राहुल गांधी बोले- सोशल मीडिया के नशे में युवाओं को उलझाया जा रहा राहुल गांधी ने प्रयागराज में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में युवाओं से संवाद किया. उन्होंने शिक्षा, बेरोजगारी, और डेटा की ताकत जैसे मुद्दों पर जोर दिया. केंद्र प्रशासन की नीतियों पर भी निशाना साधा. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 6. शिरोमणि अकाली दल ने स्त्री आरक्षण और परिसीमन बिल का किया समर्थन, तुरंत लागू करने की मांग की शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने चंडीगढ़ में अपने वरिष्ठ नेताओं के साथ एक हाई लेवल बैठक की. जिसमें केंद्र प्रशासन से देश में स्त्री आरक्षण विधेयक को बिना किसी देरी के तुरंत लागू करने की मांग की. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 7. ‘जो कुर्सी कल जानी है, वह आज ही चली जाए…’ CM योगी के इस बयान के बाद UP में मची सियासी हलचल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. इसमें वे कहते सुनाई दे रहे हैं, ‘जो कुर्सी कल जानी है, वह आज चली जाए, मुझे इसकी चिंता नहीं है.’ उन्होंने विकास के लिए विजन और समय की आवश्यकता पर जोर दिया. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 8. क्या पंजाब में मिलेगा बिग रोल? PM मोदी से मिलकर बोले राघव चड्ढा- ये सुबह हमेशा याद रहेगी राघव चड्ढा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद उनका समय देने के लिए आभार जताया. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री से हुई बातचीत के दौरान उन्हें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिली. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 9. रूस से तेल-गैस खरीदा तो 100% तक टैरिफ, हिंदुस्तान समेत 5 देशों पर खतरा, अमेरिकी सीनेट से बिल पास रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ाने की दिशा में अमेरिका ने कदम उठाया है. अमेरिकी सीनेट ने प्रतिबंध विधेयक को मंजूरी दे दी, जिससे हिंदुस्तान, चीन समेत पांच देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाया जा सकता है. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 10. अमेरिका-इजराइल की घेराबंदी पर भड़के ईरानी राष्ट्रपति, बोले- खाड़ी मुल्कों को उकसाया जा रहा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका और इजराइल पर खाड़ी देशों को ईरान के खिलाफ भड़काने का आरोप लगाया है. उन्होंने मिडिल ईस्ट में सैन्य संघर्ष और ईरान की आंतरिक चुनौतियों का फायदा उठाने की बात कही. पेजेशकियन ने मुस्लिम एकता पर भी जोर दिया. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 11. महुआ मोईत्रा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से भड़के अभिजीत दीपके, पूछा- क्या सब सीने पर गोली खायें? महुआ मोईत्रा की याचिका पर सुनवाई के दौरान ‘अंडे से डर’ वाली सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी पर CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. दीपके ने पूछा- क्या सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि सब गोलियां खायें? पूरी समाचार यहां पढ़ें. 12. वीडियो कॉल पर पति का अफेयर देख कटिहार की स्त्री ने तोड़ा फोन, ससुराल वालों ने खंभे से बांधकर जिंदा जलाया मालदा के मानिकचक में पति का फोन तोड़ने पर स्त्री को खंभे से बांधकर जिंदा जलाया. बर्न यूनिट में इलाज के दौरान मौत. पति, सास समेत 4 आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 13. निशांत कुमार की नजर बिहार के युवाओं पर, Gen Z को जोड़ने की तैयारी, यात्रा पर निकलेंगे जदयू अब बिहार के Gen Z युवाओं को अपने साथ जोड़ने की तैयारी में है. नीतीश कुमार के बेटे और स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार की सक्रियता बढ़ रही है. मानसून के बाद उनकी बिहार यात्रा फिर शुरू होने की बात सामने आई है. युवाओं से संवाद और बूथ स्तर तक पहुंच उनका अगला बड़ा फोकस हो सकता है. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 14. 11 अगस्त के बाद क्या करेंगे प्रशांत किशोर? बांकीपुर उपचुनाव में BJP क्यों हारी और RJD के लिए कैसे बढ़ा खतरा Prashant Kishor: जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने 64,151 वोट लाकर बांकीपुर विधानसभा सीट जीत लिया. बीजेपी के नीरज कुमार को 44,827 वोट मिले जबकि आरजेडी कैंडिडेट की जमानत जब्त हो गई. राजद की रेखा गुप्ता मात्र 14,273 वोटों में ही सिमट गईं. प्रशांत किशोर की इस जीत के बाद कई तरह के मुद्दों पर चर्चा तेज है. खासकर अब यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आगे प्रशांत किशोर की स्ट्रैटेजी क्या होगी. पूरी समाचार यहां पढ़ें. 15. होर्मुज स्ट्रेट: सुरक्षित शिपिंग रूट बनाने के लिए काम कर रहा अमेरिका, वैंस बोले- हमें ईरान पर भरोसा नहीं अमेरिका और

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Tribalpedia: दीवानी अधिकार से जंगलों तक, इलाहाबाद की संधि ने कैसे बदली आदिवासी दुनिया?

जोहार. आज 9 अगस्त है. विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं. 12 अगस्त 1765 की इलाहाबाद की संधि हिंदुस्तानीय इतिहास में केवल मुगल बादशाह और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ एक समझौता नहीं थी. इसे उस मोड़ के रूप में देखा जा सकता है, जब कंपनी एक व्यापारिक संस्था से आगे बढ़कर राजस्व और प्रशासनिक शक्ति हासिल करने लगी. इसका सबसे गहरा असर पूर्वी हिंदुस्तान- बंगाल, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा के बड़े हिस्सों, पर पड़ा और धीरे-धीरे इसका प्रभाव उन आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंचा, जो लंबे समय तक अपेक्षाकृत स्वायत्त रहे थे. शाह आलम द्वितीय से कंपनी तक पहुंची राजस्व की ताकत 1765 में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय और रॉबर्ट क्लाइव के बीच हुई इलाहाबाद की संधि के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा की दीवानी, यानी राजस्व वसूली का अधिकार मिला. यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण था. अब कंपनी के पास व्यापार से होने वाली आमदनी के अलावा एक विशाल भूभाग से नियमित राजस्व जुटाने का अधिकार था. यही राजस्व आगे कंपनी की सेना, प्रशासन और नए क्षेत्रों में विस्तार का आर्थिक आधार बना. यानी कंपनी ने पहले व्यापार से धन कमाया और फिर उसी धन से सत्ता का विस्तार किया. झारखंड का बड़ा हिस्सा उस समय अलग प्रशासनिक राज्य के रूप में मौजूद नहीं था. इसलिए आज के झारखंड के कई क्षेत्र बंगाल और बिहार की तत्कालीन प्रशासनिक संरचनाओं के भीतर आते थे. इसका अर्थ यह हुआ कि कंपनी की राजस्व और प्रशासनिक व्यवस्था धीरे-धीरे आदिवासी इलाकों तक पहुंचने लगी. Read more: Tribalpedia: आदिवासी कला डिजिटल हुई, लेकिन अधिकार किसका हुआ? Part 2 बंगाल से शुरू हुआ कंपनी राज, फिर बढ़ता गया दायरा पूर्वी हिंदुस्तान कंपनी के लिए केवल राजस्व का स्रोत नहीं था. यह आगे के औपनिवेशिक विस्तार का आधार भी बना. Regulating Act, 1773 के बाद बंगाल प्रेसिडेंसी की नेतृत्वक-प्रशासनिक स्थिति और मजबूत हुई. बंगाल अब कंपनी की शक्ति का प्रमुख केंद्र बन चुका था. इसके बाद सैन्य शक्ति और कूटनीति के जरिए कंपनी ने हिंदुस्तान के दूसरे हिस्सों में भी अपना प्रभाव बढ़ाया. चौथा एंग्लो-मैसूर युद्ध (1799) और दूसरा एंग्लो-मराठा युद्ध (1803-05) इसी विस्तारवादी दौर की महत्वपूर्ण घटनाएं थीं. लॉर्ड वेलेजली की नीति ने कंपनी की सर्वोच्चता स्थापित करने की प्रक्रिया को और तेज किया. इस विस्तार का असर केवल राजाओं और बड़ी रियासतों तक सीमित नहीं था. आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंची नई राजस्व व्यवस्था पूर्वी हिंदुस्तान के जंगल और पहाड़ी इलाके कंपनी के लिए एक अलग तरह की चुनौती थे. यहां आदिवासी समुदायों की सामाजिक व्यवस्था, भूमि उपयोग और संसाधनों पर अधिकार स्थानीय परंपराओं से संचालित होते थे. लेकिन कंपनी के लिए भूमि मुख्य रूप से राजस्व का स्रोत थी. यहीं से टकराव की जमीन तैयार हुई. Jungle Mahal इसका एक उदाहरण था. 1805 में इससे जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्था के जरिए कंपनी ने जंगल और सीमावर्ती क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की कोशिश की. बाद में संथाल क्षेत्र में Damin-e-Koh की प्रक्रिया सामने आई. यहां 1824 में सर्वे शुरू हुआ और 1832 में क्षेत्र की औपचारिक घोषणा की गई. इस प्रक्रिया में भूमि, आबादी और राजस्व प्रशासन को अधिक व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने की कोशिश हुई. लेकिन आदिवासी समाज के लिए जंगल और जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थे. वे जीवन, संस्कृति और सामुदायिक पहचान का आधार थे. जमीन से राजस्व तक और राजस्व से नियंत्रण तक कंपनी की व्यवस्था का मूल तर्क था- भूमि को मापो, अधिकार तय करो और राजस्व वसूलो. लेकिन आदिवासी इलाकों में जमीन का संबंध अक्सर सामुदायिक परंपराओं और स्थानीय अधिकारों से था. इसलिए जब बाहरी प्रशासन ने जमीन को कागज, सर्वे और राजस्व की इकाई में बदलना शुरू किया, तो पुराने सामाजिक संतुलन पर असर पड़ा. यही वह लंबी प्रक्रिया थी जिसने आगे चलकर आदिवासी असंतोष की कई परिस्थितियां पैदा कीं. बाद के प्रशासनिक दौर में विलियम बेंटिक जैसे गवर्नर-जनरल और अधिकारियों तथा सर्वेक्षण-प्रशासन से जुड़े लोगों ने इस व्यापक औपनिवेशिक व्यवस्था को आगे बढ़ाया. J.B. Bard और Tanner जैसे नाम भी इस प्रशासनिक-सर्वेक्षण संदर्भ में सामने आते हैं. इलाहाबाद की संधि का असली महत्व इलाहाबाद की संधि को इसलिए केवल 1765 की एक नेतृत्वक घटना मानना अधूरा होगा. इसने कंपनी को राजस्व दिया, राजस्व ने सेना को ताकत दी, सेना ने नए क्षेत्रों पर नियंत्रण बढ़ाया और प्रशासन ने उस नियंत्रण को स्थायी बनाने की कोशिश की. पूर्वी हिंदुस्तान में शुरू हुई यह प्रक्रिया धीरे-धीरे जंगलों और आदिवासी इलाकों तक पहुंची. इसलिए ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की कहानी केवल दिल्ली, कलकत्ता या बड़े राजाओं की कहानी नहीं है. यह उन जंगलों और गांवों की भी कहानी है, जहां पहली बार किसी बाहरी सत्ता ने जमीन को समुदाय की विरासत के बजाय राजस्व की इकाई के रूप में देखना शुरू किया. और यहीं से औपनिवेशिक सत्ता बनाम आदिवासी स्वायत्तता के बीच लंबे संघर्ष की नींव पड़ी. Read more: Jharkhand : क्या झारखंड बन सकता है हिंदुस्तान का ‘डिफेन्स मैन्युफैक्चरिंग’ हब? विश्लेषण The post Tribalpedia: दीवानी अधिकार से जंगलों तक, इलाहाबाद की संधि ने कैसे बदली आदिवासी दुनिया? appeared first on Naya Vichar.

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