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21 साल बाद भी लोगों की जुबान पर डालटनगंज

प्रशासनी कागजों में मेदिनीनगर, लेकिन आम बोलचाल में आज भी जीवित है डालटनगंज

चंद्रशेखर सिंह, मेदिनीनगर

वर्ष 2004 में पलामू प्रमंडलीय मुख्यालय का नाम डालटनगंज से बदलकर मेदिनीनगर किया गया था, लेकिन नाम बदले जाने के 21 वर्ष बाद भी आम लोगों की जुबान पर डालटनगंज ही कायम है. खासकर ग्रामीण इलाकों के लोग आज भी प्रमंडलीय मुख्यालय को डालटनगंज ही कहते हैं. प्रशासनी कागजों, बोर्डों और दफ्तरों में भले ही मेदिनीनगर नाम दर्ज हो, लेकिन जनमानस की स्मृति में डालटनगंज आज भी रचा-बसा है.

डालटनगंज नाम वर्ष 1861 में छोटानागपुर के तत्कालीन कमिश्नर कर्नल एडवर्ड टुइट डाल्टन के नाम पर रखा गया था. यह नाम लंबे समय तक प्रचलन में रहा. झारखंड प्रशासन ने वर्ष 2004 में पलामू के चेरो राजवंश के सबसे प्रतापी राजा मेदिनीराय के सम्मान में डालटनगंज का नाम बदलकर मेदिनीनगर कर दिया. इसके बाद से प्रशासनी स्तर पर इसे मेदिनीनगर के नाम से ही जाना जाने लगा.

हालांकि आज भी रेलवे स्टेशन का नाम डालटनगंज ही है. यही नहीं, दूर-दराज से आने वाले लोग और ग्रामीण क्षेत्र के निवासी मेदिनीनगर के बजाय डालटनगंज नाम का ही प्रयोग करते हैं. प्रशासनी व गैर-प्रशासनी कार्यालयों में मेदिनीनगर नाम का उपयोग अनिवार्य है, लेकिन आम बोलचाल में डालटनगंज की पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है.

134 वर्ष का हुआ पलामू जिला

पलामू जिले के अस्तित्व में आने के 134 वर्ष पूरे हो चुके हैं. ब्रिटिश शासनकाल में एक जनवरी 1892 को पलामू जिला अस्तित्व में आया था. उस समय पलामू न केवल बिहार, बल्कि अविभाजित बंगाल का भी एक जिला था. वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के बाद पलामू बिहार का हिस्सा बना और वर्ष 2000 में झारखंड राज्य गठन के बाद झारखंड के जिलों में शामिल हुआ. झारखंड गठन के बाद पलामू से लातेहार और गढ़वा को अलग जिला बनाया गया, लेकिन पलामू का मुख्यालय डालटनगंज (अब मेदिनीनगर) ही बना रहा.

गौरवशाली इतिहास का साक्षी है पलामू

हालांकि आधिकारिक रूप से पलामू का स्थापना वर्ष 1892 माना जाता है, लेकिन इसका इतिहास इससे कहीं अधिक पुराना है. पलामू किला इसका जीवंत प्रमाण है. किले का निर्माण 16वीं और 17वीं शताब्दी के बीच हुआ माना जाता है. उस दौर में पलामू पर चेरो राजवंश का शासन था. चेरो राजवंश का शासनकाल वर्ष 1613 से 1813 तक रहा. रक्शैल राजवंश को पराजित करने के बाद भागवंत राय ने चेरो राजवंश की नींव रखी. लगभग 200 वर्षों के शासनकाल में चेरो शासकों को मुगल शासकों और बाद में अंग्रेजों से लगातार संघर्ष करना पड़ा. अपने शासन के उत्तरार्द्ध में अंग्रेजों से लड़ने के लिए लेस्लीगंज में अंग्रेजों को छावनी तक बनानी पड़ी. अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के कारण चेरो राजवंश कमजोर पड़ा. परिस्थितियों के चलते पलामू किले से दूर शाहपुर में शाहपुर किले का निर्माण करना पड़ा. अंग्रेजों का साथ देने के कारण गोपाल राय को जुलाई 1771 में पलामू का शासक घोषित किया गया, लेकिन धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरे पलामू पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया. अंततः अंग्रेजी हुकूमत के सुदृढ़ होने के बाद वर्ष 1892 में पलामू को एक स्वतंत्र जिले का दर्जा दिया गया.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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