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बिहार का वो गणितज्ञ, जिसके लिए बदले गए यूनिवर्सिटी के नियम और जिसने आइंस्टीन के सिद्धांत को चुनौती दी

Vashishtha Narayan Birth Anniversary: बिहार के भोजपुर जिले के वसंतपुर गांव में 2 अप्रैल 1946 को जन्मे वशिष्ठ नारायण सिंह को गणित की दुनिया का अनमोल रत्न माना जाता है. उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि उनके लिए पटना विश्वविद्यालय को अपने नियम तक बदलने पड़े. उनकी जन्मतिथि को देखते हुए, यह दिन हिंदुस्तानीय गणित के लिए एक विशेष अवसर है, जब हम उनकी अद्वितीय उपलब्धियों को याद कर सकते हैं.

शिक्षा और अपार प्रतिभा

वशिष्ठ नारायण सिंह ने नेतरहाट विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और संयुक्त बिहार में टॉप किया. इसके बाद वे पटना साइंस कॉलेज में पढ़ने लगे. उनकी अद्वितीय प्रतिभा को कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन कैली ने पहचाना और उन्हें 1965 में अमेरिका ले गए. 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी पूरी की और वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर बने. वशिष्ठ नारायण सिंह ने नासा में भी काम किया. एक मशहूर घटना के अनुसार, जब अपोलो मिशन के दौरान कुछ समय के लिए नासा के 31 कंप्यूटर बंद हो गए थे, तो उन्होंने अपनी गणना कागज पर जारी रखी. जब कंप्यूटर फिर से चालू हुए तो उनकी गणना कंप्यूटर की गणना से मेल खा रही थी.

हिंदुस्तान वापसी और संघर्ष

Vashishtha Narayan
Vashishtha narayan

1971 में वे हिंदुस्तान लौट आए और आईआईटी कानपुर, आईआईटी मुंबई और आईएसआई कोलकाता में कार्य किया. हालांकि, वे स्कित्जोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी से ग्रसित हो गए, जिसने उनके जीवन को मुश्किल बना दिया. 1973 में उनकी शादी वंदना रानी सिंह से हुई, लेकिन उनके असामान्य व्यवहार के कारण यह विवाह लंबे समय तक नहीं चला. 1989 में वे अचानक लापता हो गए और 5 वर्षों तक उनकी कोई समाचार नहीं थी. अंततः 1993 में वे छपरा में पाए गए और फिर उनका इलाज बेंगलुरु में किया गया. उनकी स्थिति में सुधार तो हुआ, लेकिन उन्हें फिर भी गुमनामी का जीवन ही जीना पड़ा. उनके इलाज और पुनर्वास के लिए नया विचार ने एक विशेष अभियान चलाया था, जिससे उन्हें आवश्यक चिकित्सा सहायता मिल सकी. इस पहल के चलते प्रशासन और समाज का ध्यान उनकी स्थिति पर गया.

निधन और स्मरण

14 नवंबर 2019 को पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) में वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन हो गया. उनके निधन से हिंदुस्तान ने एक अनमोल गणितज्ञ खो दिया. उनकी जयंती को गणित और विज्ञान के छात्रों के लिए प्रेरणा दिवस के रूप में मनाना चाहिए ताकि उनकी प्रतिभा और संघर्ष की कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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