Rafale Source Code: चीन और पाकिस्तान से बढ़ते सुरक्षा खतरों के बीच हिंदुस्तानीय वायुसेना अपनी युद्धक क्षमता को और अधिक मजबूत करने में जुटी है. इसी रणनीति के तहत हिंदुस्तान प्रशासन फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों के सोर्स कोड को हासिल करने की कोशिश कर रही है. हिंदुस्तान का उद्देश्य है कि इन अत्याधुनिक फाइटर जेट्स को स्वदेशी हथियार प्रणालियों से लैस किया जा सके, ताकि विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम हो और हिंदुस्तान की रक्षा प्रणाली और अधिक आत्मनिर्भर बन सके.
राफेल फाइटर जेट की निर्माण कंपनी डसॉल्ट एविएशन से हिंदुस्तान ने पहले ही 36 राफेल विमानों की खरीद ‘प्रशासन से प्रशासन’ समझौते के तहत की थी. इनकी डिलीवरी पूरी हो चुकी है और अब ये विमान हिंदुस्तानीय वायुसेना के सबसे आधुनिक और ताकतवर बेड़े का हिस्सा हैं. हाल ही में हिंदुस्तान ने नौसेना के लिए 26 और राफेल विमान खरीदने की मंजूरी भी दे दी है. ऐसे में इन विमानों की क्षमताओं को हिंदुस्तान की जरूरतों के अनुसार अनुकूलित करना जरूरी हो गया है.
हिंदुस्तान ने फ्रांस से मांग की है कि उसे राफेल का सोर्स कोड उपलब्ध कराया जाए, जिससे हिंदुस्तान इन विमानों में अपनी घरेलू हथियार प्रणालियों को शामिल कर सके. उदाहरण के लिए, हिंदुस्तान अपने स्वदेशी ASTRA Mk-1 मिसाइल और स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन्स (SAAW) को राफेल में फिट करना चाहता है, जो बिना सोर्स कोड के संभव नहीं है. सोर्स कोड एक तरह से विमान का “दिमाग” होता है, जिससे इसके मिशन कंप्यूटर, रडार सिस्टम, और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली जैसे क्रिटिकल सॉफ्टवेयर कंट्रोल होते हैं.
लेकिन इस तकनीकी जानकारी को साझा करने को लेकर फ्रांस अब तक तैयार नहीं है. रिपोर्टों के अनुसार, डसॉल्ट एविएशन का तर्क है कि सोर्स कोड को विकसित करने में वर्षों की मेहनत और भारी निवेश हुआ है. यह उनका बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) है, जिसे साझा करने से उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी ऑटोनॉमी प्रभावित हो सकती है. फ्रांस को यह भी डर है कि अगर एक बार हिंदुस्तान को यह कोड दे दिया गया, तो राफेल खरीदने वाले अन्य देश जैसे कतर, मिस्र, इंडोनेशिया भी यही मांग कर सकते हैं. इससे कंपनी की नीति पर वैश्विक दबाव बन सकता है.
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इसके अलावा फ्रांस को साइबर सुरक्षा और भू-नेतृत्वक जोखिमों की भी चिंता है. हिंदुस्तान और चीन के बीच लगातार तनाव की स्थिति, और पाकिस्तान के साथ रिश्तों को देखते हुए फ्रांस को आशंका है कि सोर्स कोड की संवेदनशील जानकारी कहीं लीक न हो जाए या रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिये उसकी तकनीक की नकल न हो जाए. इस डर की वजह से फ्रांस ने हिंदुस्तान को एक वैकल्पिक समाधान सुझाया है एक संयुक्त तकनीकी टीम के जरिये सीमित सहयोग, जिसमें सोर्स कोड पूरी तरह साझा किए बिना कुछ हिंदुस्तानीय हथियारों का एकीकरण संभव हो सकेगा.
गौरतलब है कि हिंदुस्तान ने अतीत में भी फ्रांस से मिराज-2000 फाइटर जेट खरीदे थे, लेकिन दशकों बाद भी उसके लिए सोर्स कोड नहीं मिला. नतीजा यह है कि आज भी हिंदुस्तान को मिराज में कोई भी हिंदुस्तानीय हथियार प्रणाली जोड़ने के लिए फ्रांसीसी मदद की जरूरत पड़ती है. यही कारण है कि हिंदुस्तान अब राफेल के मामले में शुरुआत से ही पूरी तकनीकी स्वतंत्रता चाहता है.
हिंदुस्तान का यह कदम “आत्मनिर्भर हिंदुस्तान” पहल के तहत भी महत्वपूर्ण है. रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सॉफ्टवेयर, तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स पर नियंत्रण भी जरूरी है. अगर हिंदुस्तान को राफेल का सोर्स कोड मिल जाता है, तो वह अपनी वायुसेना को चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों के खिलाफ अधिक लचीला, तेज और प्रभावी बना सकेगा खासकर लद्दाख जैसे उच्च ऊंचाई वाले इलाकों में या इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की स्थिति में.
हालांकि फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है. दोनों देशों के बीच इस संवेदनशील मुद्दे पर बातचीत जारी है. देखना यह होगा कि फ्रांस हिंदुस्तान के साथ किस स्तर तक तकनीकी साझेदारी करने को तैयार होता है और क्या हिंदुस्तान अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए फ्रांस को इस दिशा में सहमत कर पाएगा.
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