जलवायु परिवर्तन से जुड़े अनेक अध्ययनों के बीच न्यूजीलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ कैंटरबरी के शोध में बदलाव के बारे में आयी विस्तृत जानकारी हैरान-परेशान करने वाली है, जो विज्ञान पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित हुई है. अध्ययन के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन और इंसानी गतिविधियों के कारण ऋतुचक्र तेजी से बदल रहे हैं, जिनका असर सिर्फ मौसम पर नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति और इंसानों की जिंदगी पर पड़ रहा है. गर्मी, सर्दी और बारिश-हर मौसम की अपनी खास भूमिका होती है, लेकिन अब ये समय पर नहीं आ रहे. जलवायु परिवर्तन के कारण वसंत पंद्रह दिन पहले आ रहा है, तो पतझड़ पंद्रह दिन देर से शुरू हो रहा है. इसके कारण पौधों के बढ़ने की अवधि 50 वर्षों में लगभग एक महीना बढ़ी है. गर्मी के दिनों में औसतन पांच-दस दिन की वृद्धि हुई है, तो सर्दी की अवधि घटी है. बर्फबारी कम हो रही है और बर्फ जल्दी पिघलने लगी है. मानसून अनिश्चित हुआ है, यानी कभी बहुत तेज बारिश होती है, तो कभी सूखा पड़ता है. प्रवासी पक्षियों और परागण करने वाले कीड़ों के जीवन चक्र में भी बदलाव आया है.
जहां तक मानव स्वास्थ्य का सवाल है, तो गर्मियों की अवधि लंबी और तीव्रता ज्यादा होने से गर्मी से जुड़ी बीमारियों और मृत्युदर में वृद्धि हो रही है और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ा है. कृषि क्षेत्र में फसलों की बुवाई और कटाई के समय में बदलाव के कारण उपज में गिरावट आयी है, सिंचाई समय पर नहीं हो रही और कीटों के प्रकोप का खतरा बढ़ा है. गर्म ऋतु के लंबे होने से जंगल में आग लगने की घटनाएं और तीव्रता बढ़ी है. जलवायु परिवर्तन से महासागरों के अंदर रोशनी घटी है, जबकि समुद्री खाद्य शृंखला तथा ऑक्सीजन उत्पादन के लिए रोशनी जरूरी है. ऋतु परिवर्तन से जानवरों के प्रजनन का चक्र गड़बड़ाया है और बच्चों के जीवित रहने की दर घटी है. बर्फीले इलाकों में पाया जाने वाला खरगोश- स्नो रैबिट- सर्दी में सफेद और गर्मी में भूरा हो जाता है, ताकि शिकारियों से बच सके. लेकिन समय पर बर्फ न गिरने से वह सफेद ही रह जाता है और दिख जाता है. ऐसे में, उसके शिकार होने का खतरा बढ़ा है. जलवायु परिवर्तन पर दूसरे तरह के अध्ययनों में भी प्रकृति, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर खतरों के बारे में बताया गया है. इससे बचने के लिए जीवन पद्धति में बदलाव के साथ-साथ वैश्विक नीतियों में भी बड़ा बदलाव जरूरी है.
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