Hot News

बच्चों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है स्क्रीन टाइम घटाना

Ghaziabad Sisters Suicide : उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुई हालिया घटना ने देश को झकझोर कर रख दिया है. यहां की ‘हिंदुस्तान सिटी सोसायटी’ में रहनेवाली तीन बहनों ने अपनी बालकनी से कूद जान दे दी. कारण बना मोबाइल. मोबाइल के जरिये तीनों बहनों का कोरियाई संस्कृति और संगीत से परिचय हुआ, जो धीरे-धीरे उनका जुनून बन गया. इस संस्कृति से वे इस कदर जुड़ाव महसूस करने लगीं कि अपने आप को हिंदुस्तानीय मानने से ही इनकार करने लगीं.

घरवालों ने उनकी इस सनक को देख मोबाइल छीन लिया. मोबाइल का जाना तीनों बहनों के लिए उनकी सबसे प्यारी चीज का छिन जाना था. बस फिर क्या था, तीनों ने मोबाइल के बिना जीने से बेहतर जान देना समझा. मोबाइल के लत की यह अकेली घटना नहीं है, यदि आप अपने आसपास नजर दौड़ायेंगे, तो पायेंगे कि शिशु अब स्पोर्ट्सने या एक-दूसरे से बातचीत करने की बजाय मोबाइल देखना पसंद कर रहे हैं. यही हाल बड़ों का भी है.

कई वर्ष पहले की बात है. दिल्ली के एक हवाई अड्डे पर बैठी थी. सामने ही एक युवा जोड़ा बैठा था. उनके दो शिशु थे. एक तीन-चार वर्ष की लड़की, दूसरा सात-आठ महीने का बच्चा प्रैम में. बच्ची इधर-उधर दौड़-भागकर स्पोर्ट्स रही थी. शिशु के हाथ में मोबाइल था. उस पर वह कार्टून देख रहा था. माता-पिता अपनी बातचीत में व्यस्त थे. अचानक छोटा बच्चा रोने लगा. पता चला कि प्रोग्राम खत्म हो जाने के कारण बच्चा रो रहा है. पिता ने फौरन दूसरा कार्टून लगा दिया. इतने में बच्ची आयी और पिता से मोबाइल पर कार्टून देखने की जिद करने लगी.

मां ने फौरन अपना मोबाइल निकाल उसे दे दिया. इतने छोटे बच्चों को मोबाइल पर आंखें गड़ाये लगभग पौने दो घंटे तक यह लेखिका देखती रही. ऐसे अनेक वीडियो और रील्स भी मैं देखती रही हूं, जिनमें माता-पिता बच्चों की शैतानियों और सवालों से बचने के लिए उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं. अनेक ऐसी समाचारें भी पढ़ने में आती हैं कि बच्चों को जब तक मोबाइल और उस पर देखने वाले कार्यक्रम न मिल जायें, वे सोते नहीं, दूध नहीं पीते, खाना तक नहीं खाते हैं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि शिशु तमाम तरह के कार्यक्रम देखते हुए खुश होते हैं, हंसते हैं, तो हम मान लेते हैं कि ये सब उनके लिए कितना अच्छा है. मगर यह सच नहीं है. यदि बच्चों को मोबाइल की लत लग जाये, तो यह हर तरह से उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. मोबाइल पर लगातार कार्टून या कार्यक्रम देखने से उनका दिमाग सुस्त होने लगता है. इसे ब्रेन रॉट कहते हैं. शिशु जिद्दी हो जाते हैं.

ऐसे मामले भी सामने आ चुके हैं कि मोबाइल की लत के कारण शिशु देर से बोल पा रहे हैं. तीन-तीन वर्ष तक के शिशु डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं. दिल्ली के एक नौ वर्ष के शिशु के बारे में समाचार छपी थी कि वह बिना मोबाइल के स्कूल नहीं जाता. ऐसे अनेक बच्चों के बारे में समाचारें आयी थीं, जिन्हें मोबाइल स्क्रीन पर लगातार कार्यक्रम देखने के कारण सर्वाइकल, तेज पीठ दर्द, आंखों में दिक्कतों का सामना करना पड़ा. एक अध्ययन में बताया गया था कि अधिकांश शिशु अब तमाम तरह की शारीरिक गतिविधियों में चालीस मिनट तक का समय भी नहीं बिताते हैं. वे लगातार बैठकर स्क्रीन देखते रहते हैं. बाहर दोस्तों के साथ स्पोर्ट्सने भी नहीं जाते हैं.

असल में, बच्चों के लिए कार्यक्रम बनाने वाली कंपनियां लगातार इस रणनीति पर काम करती हैं कि कैसे अधिक से अधिक बच्चों को आकर्षित किया जा सके. वे बच्चों की आदतों का अध्ययन करती हैं. सर्वे कराती हैं. जिन पात्रों को शिशु पसंद करते हैं, उन्हें अपने कार्यक्रमों में शामिल करती हैं. इसके लिए वे पात्रों और बैकग्राउंड में चटख रंगों का इस्तेमाल करती हैं. ऐसी धुनें बनाती हैं जिन्हें सुनकर शिशु रोमांचित हो उठें. विशेषज्ञों और डॉक्टरों की मानें, तो बच्चों की शारीरिक और दिमागी सेहत के लिए लगातार स्क्रीन देखना खतरनाक है. इसका पता कई बार फौरन नहीं, बहुत देर से चल पाता है.

यही कारण है कि पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल पर प्रतिबंध लगा दिया. डेनमार्क में स्कूलों ने मोबाइल पर प्रतिबंध लगा दिया है. हमारे यहां भी बहुत से स्कूलों ने ऐसा किया है, लेकिन यह भी सामने आया है कि बच्चों में स्मार्टफोन पर कार्यक्रम देखने की आदत भी बढ़ती जा रही है. अगर स्कूलों में इस पर रोक लगा भी दी जाये, तो घर में शिशु और किशोर क्या कर रहे हैं, इसकी निगरानी स्कूल नहीं कर सकते. इसलिए यह घरवालों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को इस तरफ न धकेलें. यह बात सच है कि आज के समय में, जब तरह-तरह की स्क्रीन हमारे घरों में मौजूद है, जैसे टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल, ऐसे में बच्चों के जीवन से इन्हें पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन निश्चित ही इनका समय घटाया जा सकता है.

बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाएं कहती हैं कि बच्चों को अधिक से अधिक दूसरी गतिविधियों में लगाकर उनका फोकस स्क्रीन से हटाया जा सकता है. इससे उनकी शारीरिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी. सबसे बड़ी बात, यदि माता-पिता चाहते हैं कि शिशु स्क्रीन को कम से कम समय दें, तो पहले वे इसका उपयोग कम करें और बच्चों के साथ अधिक समय बितायें.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

The post बच्चों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है स्क्रीन टाइम घटाना appeared first on Naya Vichar.

Spread the love

विनोद झा
संपादक नया विचार

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

About Us

नयाविचार एक आधुनिक न्यूज़ पोर्टल है, जो निष्पक्ष, सटीक और प्रासंगिक समाचारों को प्रस्तुत करने के लिए समर्पित है। यहां राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, तकनीक, शिक्षा और मनोरंजन से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर को विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाता है। नयाविचार का उद्देश्य पाठकों को विश्वसनीय और गहन जानकारी प्रदान करना है, जिससे वे सही निर्णय ले सकें और समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

Quick Links

Who Are We

Our Mission

Awards

Experience

Success Story

© 2025 Developed By Socify

Scroll to Top