Dhanbad News: आइआइटी आइएसएम के कल्चरल फेस्ट में अभिनेता पंकज झा ने कविताओं से छात्र-छात्राओं को झुमाया
Dhanbad News: युवा होना सबसे बड़ी उपलब्धि है और खुद को ढूंढ़ना ही सच्ची शिक्षा है. कुछ ऐसे ही गहरे और बेबाक विचारों से वेब सीरिज पंचायत के चर्चित ‘विधायक जी’ और फिल्म गुलाल में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले अभिनेता पंकज झा ने आइआइटी आइएसएम में चल रहे कल्चरल फेस्ट सृजन के दूसरे दिन शनिवार को छात्रों को मंत्रमुग्ध कर दिया. संस्थान के पेनमैन ऑडिटोरियम में आयोजित गेस्ट टॉक कार्यक्रम में श्री झा बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए.
तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजा ऑडिटोरियम
अभिनेता पंकज झा के मंच पर आते ही तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा ऑडिटोरियम गूंज उठा. संस्थाएं छात्र-छात्राएं उत्साहित हो उठे. कई छात्रों ने सीट से खड़े होकर उनका स्वागत किया. इस दौरान श्री झा ने अपने सहज और बेबाक अंदाज से जीवन, दर्शन और आत्मबोध से जुड़े सवालों के जवाब दिये. फिल्मों और बॉलीवुड से जुड़े सवालों पर उन्होंने मुस्कान और चुटीले जवाबों के साथ टाल दिया. इससे सभागार ठहाकों से गूंज उठा.
अपने घर कब वापस लौटेगा आदमी…
दौरान अभिनेता पंकज झा ने अपनी कविता के माध्यम से कहा- ‘अपनी कद्र खुद करो, किसी की आंखों में खुद को मत तलाशो’. ‘आदमी से पूछता है आदमी कि किधर मिलेगा आदमी, दूसरे की निगाहों में खुद का पता पूछता है आदमी…, अपने घर कब वापस लौटेगा आदमी… आदि कविताओं से उन्होंने श्रोताओं को लोटपोट कर दिया.
खुद को सिर्फ अभिनेता, लेखक या पेंटर नहीं मानता : पंकज झा
अभनेता पंकज झा ने कहा कि ओशो के दर्शन का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है. इसी दर्शन ने उन्हें जीना सिखाया. उन्होंने कहा कि इसी आत्मचिंतन की यात्रा से उनकी पुस्तक अज्ञात से ज्ञात की ओर जन्मी, जो आज बेस्टसेलर है. उन्होंने साफ कहा, “मैं खुद को सिर्फ अभिनेता, लेखक या पेंटर नहीं मानता. मैं भीतर से जीता हूं. इसी वजह से गुलामी की मानसिकता से दूर हूं’. उनका मानना है कि अपनी मर्जी से जीने वाला व्यक्ति अक्सर हर जगह अस्वीकार किया जाता है, लेकिन वही विद्रोही स्वभाव असली स्वतंत्रता की पहचान है. छात्रों के आग्रह पर उन्होंने मैथिली भाषा में “प्रीतम गेलन प्रदेश…” सुनाया, जिसने सभागार को भावुक कर दिया.
दिलों में रहता हूं…
उन्होंने अपनी एक और रचना सुनाई…
“दिलों में रहता हूं,
धड़कने थमा देता हूं,मैं इश्क हूं,
वजूद की धज्जियां उड़ा देता हूं.”
‘बोझ उतारो और खुद के लिए जियो…
सफलता की अंधी दौड़ पर कटाक्ष करते हुए पंकज झा ने कहा : आज बच्चों में स्कूल से ही सफलता का दबाव भर दिया जाता है, जिससे बचपन छीन जाता है. उन्होंने कहा कि ‘बोझ उतारो और खुद के लिए जियो…’ बुद्ध के उदाहरण से उन्होंने समझाया कि खुद की तलाश ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है. सृजन का यह सत्र छात्रों के लिए सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन की एक यादगार यात्रा बन गया.
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