Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर लक्ष्मी नारायण योग, अमृत योग, शुक्रादित्य योग और श्रवण नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है, इस दिन व्रत, रुद्राभिषेक और रात्रि जागरण कर भगवान शिव की उपासना होगी. महाशिवरात्रि के दिन पूरे समय सर्वार्थ सिद्धि योग प्रभावी रहेगा, इस दिन सूर्य और शुक्र कुंभ राशि में युति कर शुक्रादित्य योग का निर्माण करेंगे. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 15 फरवरी 2026 को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि को एक बड़ी खगोलिय घटना होने वाली है, इस दिन पर ग्रहों की एक ऐसी दुर्लभ स्थिति बन रही है जो पिछले 300 सालों में नहीं देखी गई, इस दिन एक साथ 4 बड़े राजयोग और 12 शुभ योगों का अद्भुत मिलन हो रहा है. कुंभ राशि में सूर्य, बुध, शुक्र और राहु की मौजूदगी से ‘चतुर्ग्रही योग’ बनेगा, जो ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देगा.
एक साथ सक्रिय होंगे 12 शुभ और 4 राजयोग
महाशिवरात्रि की सबसे बड़ी खासियत यहां बनने वाले योगों की लंबी लिस्ट है. इस दिन प्रीति योग, आयुष्मान योग, सौभाग्य योग, साध्य योग, शिव योग, शुक्ल योग, शोभन योग, सर्वार्थसिद्धि योग, चंद्रमंगल योग, त्रिग्रही योग, राज योग और ध्रुव योग जैसे 12 शुभ योग एक साथ सक्रिय रहेंगे, इन योगों के साथ-साथ सूर्य, बुध और शुक्र की युति से बुधादित्य योग, लक्ष्मी नारायण योग और शुक्रादित्य योग जैसे 4 बड़े राजयोग भी बन रहे हैं, ये सभी योग आपस में जुड़कर एक ऐसी शक्ति पैदा करेंगे जो सीधे तौर पर व्यक्ति की बुद्धि, सुख-सुविधाओं और समाज में उसकी प्रतिष्ठा को बढ़ाने का काम करेगी.
महाशिवरात्रि पर लक्ष्मी नारायण राजयोग
महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की विधिवत पूजा होगी, मंदिर में शिवलिंग पर गंगाजल, भांग, धतूरा, बेलपत्र चढ़ाए जाएंगे, यह पर्व इसलिए भी खास होने वाला है, क्योंकि इस दिन लक्ष्मी नारायण राजयोग भी रहने वाला है. महाशिवरात्रि के दिन कुंभ राशि में शुक्र-बुध की युति लक्ष्मी नारायण राजयोग रहेगा. ज्योतिष शास्त्र में इसे धन, समृद्धि और मानसिक शांति के लिए अत्यंत शुभ माना गया है.
महाशिवरात्रि 4 प्रहर पूजा मुहूर्त
निशिता काल पूजा समय – 15 फरवरी 2026 की रात 11 बजकर 38 मिनट से 12 बजकर 29 मिनट
प्रथम प्रहर पूजा का समय – शाम 05 बजकर 43 मिनट से 08 बजकर 53 मिनट तक
द्वितीय प्रहर पूजा का समय – रात 08 बजकर 53 मिनट से 12 बजकर 03 मिनट तक
तृतीय प्रहर पूजा का समय- रात 12 बजकर 03 मिनट से 03 बजकर 14 मिनट तक
चतुर्थ प्रहर पूजा का समय- 16 फरवरी की सुबह 03 बजकर 14 मिनट से 06 बजकर 24 मिनट तक
महाशिवरात्रि व्रत पारण समय – 16 फरवरी 2026 दिन सोमवार को 07 बजकर 49 मिनट से दोपहर 12 बजकर 04 मिनट तक
महाशिवरात्रि का व्रत कै करें
- महाशिवरात्रि के दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें.
- साफ वस्त्र पहनकर भगवान शिव का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें.
- घर या मंदिर में शिवलिंग की स्थापना कर गंगाजल से अभिषेक करें.
- शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भस्म और सफेद पुष्प अर्पित करें.
- “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का अधिक से अधिक जाप करें.
- निर्जल फलाहार करें या केवल जल ग्रहण करें.
- मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें, क्रोध और नकारात्मकता से दूर रहें.
- रात्रि में शिव जी की पूजा कर जागरण करें.
- अगले दिन सुबह शिव आरती के बाद व्रत का पारण करें.
- इस व्रत से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
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महाशिवरात्रि पर खास ज्योतिषीय योग
महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, इस दिन श्रद्धालु व्रत, पूजा-अर्चना और रुद्राभिषेक के माध्यम से भोलेनाथ की आराधना करते हैं. इस बार यह पर्व धार्मिक के साथ-साथ ज्योतिषीय दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसी दिन कई बड़े ग्रह परिवर्तन होने जा रहे हैं. पंचांग के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन एक दुर्लभ ग्रह संयोग बन रहा है, दोपहर के समय मंगल धनिष्ठा नक्षत्र में गोचर करेंगे, वहीं चंद्रमा मकर राशि में प्रवेश करेंगे, इसके अलावा रात करीब 9 बजे बुध ग्रह पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में गोचर करेंगे. एक ही दिन तीन प्रमुख ग्रहों की चाल बदलना अत्यंत प्रभावशाली माना जा रहा हैं.
क्यों करते हैं रुद्राभिषेक
रुद्राभिषेक का मतलब है भगवान रुद्र यानी भगवान शिव का पवित्र वस्तुओं से अभिषेक करना होता है, इसमें जल, दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल आदि से शिवलिंग का स्नान कराया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन रुद्राभिषेक करने से भक्तों को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है, इससे मन शांत रहता है और आत्मविश्वास बढ़ता है, इस दिन किया गया रुद्राभिषेक भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होता है और वे भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं, साथ ही व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास भी होता है.
रुद्राभिषेक का धार्मिक महत्व
शास्त्रों में कहा गया है: “रुतम् दुखम् द्रावयति इति रुद्र:” अर्थात भगवान शिव सभी दुखों को नष्ट करने वाले हैं. मान्यता है कि हमारे दुखों का कारण हमारे पिछले कर्म होते हैं, रुद्राभिषेक और रुद्रार्चन करने से पाप कर्मों का नाश होता है और साधक में शिव तत्व का विकास होता है. रुद्रहृदयोपनिषद में कहा गया है कि भगवान रुद्र सभी देवताओं की आत्मा हैं और सभी देवताओं में शिव का ही स्वरूप विद्यमान है. रुद्राभिषेक का फल शीघ्र प्राप्त होता है. कालसर्प दोष, गृहक्लेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में बाधा जैसी समस्याओं से मुक्ति के लिए यह पूजा बहुत फलदायी मानी जाती है.
रुद्राभिषेक करने से मिलने वाले प्रमुख लाभ
रुद्राभिषेक से जीवन की नकारात्मक ऊर्जा कम होती है. आर्थिक समस्याएं, नौकरी में रुकावट या व्यापार में नुकसान हो रहा हो, तो रुद्राभिषेक से शुभ परिणाम मिलने की मान्यता है. ग्रह दोष के कारण होने वाली मानसिक और शारीरिक समस्याओं में राहत मिलती है, रिश्तों में मधुरता और शांति वैवाहिक जीवन और पारिवारिक संबंधों में प्रेम और समझ बढ़ती है, महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की कठिनाइयों से रक्षा होती है.
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