Rajya Sabha Elections 2026: निर्वाचन आयोग ने बिहार समेत 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर 16 मार्च को चुनाव कराने की घोषणा कर दी है.
बिहार की पांच सीटों पर होने वाले इस चुनाव में चार सीटों पर एनडीए की बढ़त मानी जा रही है, जबकि पांचवीं सीट पर संख्या बल, गठबंधन नेतृत्व और छोटे दलों की भूमिका मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना सकती है.
बिहार की पांच सीटों पर बढ़ी हलचल
इस चुनाव में जिन सांसदों का कार्यकाल खत्म हो रहा है, उनमें राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर, राजद के अमरेंद्र धारी सिंह व प्रेमचंद गुप्ता तथा रालोमो के उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं. चुनाव कार्यक्रम के अनुसार 26 फरवरी को अधिसूचना जारी होगी, पांच मार्च तक नामांकन दाखिल होंगे और 16 मार्च को मतदान होगा.
संख्या बल में आगे एनडीए
विधानसभा के मौजूदा समीकरणों को देखें तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन चार सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. हिंदुस्तानीय जनता पार्टी की कोई सीट खाली नहीं हो रही, लेकिन वह अतिरिक्त सीट जीतने की स्थिति में है. वहीं जनता दल (यूनाइटेड) की दो सीटें खाली हो रही हैं, जिन्हें वह अपने संख्या बल के आधार पर सुरक्षित कर सकता है. इससे ऊपरी सदन राज्यसभा में एनडीए की ताकत और बढ़ सकती है.
उपेंद्र कुशवाहा की राह में चिराग का ‘रोड़ा’?
सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा रालोमो (RLM) अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की सीट को लेकर है. चर्चा है कि लोजपा (आर) के मुखिया चिराग पासवान अपनी मां रीना पासवान को राज्यसभा भेजने के लिए अड़ सकते हैं. चूंकि चिराग की पार्टी के पास अब 19 विधायकों की ताकत है, ऐसे में NDA के भीतर सीट शेयरिंग का फॉर्मूला काफी अहम होगा. यदि चिराग अपनी मांग पर कायम रहते हैं, तो उपेंद्र कुशवाहा के लिए दोबारा सदन पहुंचना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है.
पांचवीं सीट पर क्यों बढ़ा रोमांच
सबसे दिलचस्प मुकाबला पांचवीं सीट को लेकर माना जा रहा है. बिहार विधानसभा में विपक्ष में सबसे ज्यादा विधायक राष्ट्रीय जनता दल के पास हैं, लेकिन जीत के लिए उसे सहयोगियों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी. कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी विधायकों को जोड़ने पर संख्या बढ़ती है, मगर निर्णायक भूमिका छोटे दल निभा सकते हैं.
क्या ओवैसी बनेंगे किंगमेकर?
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को लेकर है. यदि उनके पांच विधायक विपक्ष के साथ आते हैं तो समीकरण सीधे मुकाबले में बदल सकता है. बसपा और अन्य छोटे दलों का समर्थन भी निर्णायक साबित हो सकता है, क्योंकि एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 मत जरूरी होंगे.
यही वजह है कि बिहार का यह राज्यसभा चुनाव सिर्फ संख्या का स्पोर्ट्स नहीं, बल्कि रणनीति, गठबंधन और सामाजिक समीकरणों की परीक्षा माना जा रहा है. चार सीटों पर तस्वीर लगभग साफ है, लेकिन पांचवीं सीट का परिणाम यह तय करेगा कि आने वाले समय में बिहार की सियासत किस दिशा में मुड़ेगी.
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