Bhowanipore Assembly Seat 2026: पश्चिम बंगाल की नेतृत्व के लगातार बदलते परिदृश्य में भवानीपुर विधानसभा जैसी कुछ ही सीटें हैं, जिनके साथ इतिहास और प्रतीकात्मक महत्व इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है. यह केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि वह नेतृत्वक सफर है, जो राज्य में कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व से लेकर तृणमूल कांग्रेस के उभार तक के बदलाव को साफ तौर पर दर्शाता है.
प्रभावशाली नेताओं का आधार रही भवानीपुर विधानसभा सीट
आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नेतृत्वक गढ़ मानी जाने वाली भवानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही. आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी और राज्य के कई प्रभावशाली नेताओं का नेतृत्वक आधार रही.
भवानीपुर का सामाजिक गणित : क्यों है यह ‘मिनी इंडिया’?
दक्षिण कोलकाता की यह सीट अपनी बहुसांस्कृतिक पहचान के लिए जानी जाती है. यहां की आबादी का मिश्रण ही इसे नेतृत्वक रूप से रोचक बनाता है.
- बंगाली हिंदू : लगभग 42 प्रतिशत
- गैर-बंगाली (हिंदी भाषी/व्यापारी वर्ग) : 34 प्रतिशत
- मुस्लिम मतदाता : करीब 24 प्रतिशत
- कोलकाता का प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का निवास इसी क्षेत्र में है. इससे इस सीट का महत्व और बढ़ जाता है.
पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे भवानीपुर से जीते
पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और बाद में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीता. कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं जैसे मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भवानीपुर कांग्रेस का प्रमुख शहरी गढ़ बन गया.
कुछ दिनों के लिए वामदलों के कब्जे में रही भवानीपुर
कई वर्षों तक यह सीट कांग्रेस के प्रभाव में रही, जबकि वामपंथी दल उस समय केवल 1969 में थोड़े समय के लिए यहां जीत हासिल कर सके, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट विधानसभा क्षेत्र कर दिया गया था. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता साधन गुप्ता ने बांग्ला कांग्रेस और माकपा की संयुक्त मोर्चा की दूसरी प्रशासन के दौरान यह सीट जीती. वह 1953 में हिंदुस्तान के पहले दृष्टिहीन सांसद बने थे.
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1972 में नक्शे से गायब हो गयी भवानीपुर सीट
भवानीपुर की नेतृत्वक यात्रा ने तब अप्रत्याशित मोड़ ले लिया, जब यह सीट 1972 में परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हो गयी. लगभग 4 दशकों तक यह सीट केवल नेतृत्वक स्मृतियों में ही बनी रही. वर्ष 2011 के परिसीमन के दौरान यह सीट दोबारा अस्तित्व में आयी, तब पश्चिम बंगाल की नेतृत्व भी बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही थी. उसी वर्ष वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत हुआ और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी का दौर शुरू हुआ.
2011 में सुब्रत बक्शी ने जीती सीट
नये सिरे से बनी भवानीपुर सीट जल्द ही तृणमूल के उभार से जुड़ गयी. ममता बनर्जी ने 2011 के पहले चुनाव में अपने करीबी सहयोगी सुब्रत बक्शी को इस सीट से उम्मीदवार बनाया. बक्शी ने 64 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करके माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोट से हराया और भवानीपुर को तृणमूल का मजबूत गढ़ बना दिया.
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भवानीपुर से उपचुनाव लड़कर पहली बार सीएम बनीं ममता
बाद में सुब्रत बक्शी ने सीट छोड़ दी, ताकि तृणमूल की भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी उपचुनाव के जरिये विधानसभा में प्रवेश कर सकें. ममता बनर्जी ने करीब 77 प्रतिशत वोट हासिल कर माकपा की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से अधिक मतों से हराया और भवानीपुर में अपना मजबूत नेतृत्वक आधार स्थापित किया. तब से यह सीट तृणमूल के कब्जे में बनी हुई है.
कई-हाई प्रोफाइल मुकाबले हुए, लेकिन नतीजा नहीं बदला
कोलकाता के महापौर और पश्चिम बंगाल प्रशासन के मंत्री फिरहाद हकीम कहते हैं कि भवानीपुर हमारे लिए सिर्फ एक सीट नहीं है. यह वह जगह है, जहां लोगों ने ममता बनर्जी की विकास और समावेश की नेतृत्व पर बार-बार भरोसा जताया है. वर्षों से भवानीपुर में कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले हुए, लेकिन नतीजा नहीं बदला.
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2016 में ममता बनर्जी ने दीपा दासमुंशी को हराया
वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों और कांग्रेस ने गठबंधन कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता दीपा दासमुंशी को ममता बनर्जी के खिलाफ उतारा. इस मुकाबले को ‘दीदी बनाम बौदी’ के रूप में पेश किया गया. ममता दीदी ने 65,520 वोट हासिल कर दीपा दासमुंशी को आसानी से हरा दिया. दीपा को 40,219 वोट मिले. भाजपा के चंद्र कुमार बोस तीसरे स्थान पर रहे, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार से ताल्लुक रखते हैं.
2021 में फिर भवानीपुर से उपचुनाव जीतकर बनीं सीएम
पांच साल बाद 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहां उनका मुकाबला उनके पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी से हुआ. भवानीपुर से तृणमूल ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया. भाजपा ने यहां से अभिनेता रुद्रनील घोष को टिकट दया. घोष को 44,786 वोट मिले, जो इस सीट पर किसी विपक्षी उम्मीदवार को अब तक मिले सबसे ज्यादा वोट थे. फिर भी वह 28,000 से अधिक वोटों से हार गये.
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ममता बनर्जी के लिए शोभनदेव ने खाली की थी सीट
उसी वर्ष यह सीट और अधिक महत्वपूर्ण हो गयी. नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी से 1,956 वोटों से हारने के बाद पश्चिम बंगाल की चीफ मिनिस्टर ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उपचुनाव जीतना जरूरी था. एक बार फिर भवानीपुर केंद्र में आया. शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने सीट खाली की और टीएमसी सुप्रीमो ने भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल के खिलाफ उपचुनाव लड़ा.
2021 के चुनाव में ममता बनर्जी को मिले 72 प्रतिशत मत
ममता बनर्जी ने 58,000 से अधिक वोटों के अंतर से प्रियंका टिबरेवाल को पराजित किया. टीएमसी सुप्रीमो को लगभग 72 प्रतिशत मत मिले. इसके साथ ही भवानीपुर उनकी सबसे भरोसेमंद सीट के रूप में स्थापित हो गयी.
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भवानीपुर विधानसभा सीट का प्रोफाइल
भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र मुख्यतः कोलकाता नगर निगम के वार्डों से बना है, जो दक्षिण कोलकाता की सामाजिक विविधता को दर्शाता है. यहां बंगाली मध्यमवर्गीय इलाकों के साथ बड़ी संख्या में हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय भी रहता है. इस क्षेत्र में प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर भी है, जो कोलकाता के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. यहीं ममता बनर्जी का निवास भी है.
हाई-प्रोफाइल सीट की डेमोग्राफी
इस क्षेत्र में लगभग 42 प्रतिशत मतदाता बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और करीब 24 प्रतिशत मुस्लिम हैं. नेतृत्वक विश्लेषकों का मानना है कि यह सामाजिक मिश्रण ममता बनर्जी की शहरी जनवादी नेतृत्व के अनुकूल रहा है. नेतृत्वक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा- भवानीपुर दक्षिण कोलकाता की बहुसांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है. ममता बनर्जी ने यहां समुदायों से परे एक व्यक्तिगत जुड़ाव बनाया है.
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फिर नेतृत्व के केंद्र में आया भवानीपुर
जैसे-जैसे 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, भवानीपुर एक बार फिर नेतृत्व के केंद्र में है. ममता बनर्जी इसी सीट से चुनाव लड़ रहीं हैं. भाजपा ने उनके खिलाफ नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है, जिन्होंने वर्ष 2021 के बंगाल चुनाव में नंदीग्राम विधानसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता को हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया था.
मनोवैज्ञानिक युद्ध का मैदान – नेतृत्वक विश्लेषक
ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के इस मुकाबले ने इस सीट की नेतृत्वक कहानी में एक नया नाटकीय मोड़ जोड़ दिया है. विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि भवानीपुर में ममता बनर्जी को चुनौती देकर भाजपा इस सीट को मनोवैज्ञानिक युद्ध का मैदान बनाना चाहती है.
SIR ने भी तेज की नेतृत्वक बहस
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने भी इस सीट को लेकर नेतृत्वक बहस को तेज कर दिया है. भवानीपुर में मतदाता सूची से 47,000 से अधिक नाम हटाये गये हैं, जबकि 14,000 से अधिक मतदाता कानूनी पचड़े में फंसे हैं. भाजपा नेता सुकांत मजूमदार कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में समय बदल चुका है. जो सीटें कभी अजेय मानी जाती थीं, वे अब चुनौती का सामना कर रही हैं और भवानीपुर भी इसका अपवाद नहीं होगा.
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भवानीपुर में 29 अप्रैल को दूसरे चरण में होगी वोटिंग
निकटवर्ती चुनावी मुकाबले से परे भवानीपुर अब राज्य की सबसे प्रतीकात्मक नेतृत्वक लड़ाई के केंद्र में है. दांव पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी दोनों की साख है. कौन जीतेगा, कौन हारेगा, इसका फैसला 4 मई को होगा, क्योंकि 23 और 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में 2 चरणों में वोटिंग के बाद उसी दिन मतगणना होगा. भवानीपुर विधानसभा सीट पर 29 अप्रैल को मतदान होगा.
ममता बनर्जी बनाम भाजपा
| चुनाव | विजेता | प्रतिद्वंद्वी | अंतर |
|---|---|---|---|
| नंदीग्राम 2021 | शुभेंदु अधिकारी | ममता बनर्जी | 1,956 |
| भवानीपुर उपचुनाव 2021 | ममता बनर्जी | प्रियंका टिबरेवाल | 58,835 |
| भवानीपुर 2026 | ? | ? | सीधी जंग |
चुनाव कार्यक्रम
| अधिसूचना जारी करने की तारीख | 02.04.2026 |
| नामांकन की अंतिम तारीख | 09.04.2026 |
| नामांकन पत्रों की जांच की तारीख | 10.04.2026 |
| नाम वापस लेने की आखिरी तारीख | 13.04.2026 |
| वोटिंग की तारीख | 29.04.2026 |
| काउंटिंग की तारीख | 04.05.2026 |
| चुनाव की प्रक्रिया हो जायेगी पूरी | 06.05.2026 |
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