Jagarnath Mahto Death Anniversary, बेरमो (राकेश वर्मा की रिपोर्ट): झारखंड के संघर्षशील राजनेता और पूर्व शिक्षा मंत्री स्व. जगरनाथ महतो की आज पुण्यतिथि के अवसर पर पूरा राज्य उन्हें नमन कर रहा है. चंद्रपुरा प्रखंड की अलारगो पंचायत के एक छोटे से गांव सिमराकुली की गलियों से निकलकर सत्ता के गलियारों तक पहुंचने वाले जगरनाथ महतो का निधन पिछले वर्ष 4 अप्रैल को इलाज के दौरान चेन्नई में हो गया था. उन्होंने 80 के दशक में झामुमो के एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में नेतृत्व में कदम रखा था और धीरे-धीरे अपनी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनाई, जो जमीन से जुड़ा रहा और जिसकी रगों में आंदोलन का खून दौड़ता था.
90 के दशक में ही शुरू हुआ संघर्षों का सिलसिला
जगरनाथ महतो पहली बार 90 के दशक में तब चर्चा में आए, जब उन्होंने भंडारीदह रिफैक्ट्रीज प्लांट में हो रहे ‘फायर क्ले’ के परिवहन घोटाले का पर्दाफाश किया. दबंग ट्रांसपोर्टरों और पुलिस प्रताड़ना के बावजूद वे पीछे नहीं हटे. तत्कालीन सांसद स्व. राजकिशोर महतो के हस्तक्षेप के बाद वे पुलिस की गिरफ्त से बाहर आ सके. डुमरी-नावाडीह क्षेत्र के ग्रामीणों के साथ-साथ बेरमो कोयलांचल में मजदूरों और विस्थापितों के हक की लड़ाई लड़ते हुए वे ‘टाइगर’ के रूप में उभरे. गांव में बिजली का खंभा खुद ठेला पर ढोने से लेकर कोलियरी में मजदूरों के साथ खड़े होने तक, उनकी छवि हमेशा एक ‘ग्रासरूट लीडर’ की रही.
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दो दशक तक डुमरी के अजेय योद्धा रहे ‘टाइगर’
जगरनाथ महतो का नेतृत्वक प्रभाव इतना व्यापक था कि उन्होंने 1977 से चले आ रहे लालचंद महतो और शिवा महतो के वर्चस्व को पूरी तरह खत्म कर दिया. साल 2005 से लेकर 2019 तक वे लगातार डुमरी विधानसभा से चुनाव जीतते रहे. यहां तक कि 2014 की प्रचंड ‘मोदी लहर’ भी उनके दुर्ग को नहीं भेद सकी और उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को 33 हजार से अधिक मतों के भारी अंतर से शिकस्त दी. वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि जनता के सुख-दुख के साथी थे. अक्सर सुबह-सुबह लालटेन लेकर बच्चों को पढ़ने के लिए जगाना और खुद विद्यालय जाकर बच्चों के साथ पढ़ाई करना उनकी सादगी का प्रमाण था.
आंदोलन के थे उपज, अंतिम सांस तक की जनसेवा
झारखंड अलग राज्य आंदोलन से लेकर पारा शिक्षकों, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका और स्थानीयता (खतियान 1932) के मुद्दे तक, जगरनाथ महतो ने विधानसभा में हमेशा अपनी आवाज मुखर रखी. सीएनटी-एसपीटी एक्ट और स्थानीय नीति पर उनका रुख बेहद स्पष्ट और कड़ा रहता था. कोरोना से संक्रमित होने और फेफड़े के प्रत्यारोपण के बाद भी उन्होंने आराम नहीं किया. वे अक्सर कहते थे, “जिस तरह गोबर के कीड़े को गोबर से बाहर कर देने से वह मर जाता है, वैसे ही अगर हमें भी लोगों के बीच से हटा दिया जाए तो हम जीवित नहीं रह सकते. जनता के साथ जिए हैं, जनता के बीच मरेंगे.” उनके पिता रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे और जगरनाथ महतो ने खेती-बाड़ी करते हुए घर की जिम्मेदारी संभाली. उसी संघर्ष को उन्होंने अपना हथियार बनाया और अंतिम समय तक माटी की सेवा करते रहे.
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