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Toxic Film Review: यश ने फूंक दी सिगरेट, किया धांसू एक्शन … लेकिन कहानी कहां है भाई?

यश की ‘टॉक्सिक’ को लेकर काफी समय से बज बना हुआ था. बड़े स्टार, बड़ा स्केल, एक्शन, स्टाइल और एक लंबी-चौड़ी स्टारकास्ट. फिल्म देखने के बाद सवाल यही है कि क्या यह सब मिलकर एक ऐसी फिल्म बना पाते हैं, जिसे थिएटर से निकलने के बाद भी याद रखा जाए? मेरा जवाब है – पूरी तरह नहीं.

फिल्म: टॉक्सिक

कास्ट: यश, कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया

डायरेक्टर: गीतू मोहनदास

अवधि: 2 घंटे 55 मिनट

रेटिंग: ⭐⭐/5

यश की एंट्री से लेकर आखिरी सीन तक सिर्फ स्वैग

‘टॉक्सिक’ में यश को देखकर साफ लगता है कि उन्होंने अपने लुक और फिजिक पर जमकर मेहनत की है. खासकर उनका यंगर वर्जन काफी एनर्जेटिक, फनी और ह्यूमरस है. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ऐसी है कि कई कमजोर सीन्स भी सिर्फ उनकी वजह से संभल जाते हैं.

लेकिन परेशानी यह है कि फिल्म में यश के स्वैग को कहानी से ज्यादा तवज्जो दी गई है. हर थोड़ी देर में सिगरेट, रोमांस या फाइट. कई बार ऐसा लगता है कि कहानी के बीच एक्शन नहीं है, बल्कि एक्शन के बीच थोड़ी-सी कहानी डाल दी गई है.

फिल्म कम, लंबा ट्रेलर ज्यादा लगती है

‘टॉक्सिक’ के कई शॉट्स बेहद स्टाइलिश हैं. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है और कुछ फ्रेम वाकई स्क्रीन पर शानदार नजर आते हैं. लेकिन लगातार स्टाइलिश शॉट्स और एक्शन के बीच कहानी का फ्लो कमजोर पड़ जाता है.

एक वक्त के बाद ऐसा महसूस होने लगता है जैसे आप कोई फिल्म नहीं, बल्कि एक बहुत लंबा ट्रेलर देख रहे हैं. यही चीज फिल्म को कई हिस्सों में बोरिंग बना देती है.

VFX ठीक, लेकिन BGM ने निराश किया

फिल्म के VFX को ओके-ओके कहा जा सकता है. कुछ सीन्स अच्छे हैं, लेकिन ऐसा विजुअल इफेक्ट्स एक्सपीरियंस नहीं मिलता जिसकी उम्मीद इतने बड़े प्रोजेक्ट से की जाती है.

और BGM की बात करें तो यहां फिल्म और निराश करती है. एक्शन और बड़े मोमेंट्स को जिस तरह के दमदार बैकग्राउंड स्कोर की जरूरत थी, वह असर देखने को नहीं मिलता.

सबसे बड़ी बात – फिल्म का एक भी गाना ऐसा नहीं है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद याद रह जाए. ‘टॉक्सिक’ जैसी फिल्म में म्यूजिक बड़ा प्लस पॉइंट बन सकता था, लेकिन यहां ऐसा नहीं हो पाया.

हिंदी डायलॉग्स सुनकर कई बार अजीब लगे

फिल्म के हिंदी डायलॉग्स भी इसकी कमजोर कड़ी हैं. कई लाइनें इतनी अटपटी लगती हैं कि सीन का इमोशन टूट जाता है. मुमकिन है कि ओरिजिनल भाषा में इनका असर अलग हो, लेकिन हिंदी वर्जन में डायलॉग्स कई जगह नैचुरल नहीं लगते.

कुछ लाइनें तो जरूरत से ज्यादा फिलॉसॉफिकल लगती हैं, जबकि सिंपल और इमोशनल डायलॉग ज्यादा असरदार हो सकते थे.

कियारा आडवाणी ने किया अच्छा काम

कियारा आडवाणी की परफॉर्मेंस फिल्म में अच्छी लगती है. उनके किरदार को जितना स्पेस मिला है, उसमें वह स्क्रीन पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराती हैं. हालांकि फिल्म में उनके किरदार को और बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता था.

दिलचस्प बात यह भी है कि फिल्म में कई बड़े एक्टर्स नजर आते हैं, लेकिन उनके हिस्से में बहुत छोटे रोल आए हैं. इतनी बड़ी स्टारकास्ट से ज्यादा की उम्मीद होना स्वाभाविक है.

कहानी के दौर और कपड़ों का मेल नहीं बैठता

फिल्म का सेटअप पुराने दौर और गैंगस्टर बैकग्राउंड वाला है, लेकिन कई स्त्री किरदारों के आउटफिट देखकर लगता है कि वे किसी मॉडर्न फैशन शो से सीधे सेट पर आ गई हैं.

कपड़ों और कहानी की दुनिया के बीच यह अंतर कई जगह काफी अजीब लगता है और फिल्म की ओवरऑल विजुअल लैंग्वेज को प्रभावित करता है.

क्लाइमैक्स बचा लेता है थोड़ा मामला

फिल्म के आखिर में एक ट्विस्ट आता है. यह ट्विस्ट कुछ दर्शकों को पसंद आ सकता है और कुछ को शायद नहीं. लेकिन इतना जरूर है कि क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म दोबारा थोड़ी दिलचस्पी पैदा करती है.

Final Verdict: यश हैं, लेकिन ‘टॉक्सिक’ में वो बात नहीं

‘टॉक्सिक’ की सबसे बड़ी ताकत यश हैं. उनकी फिजिक, स्क्रीन प्रेजेंस और स्टाइल फिल्म को देखने की वजह देते हैं. सिनेमेटोग्राफी भी अच्छी है और कुछ सीन्स शानदार तरीके से शूट किए गए हैं.

लेकिन कमजोर कहानी, जरूरत से ज्यादा एक्शन, अजीब हिंदी डायलॉग्स, फीका BGM, याद न रहने वाले गाने और कई बड़े एक्टर्स के छोटे रोल फिल्म को कमजोर करते हैं.

क्या ‘टॉक्सिक’ यश के स्टारडम के साथ न्याय करती है? कुछ हद तक. क्या यह एक यादगार फिल्म बन पाती है? नहीं.

अगर आप यश के फैन हैं तो उनके स्वैग और फिजिक के लिए फिल्म देख सकते हैं. लेकिन अगर आप एक मजबूत कहानी और ऐसा म्यूजिक ढूंढ रहे हैं जो थिएटर से निकलने के बाद भी आपके साथ रहे, तो ‘टॉक्सिक’ शायद आपको निराश करे.

इनपुट- कीर्ति चौहान

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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