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AIPOC: सदन में व्यवधान की बजाय चर्चा और संवाद की संस्कृति को बनाना होगा सशक्त

AIPOC: विधायिका को अधिक प्रभावी, जनोपयोगी और उत्तरदायी बनाने के लिए एक ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ (नेशनल लेजिस्लेटिव इंडेक्स) तैयार किया जाएगा. इसका मकसद देशभर के विधान मंडलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, संवाद की गुणवत्ता और कार्यकुशलता में वृद्धि करना होगा. इस बाबत एक समिति का गठन होगा. लखनऊ में 19 से 21 जनवरी तक आयोजित 86 वें अखिल हिंदुस्तानीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआईपीओसी) के समापन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने यह बात कही.

बिरला ने कहा कि राज्य विधान मंडल में हर साल कम से कम 30 बैठक होनी चाहिए. ऐसा होने से विधानमंडल जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का एक प्रभावी मंच बन सकेगा क्योंकि सदन जितना अधिक चलेगा, उतनी ही अधिक सार्थक, गंभीर और परिणामोन्मुख चर्चा संभव होगी. पीठासीन अधिकारी केवल कार्यवाही संचालित करने वाले नहीं होते, बल्कि वे संविधान के प्रहरी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के संरक्षक होते हैं और उनकी निष्पक्षता, संवेदनशीलता और दृढ़ता ही सदन की दिशा तय करती है.

लोकसभा अध्यक्ष ने आगामी बजट सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने में सभी को सहयोग देने को कहा. सदन में लगातार नियोजित गतिरोध और व्यवधान देश के लोकतंत्र के लिए उचित नहीं हैं. सदन में व्यवधान से सबसे अधिक नुकसान आम लोगों का होता है. सदन में गतिरोध की बजाय चर्चा और संवाद की संस्कृति को सशक्त बनाना होगा. लोकतंत्र में लोक सर्वोपरि है, और जनता के प्रति हमारी जवाबदेही केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि हर दिन और हर क्षण होती है. 

विधानमंडल में हर साल कम से कम 30 बैठक होना जरूरी

इस सम्मेलन में 6 महत्वपूर्ण संकल्प पारित किए गए. जैसे सभी पीठासीन अधिकारी अपनी-अपनी विधायिकाओं के कार्य संचालन के प्रति स्वयं को पुनः समर्पित करेंगे, ताकि वर्ष 2047 तक ‘विकसित हिंदुस्तान’ के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में योगदान दिया जा सके, सभी नेतृत्वक दलों के बीच सहमति बनाकर राज्य विधायी निकायों की न्यूनतम तीस (30)  बैठक सालाना की जाए तथा विधायी कार्यों के लिए उपलब्ध समय और संसाधनों का रचनात्मक एवं प्रभावी उपयोग किया जाए, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता के प्रति उत्तरदायी हो सके, विधायी कार्यों की सुगमता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को निरंतर सुदृढ़ किया जाएगा, जिससे जनता और उनकी विधायिकाओं के बीच प्रभावी संपर्क स्थापित हो सके तथा सार्थक सहभागी शासन सुनिश्चित हो साथ ही सहभागी शासन की सभी संस्थाओं को आदर्श नेतृत्व प्रदान करना निरंतर जारी रखना, ताकि राष्ट्र की लोकतांत्रिक परंपरा और मूल्य और अधिक गहरे तथा सशक्त हो.

 
डिजिटल प्रौद्योगिकी के कुशल उपयोग के क्षेत्र में सांसदों एवं विधायकों की क्षमता निर्माण का निरंतर समर्थन तथा विधायिकाओं में होने वाली बहसों और चर्चाओं में जनप्रतिनिधियों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु शोध एवं अनुसंधान सहायता को सुदृढ़ करना और विधायी निकायों के कार्य संपादन का वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर मूल्यांकन एवं तुलनात्मक आकलन (बेंचमार्किंग) करने हेतु एक ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ का निर्माण, जिससे जनहित में अधिक उत्तरदायित्व के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने हेतु अनुकूल वातावरण स्थापित हो सके. गौरतलब है कि इस सम्मेलन में  24 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से 36 पीठासीन अधिकारियों ने भागीदारी की.  

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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