डॉ राकेश कुमार सिन्हा ‘रवि’
Basant Panchmi 2026: इस साल 23 जनवरी को सरस्वती पूजा यानी बसंत पंचमी मनाया जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां सरस्वती ही नदी के रूप में धरती पर अवतरित हुईं. इसलिए सरस्वती पूजा केवल देवी की नहीं, बल्कि उस पवित्र नदी की भी पूजा मानी जाती है, जो जीवन और ज्ञान दोनों देती है.
वैदिक धर्मग्रंथों के अनुसार धरती पर नदियों की कहानी सरस्वती नदी से शुरू होती है. प्राचीन ग्रंथों में सरस्वती को बहुत विशेष स्थान दिया गया है. ऋग्वेद और महाहिंदुस्तान जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में सरस्वती नदी का बार-बार उल्लेख मिलता है. ऋग्वेद में एक खास नदी सूक्त है, जिसमें कई नदियों का वर्णन किया गया है. लेकिन इन सभी में सरस्वती को सबसे श्रेष्ठ माना गया है. इसी कारण एक सूक्त में सरस्वती को ‘नदीतमा’, यानी सभी नदियों में सबसे महान और पवित्र नदी कहा गया है.
महाहिंदुस्तान काल में सरस्वती नदी को मिला था श्राप
पौराणिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि महाहिंदुस्तान काल में सरस्वती नदी को श्राप मिला था. इस श्राप के कारण यह माना जाता है कि कलियुग के आने तक सरस्वती नदी धरती से लुप्त रहेंगी, यानी वे दिखाई नहीं देंगी, लेकिन गुप्त रूप में बहती रहेंगी. सरस्वती नदी के लुप्त होने को लेकर धार्मिक ग्रंथों में अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं. पुराणों में बताया गया है कि सरस्वती को श्राप मिला, जिसके कारण वे धरती से गायब हो गईं. इस विषय में स्कंद पुराण में कई कथाएं वर्णित हैं.
गणेश जी द्वारा दिया गया श्राप
स्कंद पुराण के नागर खंड के 172वें अध्याय के अनुसार, जब महाहिंदुस्तान का लेखन हो रहा था, उस समय सरस्वती नदी बहुत तेज प्रवाह में बह रही थीं. उनके जल की तेज आवाज से गणपति जी को लिखने में बाधा हो रही थी. उन्होंने सरस्वती से निवेदन किया कि वे थोड़ा धीमे बहें, ताकि लेखन कार्य ठीक से हो सके. लेकिन अपने वेग के कारण सरस्वती ने गणेश जी की बातों को अनसुना कर दिया. इससे क्रोधित होकर गणपति जी ने उन्हें पाताल लोक में बहने का श्राप दे दिया. मान्यता है कि इसी श्राप के कारण सरस्वती नदी धरती से लुप्त हो गईं.
दुर्वासा ऋषि का श्राप
सरस्वती के लुप्त होने की एक दूसरी कथा भी स्कंद पुराण के तीर्थ महात्म्य में मिलती है. इसके अनुसार, दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण सरस्वती नदी अदृश्य हो गईं. यह भी कहा जाता है कि कलियुग के अंत तक सरस्वती पूरी तरह से विलुप्त रहेंगी और कल्कि युग में दोबारा प्रकट होंगी.
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वशिष्ठ ऋषि और विश्वामित्र की कथा
एक और मान्यता के अनुसार, विश्वामित्र के क्रोध से उत्पन्न परिस्थितियों में ऋषि वशिष्ठ ने सरस्वती नदी को लुप्त होने का श्राप दिया. इस श्राप के कारण सरस्वती पाताल लोक में जाकर बहने लगीं और धरती पर उनका प्रवाह समाप्त हो गया.
प्राकृतिक कारण भी माने जाते हैं
कुछ विद्वानों का मानना है कि लंबे समय में जलवायु परिवर्तन, भूमि की बनावट में बदलाव, मौसम परिवर्तन और भूस्खलन जैसे प्राकृतिक कारणों से भी सरस्वती नदी धीरे-धीरे सूख गई. लेकिन धार्मिक कथाओं में श्राप की बातें आज भी जुड़ी हुई हैं.
देवी और नदी दोनों रूपों में पूज्य
भगवती शारदे कभी देवी के रूप में तो कभी नदी के रूप में हिंदुस्तान भूमि को ज्ञान और संस्कृति का उपहार देती रही हैं. साल भर उनकी महिमा गाई जाती है, लेकिन वसंत पंचमी के दिन पूरा वातावरण सरस्वतीमय हो जाता है और हर ओर विद्या व ज्ञान की आराधना होती है.
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