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Bihar: महज 12 डॉक्टरों के भरोसे चल रहा बिहार का ये मेडिकल कॉलेज, छात्रों का एडमिशन भी अटका

Bihar: करीब 11 महीने पहले छपरा मेडिकल कॉलेज का शुभारंभ किया गया था. तब यह उम्मीद जगी थी कि अब सारण प्रमंडल के मरीजों को इलाज के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा और मेडिकल की पढ़ाई के लिए स्थानीय छात्रों को भी अवसर मिलेगा. लेकिन वर्तमान हालात ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.

मेडिकल कॉलेज को है 300 से ज्यादा डॉक्टरों की जरूरत 

मेडिकल कॉलेज के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं. जिस मेडिकल कॉलेज में तीन सौ से अधिक डॉक्टर और सौ से ज्यादा कर्मियों की आवश्यकता है, वहां फिलहाल महज 12 डॉक्टरों के सहारे मेडिकल कॉलेज सह अस्पताल का संचालन किया जा रहा है. स्थिति यह है कि कॉलेज प्रशासन गंभीर मरीजों को भर्ती करने से भी इनकार कर रहा है. बच्चों का नामांकन तो अभी दूर की बात बनकर रह गया है.

इन 12 डॉक्टरों से लिया जा रहा है काम

कॉलेज में फिलहाल जिन डॉक्टरों के कार्यरत होने की जानकारी है, उनमें डॉ निर्मला कुमारी (उपाधीक्षक), डॉ आशीष रंजन, डॉ रूपम कुमारी, डॉ आशा कुमारी, डॉ श्वेता सुमन, डॉ तनु शर्मा, डॉ कुमारी सुमन, डॉ हितेंद्र राज, डॉ खुशबू कुमारी, डॉ रंजय कुमार रंजन, डॉ आसिफ एजाज, डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा, डॉ अदनान अली और डॉ अर्चना कुमारी शामिल हैं. हालांकि इनमें से कई डॉक्टरों ने अन्य जगहों पर भी प्रतिनियुक्ति करा ली है, जिससे कॉलेज प्रशासन के सामने और भी समस्याएं खड़ी हो गयी हैं.

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एआई फोटो

312 पद स्वीकृत, लेकिन तीन सौ का कोई अता-पता नहीं

छपरा मेडिकल कॉलेज में कुल 312 टीचिंग स्टाफ के पद स्वीकृत हैं. इनमें प्रोफेसर (एचओडी) के 24, एसोसिएट प्रोफेसर के 47, असिस्टेंट प्रोफेसर के 74, सीनियर रेजिडेंट/ट्यूटर के 84, मेडिकल ऑफिसर के 16, जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर के 58, लेडी मेडिकल ऑफिसर के छह, एपिडेमियोलॉजिस्ट कम लेक्चरर के एक, स्टैटिस्टिक्स कम लेक्चरर के एक, कैजुअल्टी मेडिकल ऑफिसर के एक शामिल है.

नए सत्र में भी नामांकन की उम्मीद धुंधली

कॉलेज प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2025-26 में भी मेडिकल कॉलेज में नामांकन की संभावना नहीं दिख रही है. अधिकारियों का कहना है कि कॉलेज तो खोल दिया गया, लेकिन 11 महीने बीत जाने के बाद भी जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं कराये गये. पूरे प्रमंडल से मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में उन्हें लौटाया जा रहा है. फिलहाल सिर्फ सर्दी, खांसी और बुखार जैसे सामान्य मरीजों का ही इलाज हो पा रहा है.

एमबीबीएस नामांकन का सपना अधूरा

शुभारंभ के समय यह घोषणा की गयी थी कि हर साल एमबीबीएस में 100 छात्रों का नामांकन होगा, लेकिन न तो चालू सत्र में नामांकन हो सका और न ही आने वाले सत्र में इसकी कोई संभावना नजर आ रही है. जब तक कॉलेज को पूरा स्टाफ और संसाधन नहीं मिलते, तब तक न इलाज की व्यवस्था सुधरेगी और न ही पढ़ाई शुरू हो पायेगी.

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क्या कहते हैं सुपरिटेंडेंट?

12 डॉक्टरों के साथ किसी तरह काम चलाया जा रहा है. जब तक स्वीकृत पदों पर डॉक्टर और अन्य कर्मी नहीं आते और जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं होते, तब तक न तो समुचित इलाज संभव है और न ही नामांकन. (सीपी जयसवाल, सुपरिटेंडेंट, छपरा मेडिकल कॉलेज)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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