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Bihar: वोट की स्याही, अब नागरिकता की स्याही से तय होगी : तीन तिथियों से तय होगा लोकतंत्र में प्रवेश

Bihar Politics: हिंदुस्तान का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. हर पांच साल में एक आम वोटर अपनी उंगली पर लगी स्याही से सत्ता के महलों की चाबी सौंपता है. आज सवाल यह है कि यह स्याही किसकी उंगली पर लगनी चाहिए? हिंदुस्तान निर्वाचन आयोग ने इस सवाल का जवाब इतिहास, संविधान और नागरिकता कानून की रोशनी में खोजा है . और जवाब आया है तीन निर्णायक तिथियों के रूप में. यह सिर्फ एक नियम की घोषणा नहीं है. यह लोकतंत्र के दरवाजे पर टंगे उस नये बोर्ड की कहानी है, जिस पर लिखा है, सिर्फ हिंदुस्तानीय नागरिकों का स्वागत है. कृपया अपनी नागरिकता का प्रमाण साथ रखें. हिंदुस्तान निर्वाचन आयोग का यह निर्णय हमें एक नयी दिशा में ले जा रहा है . जहां पहचान अब केवल आधार नंबर नहीं बल्कि संवैधानिक पहचान होगी. यह सख्ती नहीं बल्कि लोकतंत्र की मर्यादा की रक्षा है. यह गहन पुनरीक्षण केवल आंकड़ों का स्पोर्ट्स नहीं बल्कि नागरिकता की सच्चाई की खोज है.

तीन तिथियां, तीन दौर, एक मकसद है सटीक पहचान

पहला साक्ष्य

एक जुलाई, 1987 से पहले जन्मे नागरिकों के लिए यह वह दौर था जब हिंदुस्तान को अपनी जनसंख्या पर शक नहीं था. जो भी हिंदुस्तान में जन्मा, वह हिंदुस्तानीय नागरिक माना गया. माता-पिता कौन थे, कहां से आए, इससे फर्क नहीं पड़ता था. हिंदुस्तानीय भूमि पर जन्म लेना ही पहचान था. हिंदुस्तान निर्वाचन आयोग भी 1987 से पहले जन्मे वोटरों से उनके जन्म तिथि और जन्मस्थान का साक्ष्य मांग रहा है. यह प्रावधान था कि 1955 से एक जुलाई 1987 के बीच हिंदुस्तान में जन्म लेने वाला व्यक्ति हिंदुस्तान का नागरिक है, भले ही उसके माता-पिता की राष्ट्रीयता कुछ भी रही हो.

दूसरा साक्ष्य

एक जुलाई 1987 से 3 दिसंबर, 2004 के बीच जन्मे नागरिक देश ने अनुभव से सीखा कि सिर्फ जन्मस्थान की गारंटी पर्याप्त नहीं. वर्ष 1987 तक देश में ऐसे नागरिकों की संख्या में वृद्धि हुई थी. तब संसद द्वारा 1986 में कानून बनाकर यह तय किया गया कि नागरिकता अब माता या पिता की नागरिकता पर भी आधारित होगी. इसमें कहा गया कि एक जुलाई, 1987 के बाद हिंदुस्तान में पैदा हुई व्यक्ति को हिंदुस्तान का नागरिक तभी माना जायेगा जब उनके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक हिंदुस्तान का नागरिक हो. विदेशी नागरिकों के बच्चों को हिंदुस्तान की पहचान यूं ही नहीं दी जा सकती.

तीसरा साक्ष्य

यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे सतर्क चरण है. अब यदि कोई हिंदुस्तान में जन्म लेता है, तो उसे तभी नागरिकता मिलेगी जब उसके दोनों माता-पिता हिंदुस्तानीय नागरिक हों. नागरिकता कानून को 2004 में और सख्त बना दिया गया. नागरिकता कानून में संसद ने 2003 में संशोधन कर कहा गया कि तीन दिसंबर, 2004 को या उसके बाद हिंदुस्तान में जन्म लेने वालों को तभी हिंदुस्तान का नागरिक माना जायेगा जब उनके माता-पिता दोनों हिंदुस्तान के नागरिक हों. इसी को आधार बनाकर हिंदुस्तान निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को प्रभावी बनाया है.

सियासत, सुरक्षा और सच्चाई की तिकड़ी

इस निर्णय का एक राजनैतिक पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता. सीमावर्ती राज्यों, प्रवासी बहुल इलाकों और जन सांख्यिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में यह कदम वोट बैंक की सियासत को प्रभावित कर सकता है. परंतु यह कदम लोकतंत्र की दीर्घकालिक सेहत के लिए जरूरी भी है. जब मतदाता सूची में गैर-नागरिक शामिल होते हैं, तो यह न सिर्फ संविधान का उल्लंघन है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ भी है. वोट सिर्फ अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है और यह जिम्मेदारी हिंदुस्तान के नागरिकों को ही मिलनी चाहिए.

वोट सिर्फ मत नहीं, नागरिकता की मोहर है

वोट देने का अधिकार हिंदुस्तान में जन्म लेने भर से नहीं, हिंदुस्तानीय होने की कानूनी पुष्टि से तय होगा. तीन तिथियां सिर्फ टाइमलाइन नहीं हैं .ये हैं लोकतंत्र के दरवाजे की तीन चाबियां हैं. और अगर आपके पास इनमें से एक चाबी है तो आप हिंदुस्तान की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक यात्रा में सहभागी बन सकते हैं.

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सियासत, सुरक्षा और सच्चाई की तिकड़ी

इस निर्णय का एक राजनैतिक पक्ष भी है जिसे नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता. सीमावर्ती राज्यों, प्रवासी बहुल इलाकों और जनसांख्यिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में यह कदम वोट बैंक की सियासत को प्रभावित कर सकता है. परंतु यह कदम लोकतंत्र की दीर्घकालिक सेहत के लिए जरूरी भी है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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