Bihar Politics: मनरेगा का नाम बदलकर बीबी जीरामजी किए जाने के प्रस्ताव ने बिहार की नेतृत्व में नई हलचल पैदा कर दी है. कांग्रेस ने इसे महात्मा गांधी के सम्मान से जुड़ा मामला बताते हुए राज्यव्यापी आंदोलन की शुरुआत कर दी है, तो वहीं भाजपा ने इसके जवाब में जन-जागरूकता अभियान छेड़ दिया है.
दोनों दल अब सीधे तौर पर गांव-गांव और पंचायत-पंचायत जाकर जनता के बीच अपनी बात रखने की रणनीति पर उतर चुके हैं.

भाजपा का जन-जागरूकता अभियान
कांग्रेस के विरोध कार्यक्रम के जवाब में भाजपा ने प्रदेश स्तर से लेकर जिला, प्रखंड और पंचायत स्तर तक विशेष कमेटियों का गठन कर दिया है. इन कमेटियों को निर्देश दिया गया है कि वे ग्रामीण इलाकों में जाकर प्रशासन का पक्ष मजबूती से रखें और लोगों के साथ सकारात्मक संवाद स्थापित करें. भाजपा संगठन का मानना है कि यदि समय रहते जनता को कानून और योजना के उद्देश्य के बारे में सही जानकारी दे दी गई, तो कांग्रेस का आंदोलन अपने आप कमजोर पड़ जाएगा.
पार्टी सूत्रों के अनुसार, कमेटियों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे गांव-गांव जाकर यह बताएं कि बीबी जीरामजी केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक पहल है. भाजपा का आकलन है कि अगर ग्रामीण क्षेत्रों में सही संदेश पहुंच गया, तो कांग्रेस के प्रस्तावित धरना-प्रदर्शन और रैलियों में जनभागीदारी बेहद सीमित रह जाएगी.
कांग्रेस का सड़क से सदन तक संघर्ष
दूसरी ओर कांग्रेस ने मनरेगा का नाम बदलने के फैसले को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्मान के खिलाफ बताया है. पार्टी नेताओं का कहना है कि यूपीए प्रशासन ने मनरेगा की शुरुआत गांधी जी के आदर्शों को ध्यान में रखकर की थी और इसका नाम बदलना उनके सपनों को तोड़ने जैसा है.
कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह इस फैसले के खिलाफ सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष करेगी. इसी कड़ी में प्रदेशभर में प्रेस कॉन्फ्रेंस और जन-संवाद कार्यक्रम शुरू किए गए हैं. प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने अपने गृह जिले औरंगाबाद से अभियान की शुरुआत की, जबकि पटना में सदाकत आश्रम में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने संबोधित किया.
नेतृत्वक आमने-सामने की स्थिति
मनरेगा और बीबी जीरामजी का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक या नीतिगत बहस तक सीमित नहीं रहा. यह सीधा सियासी टकराव बन चुका है. भाजपा इसे विकास और सुधार से जोड़कर देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे गांधीवादी मूल्यों पर प्रहार के रूप में पेश कर रही है.
दोनों ही दलों की रणनीति साफ है. कांग्रेस आंदोलन और विरोध के जरिए प्रशासन को घेरना चाहती है, जबकि भाजपा जन-जागरूकता अभियान के माध्यम से कांग्रेस के विरोध को कमजोर करना चाहती है. आने वाले दिनों में गांवों और कस्बों में यह सियासी जंग और तेज होने की संभावना है.
बिहार की नेतृत्व में नया मोड़
मनरेगा बनाम बीबी जीरामजी की बहस ने बिहार की नेतृत्व को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है. यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किस पक्ष को ज्यादा विश्वसनीय मानती है. क्या कांग्रेस का भावनात्मक मुद्दा लोगों को सड़कों पर उतार पाएगा या भाजपा का जन-जागरूकता अभियान आंदोलन की धार को कुंद कर देगा, इसका फैसला आने वाले हफ्तों में साफ हो जाएगा.
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